Monday, 3 April 2017

घर में सामान रखने की सही दिशा जानें

वास्तु, प्रकृति से मनुष्य के सामंजस्य को बनाये रखने की वह अद्भुत कला है जो दस दिशाओं (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, उत्तर-पूर्व यानी ईशान, दक्षिण पूर्व यानी आग्नेय, दक्षिण- पश्चिम यानी नैऋत्य , उत्तर -पश्चिम यानी वायव्य, आकाश और पाताल) तथा पांच तत्वों (आकाश, वायु, जल, अग्नि एवं पृथ्वी) पर आधारित होती है।  किसी भी दिशा या तत्व के असंतुलित अथवा दोषपूर्ण हो जाने से वास्तु नकारात्मक प्रभाव देने लगती है। जिसके कारण उसमें रहने वालों को बहुत सी समस्याओं से जूझना पड़ सकता है।
जिस तरह से भवन या भूखंड के निर्माण में वास्तु के नियमों का पालन किया जाता है , उसी तरह निर्मित भवन के भीतर भी उपयोग में आने वाले सामान को सही दिशा में रखना आवश्यक है, वरना उसका नकारात्मक असर वहां रहने वालों को प्रभावित करेगा।
ड्रेसिंग टेबल आज के समय में सबसे अधिक उपयोग में आती है। भवन के उत्तर या पूर्व की दिशा इसके लिए उपयुक्त मानी गयी है। परंतु इसमें ध्यान रखने वाली बात यह है कि ड्रेसिंग टेबल में लगा आईना सोने के पलंग के ठीक सामने न हो और सोते समय उसमें शरीर का कोई अंग भी दिखाई न देता हो. यदि ऐसा है तो सोने से पहले उस आईने को ढक  देना चाहिए अन्यथा पति-पत्नी के रिश्ते तो खराब होंगे ही, बीमारिया भी पीछा नहीं छोड़ेंगी।
इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जैसे टीवी, फ्रिज, कंप्यूटर, जनरेटर, ट्रांसफॉर्मर, इन्वर्टर, मिक्सी, विद्युत् मीटर आदि को सदैव दक्षिण पूर्व अथवा दक्षिण दिशा में ही रखना चाहिए। किचन में गैस या स्टोव को दक्षिण-पूर्व में रखना उचित होता है।  वाशिंग मशीन को उत्तर-पश्चिम दिशा में ही रखना चाहिए अगर इस दिशा में जगह न हो तो उत्तर या पूर्व के मध्य में भी रख सकते हैं।
घर-परिवार में अनावश्यक पैसा खर्च न हो, इसके लिए धन और आभूषण रखने की आलमारी या तिजोरी को दक्षिण दिशा की दीवार से लगाकर इस प्रकार रखें कि उसके दरवाजे उत्तर दिशा में खुलें। बैडरूम में तिजोरी को भूलकर भी नहीं रखना चाहिए। बेसरूम के दरवाजे के ठीक सामने पलंग को रखना दोषपूर्ण है। इसके अलावा बैडरूम में युद्ध, लड़ाई, डूबता सूर्य, मृत पशु या मनुष्य की तस्वीर लगाने से बचना चाहिए वरना इनसे निकलने वाली नकारत्मक ऊर्जा जीवन को प्रभावित करेगी। पति-पत्नी के अच्छे संबंधों के लिए बैडरूम में लवबर्डस, राधकृष्ण, शंख या हिमालय आदि की तस्वीर लगाई जा सकती है।
भवन के गेस्टरूम में आलमारी के लिए उपयुक्त स्थान पश्चिम या दक्षिण की दीवार है। मेज या कुर्सी पूर्व या उत्तर की ओर रखें. गेस्टरूम में अलग से पूजा घर न बनवाएं। घर में टूटा दर्पण या बंद घड़ी कभी न रखें। घड़ी के लिए सकारात्मक दिशा पूर्व, उत्तर या पश्चिम की दीवार है।
ड्राईंग रूम या लॉबी में सकारात्मक ऊर्जा प्रवाह के लिए मछली घर या एक्वेरियम पूर्व उ\या उत्तर में इस प्रकार रखें कि  बाहर से आने वालों की नजर सीधे उस पर पड़े। बैडरूम में मछली घर नहीं रखना चाहिए अन्यथा मानसिक अस्थिरता या अनिद्रा की समस्या हो सकती है।
यदि घर में ही ऑफिस या व्यावसायिक कार्य करना है तो दक्षिण-पश्चिम दिशा सबसे श्रेष्ठ मानी गयी है। इस दिशा में स्वयं का मुख पूर्व या उत्तर की ओर रखना चाहिए जबकि क्लाइंट्स का मुख पश्चिम या दक्षिण की ओर रहना चाहिए।
डाइनिंग टेबल किचन के पास या उससे लगी दक्षिण-पूर्व दीवार  के पास होना आवश्यक है। अन्य दिशा में होने से कब्ज, अतिसार और वातरोग होने की संभावना बानी।  किचन में गैस या स्टोव और बर्तन धोने की सिंक पास-पास नहीं होने चाहिए। ---प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद एवं वास्तुविद

Sunday, 26 February 2017

भगवान शिव की महापूजा का पर्व है शिवरात्रि
त्रिनेत्रधारी भगवान शिव की महापूजा का पावन पर्व है शिवरात्रि, जिसमें व्रत, उपवास, पूजापाठ, मंत्र साधना, रात्रि जागरण आदि के द्वारा अपनी इंद्रियों को नियंत्रित कर शिव तत्व को प्राप्त किया जा सकता है। शिव सौम्य हैं, सरल हैं तो काल रूप में महाकाल हैं। संपूर्ण ब्रह्मांड में आध्यात्मिक चेतना के महाशिखर हैं शिव। सृष्टि के आरम्भ में मध्य रात्रि में फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को ब्रह्मा से रूद्र के रूप में शिव का अवतरण हुआ, इसलिए शिव रौद्र रूप भी हैं। पौराणिक अभिव्यक्ति में शिवरात्रि शिव और पार्वती के विवाह की शुभ रात्रि है, वहीं शिव ने प्रलय काल में शिवलिंग के रूप में जन्म लिया और ब्रह्मा एवं विष्णु ने रात्रि में ही शिवलिंग की आराधना की, इसलिए शिव को शिवरात्रि विशेष प्रिय है।
शिवपूजन एवं उपवास की विधि 
शिवरात्रि के दिन व्रत और उपवास रखते हुए श्रद्धानुसार शिवलिंग पर गंगाजल, दूध, दही, शहद, घी, गन्ने का रस, सरसों या तिल का तेल, केसर, भांग, धतूरा, आक, बेलपत्र, अक्षत, काले तिल, पुष्प आदि अर्पित करते हुए रुद्राभिषेक किया जाता है। शिव पूजन के समय रुद्राक्ष धारण करना और ॐ नमः शिवाय एवं महामृत्युंजय मंत्र का निरंतर जप करना शुभ होता है। भगवान शिव की पूजा में तुलसी पत्र, हल्दी, शंख का जल, चंपा, कदंब, सेमल, अनार, मदंती, बहेड़ा, जूही, कैथ आदि के पुष्प अर्पित करना निषिद्ध है। शिव पूजन के लिए सर्वश्रेष्ठ स्थान शिवालय अर्थात शिव मंदिर है परंतु शिव मंदिर न होने की दशा में बेलपत्र या पीपल के वृक्ष के पास भी शिव पूजन किया जा सकता है।  
 शिव पूजन का महत्व
शिवरात्रि पर व्रत, उपवास, मंत्रोच्चार,और रात्रि जागरण करने से तन और मन की शुद्धि तो होती ही है, भय, रोग, कष्ट, दुघटना भय और अन्य समस्याओं से भी छुटकारा मिलने लगता है। जिन जातकों की कुंडली में पीड़ादायक ग्रहों की दशा या अंतर्दशा के कारण घर-परिवार में वियोग, कलह, अशांति, धन की कमी, दुःख, असहनीय कष्ट आदि आ रहे हों तो उन्हें शिवरात्रि पर शिव की आराधना अवश्य करनी चाहिए। वास्तु शास्त्र के अनुसार पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके शिवलिंग पर बेलपत्र और जलधारा चढ़ाने से जीवन में सुख, शांति, धन-संपदा, प्रसन्नता, अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। अयोध्या कांड के आरंभ में वर्णित शिव के दिव्य स्वरुप का नियमित पाठ करने से सभी कष्ट, परेशानियां, तनाव और समस्याओं का निदान होने लगता है। काल सर्प दोष वाली कुंडली के जातकों को शिवरात्रि पर प्रातः स्नान के बाद चांदी और तांबे के सर्प का एक-एक जोड़ा अपने शरीर से ग्यारह या इक्कीस बार उसार कर बहते जल में प्रवाहित करने और फिर नियम पूर्वक हर सोमवार को शिवलिंग पर जलाभिषेक करने से लाभ मिलता है।जिन कन्याओं के विवाह में किन्हीं  परेशानियों की वजह से विलंब हो रहा हो तो उन्हें भी शिवरात्रि  के दिन शिव एवं पार्वती का पूजन कर सोलह सोमवार के व्रत रखने चाहिए तथा रामचरित मानस ,इन वर्णित शिव-पार्वती विवाह के प्रसंग का पाठ करना चाहिए। शनि की साढ़े साती या ढईया से प्रभावित जातकों को शिवलिंग का सरसों के तेल से अभिषेक करते हुए महामृत्युंजय मंत्र का जप करना चाहिए। राहु एवं केतु के अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए शिवलिंग पर काले तिल और पंचामृत अर्पित करने से लाभ होता है।

    

Thursday, 9 February 2017

गृह कलह रोकेंगे ये उपाय
सामजिक व्यवस्था में घर-परिवार का अपना महत्व है, जहां सभी सदस्य मिल-जुलकर रहते हैं तथा एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करते हुए  भरण-पोषण की  जिम्मेदारी  निभाते हैं। परिवार में बने रिश्तों की डोर बड़ी नाजुनिवारण क होती है, एकता प्रेम और स्नेह भाव बनाए रखने के प्रयास के बावजूद कई बार छोटी-छोटी बातों को लेकर पति-पत्नी, सास-बहू, पिता-पुत्र, भाई-भाई के बीच टकराव और मतभेद हो ही जाता है, जो आपसी कलह का रूप लेने पर परिवार के वातावरण को तनावपूर्ण बना  देता है। इस कारण परिवार के सदस्यों के मध्य आपस रिश्ते भी खराब हो जाते हैं। गृह कलह  के यूं तो बहुत सारे कारण होते हैं, लेकिन ज्योतिष एवं वास्तु की दृष्टि से गृह कलह ग्रहों के दोषपूर्ण या अशुभ दशा होने अथवा भवन में  एक या अनेक वास्तु दोष होने से भी गृह कलह उत्पन्न होने की संभावना बनी रहती है।
ज्योतिष में गृह कलह का निवारण 
संभावित गृह कलह के निवारण के लिए वर-कन्या के विवाह से पहले अगर सही तरीके से कुंडली में गुणों का मिलान करवा लिया जाये तो अच्छा रहता है। फलित ज्योतिष के अनुसार मंगल, शनि और राहु ग्रहों के विभिन्न भावों में बैठे होने से उन भावों से सम्बंधित रिश्तों में मतभेद और कलह देखा जा सकता है। इसके निवारण के लिए उस दोषपूर्ण ग्रह से सम्बंधित वस्तुओं का दान करने, मंत्र जप, पूजा-पाठ, रत्न या रुद्राक्ष धारण  करने से लाभ मिलता है।
घर-परिवार में सुख-शांति और प्रेम भाव बनाए रखने के लिए भोजन बनाते समय सबसे पहली रोटी के बराबर चार टुकड़े करके एक गाय को, दूसरा काले कुत्ते को, तीसरा कौए को खिलाना चाहिए तथा चौथा टुकड़ा किसी चौराहे पर रख देना चाहिए। घर के पूजा घर में अशोक के सात पत्ते रखें। उनके मुरझाने पर तत्काल नए पत्ते रखकर पुराने पत्ते पीपल के वृक्ष  नीचे रखने से गृह कलह  दूर होने लगता है। अगर परिवार में कलह  के  कारण मानसिक तनाव और परेशानी हो रही हो तो एक पतंग पर अपनी परेशानी लिखकर सात दिनों तक उसे उड़ाकर छोड़ देने से समस्या का समाधान होता है।
पति और पत्नी के बीच झगड़ा होता हो तो घर में विधि-विधान से स्फटिक के शिवलिंग स्थापित करके इकतालीस दिनों तक उस पर गंगा जल और बेल पत्र चढ़ाएं तथा "ॐ नमः  शिवशक्तिस्वरूपाय मम गृहे शांति कुरु कुरु स्वाहा" मंत्र का ग्यारह माला जप करने से झगड़ा शांत होने  लगता है। छोटी-छोटी बातों पर होने वाले विवादों को रोकने के लिए केवल सोमवार अथवा शनिवार के दिन गेहूं पिसवाते समय एक सौ ग्राम काले चने भी मिलवाएं। इस आटे की रोटी खाने से भी गृह कलह दूर होता है।
यदि चंद्र ग्रह के अशुभ या दूषित होने से परिवार में अक्सर कलह रहती है तो इसके लिए रविवार रात में अपने सिरहाने स्टील या चांदी के एक गिलास में गाय का थोड़ा सा कच्चा दूध रखें और प्रातःकाल उसे बबूल के पेड़ पर चढ़ा दें। इन उपायों के साथ-साथ घर में गूगल की धूनी देने, गणेश एवं पार्वती की आराधना करने, चींटियों को शक्कर डालने,  पूर्व दिशा  की ओर सिरहाना करके सोने, हनुमान जी की उपासना करने, सेंधा नमक मिश्रित पानी से घर में पोछा लगाने आदि से भी गृह कलह  दूर होकर शांति बनी रहती है।
वास्तु के अनुसार गृह कलह निवारण
वास्तु शास्त्र के अनुसार भी अगर भवन में कोई वास्तु दोष है तो गृह कलह संभव है। इसके लिए घर के प्रवेश द्वार के सामने यदि कोई पेड़, नुकीला कोना, मंदिर की छाया, हेंड पंप आदि हैं तो उन्हें या तो हटवा दें अथवा अपने द्वार को सरकवा दें। घर के अंदर युद्ध, डूबती नाव, जंगली जानवर, त्रिशूल, भाले आदि के चित्र अथवा प्रतिमा रखने से बचें। बेडरूम में दर्पण ऐसी जगह लगाएं जहां से सोते समय अपना प्रतिबिंब न दिखाई दे। अगर घर की दीवारों का प्लास्टर उखड़ा हुआ है तो उसे तत्काल ठीक कराएं। भवन में किचन उत्तर-पश्चिम दिशा में न  रखें  अन्यथा गृह कलह  होने की संभावना बनी रहेगी। --- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद, आगरा 

Monday, 13 June 2016

गंगा तेरा पानी अमृत.......

भारत की परंपरा और संस्कृति को अपने में समाहित किये पतित पावनी गंगा सदियों से समस्त प्राणियों के कल्याण का पर्याय बनकर इस धरा पर प्रवाहित हो  रही है। गंगा महज एक नदी मात्र ही नहीं है, बल्कि इस धरती को सिंचित कर अन्न उत्पादन करने वाली वह जीवन धारा है जिसका अमृत तुल्य जल लाखों-करोडों लोगों की आस्था का प्रतीक है। गंगा के पवित्र जल में डुबकी लगाकर एवं उसका आचमन करके लोग अपने को धन्य मानते हैं। माना जाता है कि गंगा का अवतरण ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को
हुआ था इसलिए यह तिथि  दशहरा के नाम से जानी जाती है।
गंगा के  विभिन्न नाम
पौराणिक कथा के अनुसार कपिल मुनि के श्राप से भस्म हुए अपने साठ हजार पूर्वजों की मुक्ति के लिए राजा भगीरथ ने कठोर तप करके देवनदी गंगा को धरती पर उतारने का वरदान प्राप्त था। तत्पश्चात गंगा के वेग को सहन करने के लिए भगवान शिव की तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया। शिव की जटाओं से होती हुई गंगा ब्रह्मा द्वारा निर्मित बिन्दुसर सरोवर में उतरीं और वहां से पृथ्वीलोक पर अवतरित हुई। अपने पवित्र जल के स्पर्श से राजा भगीरथ के पूर्वजों को मोक्ष देने के कारण गंगा भागीरथी कहलायी। पाताल लोक में नाग योनियों के जीवों का तारण करने के कारण गंगा को भोगवती कहा गया। राजश्री जहु को पिता के समान सम्मान देने से गंगा का एक नाम जाह्नवी भी है। त्रिलोक में त्रिपथगा, स्वर्ग में मंदाकिनी एवं सुरसरि तथा भगवान विष्णु के बाएं पैर के अंगुष्ठ से प्रादुर्भाव होने से गंगा का नामकरण विष्णुपदी भी हुआ।
गंगा के पूजन की विधि
गंगा दशहरा पर गंगा नदी में स्नान करना अत्यंत ही शुभ माना गया है। अगर किसी कारण से गंगा में स्नान का अवसर न मिले तो  सादा जल में गंगा जल मिलाकर स्नान करना भी शुभ होता है। गंगा स्नान के बाद गंगा जी का पूजन दस प्रकार के पुष्प, दस प्रकार के फल, दस दीपक, दस तांबूल, दशांग धूप  आदि के साथ करना चाहिए तथा श्रद्धानुसार दस गरीबों एवं जरूरतमंदों को दान-दक्षिणा देना चाहिए। 

Tuesday, 26 April 2016

मंगल के लिए मंगल की आराधना

नवग्रहों में पराक्रमी शौर्य के प्रतीक भौम अर्थात मंगल ग्रह को भूमि पुत्र कहा गया है, इसलिए भूमि से जुड़े मामलों में मंगल का विशेष योगदान है। ज्योतिष शास्त्र में मंगल को युद्ध का देवता सेनापति माना गया है। मेष और वृश्चिक राशियों के स्वामी ग्रह मंगल मकर राशि में उच्च के तथा कर्क राशि में नीच के होते हैं। दुर्घटना, हथियार, रोग, साहस, पराक्रम, वीरता, भाई-बंधु, गृहस्थ सुख, शासक, शत्रु, आचरण, क्रोध, छल-कपट, चौर्य कर्म आदि के बारे में जानकारी के लिए मंगल ग्रह की स्थिति  का ही सहारा लिया जाता है।
मंगल का स्वरुप एवं प्रभाव
उग्र प्रकृति के मंगल की चार भुजाएं हैं, जो अभय मुद्रा, त्रिशूल, गदा एवं वर मुद्रा में दर्शित हैं। लाल वस्त्र और लाल माला धारण करने वाले मंगल का वाहन भेड़ा है। इनके मस्तक पर स्वर्ण मुकुट है। जन्म कुंडली में पहले, चौथे, सातवें, आठवें और बारहवें भाव में विराजमान मंगल की स्थिति जातक को मांगलिक बनाती है , वहीं मंगल कुंडली के जिस भाव में बैठे होते हैं, वहां से वे चौथे, सातवें एवं आठवें भाव को पूर्ण दृष्टि से देखते हैं।
अंक ज्योतिष में मंगल 
अंक ज्योतिष के अनुसार 9 का अंक मंगल का प्रतिनिधित्व करता है। जिन जातकों का जन्म किसी भी मास की 9, 18 और 27 तारीख को होता है, उनका जन्मांक 9 है और वे जीवन भर मंगल से प्रभावित रहते हैं। ऐसे जातक कठिन परिश्रम, लगन, साहस, और दृढ़ इच्छा शक्ति के बल पर ही जीवन में सफल हो पाते हैं। ऐसे जातकों को जीवन में शुभ प्रभाव के लिए अपने भोजन में प्याज, अनार, तिल, सरसों, अदरक, काली मिर्च, चुकंदर, गाजर, सेब आदि का सेवन अवश्य करना चाहिए।
मंगल के शुभ-अशुभ प्रभाव
मंगल के शुभ एवं बली होने पर जातक अनुशासन प्रिय, सर्जन, मजबूत, आकर्षक, जमींदार, सैन्यकर्मी, पुलिस अधिकारी, गुप्तचर विभाग आदि में साहसपूर्ण कार्य करने वाला अधिकारी होता है। जबकि अशुभ एवं दोषपूर्ण मंगल के प्रभाव से जातक आपराधिक कार्य करने लगता है तथा अक्सर चेचक, ज्वर, पित्त विकार, घाव, फोड़ा-फुंसी, रक्तस्राव जैसी बीमारियों से ग्रस्त बना रहता है।
मंगल की शांति के उपाय
मंगल ग्रह की शांति एवं प्रसन्नता के लिए भगवान शिव और हनुमान जी की उपासना की जाती है। स्वास्थ्य लाभ एवं प्रसन्नता के लिए नियमित रूप से "ॐ अंगारकाय नमः" अथवा "ॐ भौं भौमाय नमः" मंत्र का जप करना चाहिए। मंगल के अशुभ प्रभावों को काम करने के लिए स्वर्ण, तांबा, गुड, गेहूं, लाल वस्त्र, लाल चंदन, लाल पुष्प, लाल फल, मसूर की दाल आदि का दान किया जाता है। भूमि लाभ के लिए मंगलवार को गुड की रेवडिया मछलियों को अथवा गुड चना बंदरों को खिलाना चाहिए। पराक्रमी संतान प्राप्ति के लिए घर में गुड का मीठा पराठा बनाकर मंगलवार को गरीब बच्चों को खिलाना चाहिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल