Thursday, 27 December 2012

कुंडली से जानिये रोगों के बारे में

ज्योतिष शास्त्र में जन्म कुंडली के द्वारा जातक को होने वाले रोगों का भी पता लगाया जा सकता है। कुंडली के षष्टम भाव में स्थित राशि, भाव के स्वामी तथा इस भाव पर पड़ने वाले विभिन्न ग्रहों के प्रभाव के अध्ययन से स्वास्थ्य संबंधी जानकारी मिल सकती है। फलित ज्योतिष के अनुसार सूर्य ग्रह के कुपित होने से जातक को सिर व मष्तिष्क,ह्रदय,नेत्र एवं कर्ण रोग,अस्थि भंग,शारीरिक कमजोरी, शरीर में जलन जैसी समस्याएं होने का अंदेशा रहता है। चन्द्र ग्रह के प्रभाव से मानसिक रोग, नींद न आना, रक्त विकार, ब्लड प्रेशर, रक्त की कमी, जल से भय तथा उन्माद होने का अंदेशा रहता है।
मंगल ग्रह  के कुपित होने से पित्त विकार, त्वचा रोग, टाय़फाइड और अपेंडिक्स हो सकते हैं। वहीं बुध ग्रह  के कारण वात, पित्त और कफ से सम्बंधित रोग, नाक एवं गले के रोग तथा बुद्धि की कमी की संभावनाएं रहती हैं। गुरु ग्रह के कुपित होने से गठिया, कमर व जोड़ों में दर्द, शरीर में सूजन, कब्ज़ आदि समस्याएं होने लगती हैं। यदि शुक्र ग्रह कुपित हो तो जातक को वात एवं कफ रोग होने के साथ-साथ शरीर के अंदरूनी हिस्सों में रोग होने की संभावनाएं रहती हैं।
शनि ग्रह के कुपित होने से वात एवं कफ रोग, कैंसर, श्वसन रोग, रक्त की कमी जैसे रोग होने लगते हैं। यदि जातक राहु ग्रह से प्रकोपित हो तो उसे संक्रामक रोग, रक्त की कमी, ह्रदय रोग, विष जनित रोग तथा हाथ और पेरों में दर्द जैसी समस्याएं होने लगती हैं। यदि केतु ग्रह कुपित हो तो जातक त्वचा रोग, पित्त विकार, पाचन संबंधी रोग और हैजा का शिकार हो सकता है। ----प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद 

देवी लक्ष्मीजी का प्रतीक है झाड़ू

दैनिक उपयोग में आने वाली वस्तुओं में झाडू अर्थात बुहारी का अपना विशेष महत्त्व है। झाडू का उपयोग घर, दुकान, व्यापारिक प्रतिष्ठान आदि की साफ़-सफाई में होता है। शास्त्रों के अनुसार झाडू को धन की देवी महा लक्ष्मीजी का प्रतीक मानते हुए झाडू को उचित और साफ़ सुथरी जगह पर रखा जाता है। कहते हैं कि नियमित रूप से प्रातः एवं सायं काल में घर और कार्यस्थल की झाडू से सफाई करने से स्वच्छता के साथ-साथ धन की प्राप्ति  भी होती है। जिन घरों में नियमित रूप से झाडू नहीं लगाई  जाती वहां दरिद्रता का वास रहता है। 
झाडू को महालक्ष्मीजी  का प्रतीक मानने वालों के अनुसार झाडू को कभी भी पैर नहीं लगाने चाहिए। झाडू का उपयोग पूरा होने के बाद उसे किसी भी ऐसे सुरक्षित स्थान पर रख देना चाहिए जहाँ इस पर किसी की नजर न पड़े। अपवित्र, गंदे और पानी वाले स्थान पर कभी भी झाडू को नहीं रखना चाहिए। दीवार के सहारे भी झाडू को खडी अवस्था में नहीं रखा जाता है। घर, दुकान अथवा कार्यस्थल आदि की सफाई में काम आने वाली झाडू से भूल कर भी सड़क, नाली या मल -मूत्र की सफाई नहीं करनी चाहिए। घर के किसी सदस्य या मेहमान के जाने के तुरंत बाद भी झाडू लगाना अशुभ माना जाता है। 
घर और व्यापारिक प्रतिष्ठानों से दरिद्रता रूपी गंदगी को सदैव दूर रखने के लिए यह बहुत आवश्यक है कि प्रतिदिन वहां की झाडू की मदद से सफाई की जाये। यहाँ इस बात का भी  अवश्य ध्यान रखा जाना चाहिए कि  झाडू को काम में लेने के बाद उसे साफ़ और सुरक्षित स्थान पर रखें। यदि भूल से भी झाडू से पैर लग जाए तो महालक्ष्मीजी से क्षमा याचना करते हुए झाडू को हाथ लगा कर अपने माथे से लगा लें। झाडू का सम्मान करने से निश्चय ही महा लक्ष्मी जी की कृपा प्राप्त होती है और घर एवं व्यापारिक प्रतिष्ठान में सुख शांति तथा धन संपत्ति का आगमन होता है।--- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद  

Monday, 17 December 2012

हाथ की रेखाओं से जानिये व्यवसाय की स्थिति

समय और परिस्थितिओं के अनुसार किसी भी व्यक्ति का भाग्य परिवर्तनशील होता है। व्यवसाय और कारोबार करने वालों के लिए समय एवम भाग्य महत्वपूर्ण माना जाता है। किसी व्यक्ति के जीवन में व्यवसाय की स्थिति कैसी रहेगी, यह जानने के लिए जन्म कुंडली के अलावा हस्त रेखाओं का अध्ययन भी किया जाता है। यदि हाथ में भाग्य रेखा सामान्य से अधिक मोटी  होकर मस्तिष्क रेखा पर रुक जाये, जीवन रेखा सीधी हो, ह्रदय रेखा में द्वीप का चिन्ह हो और हाथ में एक से अधिक राहु रेखाएँ  हों तो जातक के व्यवसाय में उतार-चढ़ाव  देखने को मिलते हैं। इसके साथ-साथ यदि हाथ में विभिन्न ग्रह  भी कमज़ोर या दोषपूर्ण हों तो जातक के व्यवसाय में घाटा होता है। 
भाग्य रेखा के ऊपर काला तिल,धब्बा एवं द्वीप के अलावा जीवन रेखा पर स्पष्ट जाल व अंगुलिओं में टेढ़ापन नज़र आता हो तो व्यवसाय में धन और समय खर्च होने की तुलना में लाभ का प्रतिशत कम ही होता है। यदि जातक भागीदारी के रूप में कोई व्यवसाय कर रहा हो तो उसे आर्थिक नुक्सान उठाना पड़ता है।
यदि भाग्य रेखा मोटी होने के साथ-साथ टूट कर आगे बढ़ रही हो, शनि, मंगल एवं बुध ग्रह  कमज़ोर अथवा खराब हों, शनि क्षेत्र पर सीढ़ीनुमा रचना बनी हो या शनि पर्वत अत्यधिक कटा-फटा और जालयुक्त हो तो भी जातक को अपेक्षा के अनुरूप व्यवसाय में लाभ नहीं मिल पाता  है। जातक का मन अस्थिर होने से वह बदल-बदल कर व्यवसाय की योजना बनाता रहता है।
व्यवसाय की स्थिति उस समय और भी खराब हो जाती है जब ह्रदय रेखा टूट कर मस्तिष्क रेखा में मिल जाये, भाग्य रेखा पतली और दोष पूर्ण हो, हाथ के मध्य में भाग्य रेखा, जीवन रेखा या ह्रदय रेखा पर काला तिल हो। ऐसी स्थिति में व्यवसाय में आर्थिक क्षति, मानसिक कष्ट और व्यवसाय में अनावश्यक रुकावटों का सामना करना पड़ता है। जिन हाथों में भाग्य रेखा, जीवन रेखा, मस्तिष्क रेखा के साथ-साथ शनि, बुध एवं मंगल पर्वत निर्दोष हों तो वे जातक व्यवसाय में लाभ और उन्नति कर पाते हैं। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद (मोबाइल नंबर : 09412155627)

Saturday, 15 December 2012

वास्तु शास्त्र और दिशाएं

वास्तु शास्त्र के अनुसार किसी भी भवन अथवा स्थान की दृष्टि से एक मध्य स्थान और आठ दिशाएं होती हैं। इन सभी दिशाओं का अपना अलग-अलग महत्त्व है।
जिस दिशा से सूर्य देवता उदय होते हैं वह पूर्व दिशा होती है। इस दिशा के स्वामी इंद्र भगवान हैं। पूर्व दिशा अग्नि तत्व है जिसे कभी भी बंद नहीं करना चाहिए। इस दिशा को बंद करने से वहां रहने वालों को कष्ट, अपमान, ऋण, कार्यों में रुकावट और पितृ दोष का सामना करना पड़ता है।

सूर्य देवता के अस्त होने की दिशा पश्चिम है। इस दिशा के स्वामी वरुण देवता और तत्व वायु हैं। इस दिशा को बंद करने से जीवन में असफलता, शिक्षा में रूकावट, मानसिक तनाव, धन की कमी, मेहनत के बावजूद लाभ न मिलने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
उत्तर दिशा जल तत्व से सम्बन्ध रखती है। इस दिशा के स्वामी कुबेर हैं। इस दिशा में कोई भारी सामान नहीं रखना चाहिए और न ही इसे बंद करना चाहिए। धन रखने वाली तिजोरी का मुख सदैव उत्तर दिशा में ही खुलना शुभ माना गया है। इस दिशा को पवित्र और खुला रखने से धन, धान्य, सुख, समृद्धि और विद्या की प्राप्ति होती है।
पृथ्वी तत्व से सम्बंधित दक्षिण दिशा के स्वामी यम हैं। इस दिशा को सदैव बंद रखना ही शुभ माना जाता है। यदि इस दिशा में खिड़की हों तो उन्हें बंद रखना ही श्रेष्ठकर है। इस दिशा में कभी भी पैर करके नहीं सोना चाहिए।
वास्तु शास्त्र के अनुसार उत्तर - पूर्व दिशा को ईशान कोण माना गया है। जल तत्व से सम्बन्ध रखने वाली इस दिशा के स्वामी रूद्र हैं। इस दिशा को भी सदैव पवित्र रखना चाहिए अन्यथा घर परिवार में कलह और कष्ट होने के साथ-साथ कन्या संतान अधिक होने की सम्भावना भी बनी रहती है।
दक्षिण - पूर्व दिशा को वास्तु शास्त्र में आग्नेय कोण माना गया है। अग्नि तत्व से सम्बंधित इस दिशा के स्वामी अग्नि देवता हैं। यदि इस दिशा को दूषित रखा जाए तो घर में बीमारियाँ और अग्निकांड होने का खतरा बना रहता है। इस दिशा में बिजली के मीटर, विद्युत् उपकरण और गैस चूल्हा आदि रहने चाहिए।
दक्षिण-पश्चिम दिशा को वास्तु शास्त्र में नैरित्य कोण कहा जाता है। इस दिशा का सम्बन्ध पृथ्वी तत्व से है और इस दिशा के स्वामी नैरूत हैं। इस दिशा के दूषित होने से चरित्र हनन, शत्रु भय, भूत-प्रेत बाधा, दुर्घटना जैसी समस्याओं का सामना करना पड सकता है।
वास्तु शास्त्र में उत्तर-पश्चिम दिशा को वायव्य कोण का नाम दिया गया है। वायु तत्व वाली इस दिशा के स्वामी भी वरुण देवता हैं। इस दिशा के पवित्र रहने से घर में रहने वालों का स्वास्थ्य अच्छा रहता है और उनकी आयु भी अच्छी रहती है।
वास्तु शास्त्र में भवन का मध्य भाग सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यह भाग ब्रम्हा का होने से इसे सदैव खुला और खाली रखने की सलाह दी जाती है। आकाश तत्व वाले इस पवित्र स्थान के स्वामी सृष्टि के रचियता ब्रह्मा जी हैं।--- प्रमोद कुमार अग्रवाल, फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार 

घर बैठे ही लें ज्योतिष में पत्राचार से प्रशिक्षण

भारतीय वैदिक ज्योतिष संस्थानम (रजिस्टर्ड), वाराणसी (उत्तर प्रदेश) से अपने घर बैठे- बैठे ज्योतिष शास्त्र की विभिन्न विधाओं जैसे - फलित ज्योतिष,  हस्तरेखा, वास्तु,  रत्न  ज्योतिष,  तंत्र-मन्त्र, अंक ज्योतिष,  ज्योतिष धन्वन्तरी,  कर्मकांड आदि में पत्राचार से प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए कृपया मोबाइल नम्बर  :  09412155627 पर संपर्क कर सकते है।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिष विद्या विशारद

ज्योतिष शास्त्र और भविष्य

 मनुष्य को हमेशा से ही अपने भूत, वर्तमान और भविष्य को जानने की जिज्ञासा रही है। इसके लिए वह ज्योतिष शास्त्र की विभिन्न विधाओं जैसे हस्तरेखा, जन्म कुंडली, अंक विज्ञान आदि का सहारा लेता है और इस विधा के जानकार लोगों से संपर्क करने की कोशिश करता है। वहीँ कुछ लोग ज्योतिष शास्त्र को अविश्वास की नज़र से देखते हैं और इस शास्त्र से जुड़े लोगों का उपहास उड़ाते हैं, लेकिन ऐसे लोग भी अपने घर परिवार में किसी बच्चे के जन्म , मांगलिक कार्यक्रम, लड़के अथवा लडकी के विवाह आदि से पहले कुंडली मिलवाते हैं और इस विधा के जानकार लोगों की तलाश करते हैं।
वास्तव में देखा जाये तो ज्योतिष शास्त्र सौर मंडल में स्थित ग्रह, नक्षत्रों के हमारे जीवन पर प्रभाव से जुड़ा विज्ञानं है. बच्चे के जन्म के साथ ही उस समय मौजूद ग्रह और नक्षत्र के आधार पर उसके समस्त जीवन का निर्धारण हो जाता है।
सही-सही जन्म समय , जन्म स्थान और जन्म की तिथि के आधार पर बनी हुई जन्म कुंडली किसी भी जातक के सम्पूर्ण जीवन से जुडी गूढ़ से गूढ़ बातों की जानकारी दे देती है। वहीँ दूसरी ओर हमारे हाथ की रेखाओं में भी जीवन से जुडी बहुत सी रहस्यमयी बातें छिपी होती हैं।
जन्म कुंडली और हाथ की रेखाओं के समुचित विश्लेषण से हम वर्तमान और भविष्य के बारे में जानकारी हासिल कर सकते हैं। बस ज़रुरत है इस सर्व शक्तिमान ईश्वर और शास्त्र के प्रति विश्वास बनाये रखने की। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल , ज्योतिषविद्

वेदों का नेत्र है ज्योतिष शास्त्र

ज्योतिष शास्त्र को वेदों का नेत्र माना गया है। ज्योतिष शास्त्र के सिद्धांतों के आधार पर जन्म कुंडली के विभिन्न भावों में बैठे ग्रहों के अनुसार जातक के जीवन के सम्बन्ध में जानकारी की जा सकती है।
ज्योतिष शास्त्र भविष्य का निर्धारण नहीं करता बल्कि जन्म कुंडली में जो रहस्य छिपे हैं सिर्फ उन्हें स्पष्ट करता है। यदि जातक की कुंडली में ग्रहों की स्थिति  दोषपूर्ण है तो ज्योतिष शास्त्र के सिद्धांतों के अनुसार उन दोषों के निवारण के लिए कुछ उपाय करके जीवन को सुखी, संपन्न और कष्ट रहित बनाया जा सकता है। लेकिन इतना अवश्य याद रखना चाहिए कि  जीवन में जो भी कुछ घटता है अथवा घटित होने वाला है वह तो होगा ही क्योकि ईश्वर ने जो भी मनुष्य के भाग्य में लिखा है उसे न तो जाना ही जा सकता है और न ही उस पर अंकुश लगाया जा सकता है, हाँ इतना अवश्य है कि  ज्योतिष ज्ञान के माध्यम से मनुष्य के जीवन की व्यक्तिगत, पारिवारिक, व्यावसायिक, शेक्षिक आदि क्षेत्र की समस्याओं की पूर्व जानकारी हो जाने  से वे  अपने को उस समस्या या कष्ट का सामना करने के लिए मानसिक रूप से तैयार कर सकते हैं और बताये गए उपायों के द्वारा उनके प्रभाव को कम कर सकते हैं।
-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद  

व्यापार को बुरी नज़र से बचाता है नज़र बट्टू

दुकानदारी, व्यवसाय और प्रतिष्ठान को किसी की बुरी नज़र से बचाने के लिए दुकानदार एवं व्यापारी कई उपाय करते हैं। शनिवार के दिन नीबू और मिर्च से बनी माला का प्रयोग भी बहुतायत में किया जाता है। इसे नज़र बट्टू कहा जाता है।
 इसे बनाने के लिए मोटे व काले रंग के धागे में एक ताज़ा नीबू और पाँच  या सात की संख्या में ताज़ा मिर्चों को पिरोकर दुकान, व्यवसाय स्थल और कार्यालयों के मुख्य या प्रवेश द्वार पर लटका दिया जाता है।
इस प्रकार बनाया गया नज़र बट्टू एक हफ्ते तक लगा रहता है और दोबारा शनिवार के दिन ही बदला जाता है। 
ऐसा माना जाता है कि  इस प्रयोग से व्यापार या दुकानदारी को किसी की बुरी नज़र अथवा हाय नहीं लगती है तथा उस स्थान पर नकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह भी नहीं होता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद 

ज्योतिषविद प्रमोद कुमार अग्रवाल को ज्योतिष दिग्विजयी का सम्मान

झारखण्ड सरकार से मान्यता प्राप्त देश की प्रमुख संस्था इण्डियन एस्ट्रोलोजिकल रिसर्च इंस्टिट्यूट, जसीडिह, देवघर  के अध्यक्ष एवं निदेशक राज ज्योतिष डॉक्टर महर्षि जे. जाह्नवी तथा चेयरमेन बिजय कुमार पाण्डेय द्वारा आगरा के ज्योतिषविद प्रमोद कुमार अग्रवाल  को ज्योतिष ज्ञान एवं ज्योतिष विधा में उत्कृष्ट लेखन के माध्यम से मानव सेवा हेतु ज्योतिष दिग्विजयी का राष्ट्रीय सम्मान प्रदान करते हुए आल इंडिया एस्ट्रोलोजर्स एसोसिएशन की आजीवन सदस्यता दी गयी है।
विधि, लेखन एवं पत्रकारिता से विगत ढाई दशक से जुड़े प्रमोद कुमार अग्रवाल ने भारतीय वैदिक ज्योतिष संस्थानम से ज्योतिष विद्या विशारद का प्रशिक्षण प्राप्त किया है तथा वे फलित ज्योतिष, वास्तु एवं हस्त रेखा शास्त्र में परामर्श और लेखन कर रहे हैं।

Friday, 14 December 2012

पंचक विचार और ज्योतिष


ज्योतिष शास्त्र में पांच नक्षत्रों के समूह को पंचक कहते हैं। ये नक्षत्र हैं धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद,  उत्तरा भाद्रपद और  रेवती।ज्योतिष विज्ञान के अनुसार चंद्रमा अपनी माध्यम  गति से 27 दिनों में सभी नक्षत्रों का भोग कर लेता है। इसलिए प्रत्येक माह में लगभग 27 दिनों के अंतराल पर पंचक नक्षत्र आते रहते हैं। 
पंचक नक्षत्रों के समूह में धनिष्ठा तथा सदभिषा  नक्षत्र  चर संज्ञक कहलाते हैं। इसी प्रकार पूर्व भाद्रपद को उग्र संज्ञक, उत्तरा  भाद्रपद को  को ध्रुव संज्ञक और रेवती नक्षत्र को मृदु संज्ञक माना जाता है। ज्योतिषविदों के अनुसार चर नक्षत्र में घूमना-फिरना, मनोरंजन, वस्त्र और आभूषणों की खरीद-फरोक्त करना अशुभ नहीं माना गया है। इसी तरह ध्रुव संज्ञक नक्षत्र में मकान का शिलान्यास, योगाभ्यास और लम्बी अवधि  की योजनाओं का क्रियान्वन भी किया जा सकता है।
मृदु संज्ञक नक्षत्र में भी गीत, संगीत, फिल्म निर्माण, फेशन शो, अभिनय करने जैसे कार्य किये जा सकते हैं। उग्र संज्ञक नक्षत्र में अदालत में लंबित मुकदमों तथा विभिन्न प्रकार के वाद-विवादों का निपटारा किया जा सकता है।
 पंचक काल में विवाह, मुंडन, उपनयन संस्कार, गृह प्रवेश, गृह निर्माण  और व्यावसायिक कार्य किये जा सकते हैं। पंचक काल में यदि कोई कार्य किया जाना अति आवश्यक हो तो इसके लिए पंचक दोष की शांति के निवारण का उपाय अवश्य कर लेना चाहिए।
ज्योतिष शास्त्र की मान्यता के अनुसार पंचक के दिनों में किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर दाह - संस्कार  की क्रिया से पूर्व मृतक के शव पर पांच पुतले बना कर रखे जाने का विधान है।
पंचक के दिनों में लकड़ी के फर्नीचर बनाना  और खरीदना व बेचना, दक्षिण दिशा में यात्रा करना, चारपाई बनाना जैसे कार्यों पर प्रतिबन्ध बताया गया है, लेकिन यदि ऐसा करना आवश्यक हो  तो  नक्षत्र की स्थिति के अनुसार पंचक दोष के निवारण का उपाय अवश्य कर लेना शुभ रहता है।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद 

व्यवसाय और वास्तुशास्त्र


# वास्तु शास्त्र के अनुसार फेक्ट्री  अथवा व्यावसायिक स्थल के लिए चिकनी मिटटी वाले भूखंड का चयन करना शुभ रहता है। व्यावसायिक भूखंड में न तो शल्य दोष होना चाहिए और न ही भूखंड किसी कब्रिस्तान या शमशान घाट के नजदीक होना चाहिए।

# व्यवसाय की सफ़लता के लिए भूखंड का आकार आयताकार, वर्गाकार या षष्ठ भुजाकार या अष्ट भुजाकर होना शुभ होना चाहिए।

# व्यवसाय स्थल में भारी सामान रखने का स्थान और भण्डार घर हमेशा ईशान (उत्तर-पूर्व कोण) में अथवा आग्नेय (दक्षिण-पूर्व कोण) में ही बनाना चाहिए।

# चेक बुक, पास बुक, जमा बही, मुक़दमे से सम्बंधित कागजात आदि हमेशा ईशान कोण या पूर्व दिशा में ही रखना चाहिए।

# लेखा विभाग तथा लेखा अधिकारी के बैठने का स्थान व्यवसाय स्थल के उत्तरी भाग में रखना शुभ होता है।

# टेलीफोन और फैक्स मशीन पश्चिम या उत्तर-पश्चिम दिशा में रखना शुभ रहता है। इसी प्रकार कंप्यूटर को हमेशा मेज की दायीं ओर रखना चाहिए।

# मेज पर कभी भी फ़ाइलों का ढेर नहीं लगाना चाहिए। ऐसा करने से कार्यालय में नकारात्मक ऊर्जा प्रवाहित होती रहती है।

-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद

जन्म कुंडली और पितृ दोष


 जन्म कुण्डली  में सूर्य के पीड़ित होने को पितृ  दोष कहा जाता है। पितृ दोष के कारण  जातक को धन हानि, संतान कष्ट, संतान जन्म में बाधाएं जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। 
 कुण्डली का दशम भाव पिता से सम्बन्ध रखता है। दशम भाव का स्वामी यदि कुण्डली  के छटे, आठवें अथवा बारहवें भाव में बैठा  हो तथा गुरु पाप ग्रह से प्रभावित हो अथवा पापी ग्रह  की राशि में हो और लग्न व पांचवे भाव के स्वामी पाप ग्रह  से सम्बन्ध बनाते हों तो भी पितृ दोष माना जाता है। 
पंचम भाव का स्वामी यदि सूर्य हो और वह पाप ग्रह  की श्रेणी में हो तथा त्रिकोण में पाप ग्रह  हो अथवा उस पर पाप ग्रह  की दृष्टि हो तो इसे पितृ दोष प्रभावित कहा जाता है। 
कमजोर लग्न का स्वामी यदि पांचवें भाव में हो और पांचवें भाव का स्वामी सूर्य से सम्बन्ध बनाता है तथा पंचम भाव में पाप ग्रह  में हो तो भी पितृ दोष कहलाता है।  
अष्टम भाव में सूर्य, पंचम भाव में शनि, लग्न में पाप ग्रह  और पंचम भाव के स्वामी के साथ राहु  स्थित हो तो पितृ दोष के कारण  संतान सुख में कमी आती है।
कुंडली में सूर्य-शनि, सूर्य-राहू का योग केंद्र त्रिकोण 1, 4, 5, 7, 9, और 10 भाव में हो अथवा लग्न का स्वामी 6, 8, या 12 भाव में हो एवं राहु लग्न भाव में हो तो इसी कुण्डली  भी पितृ दोष युक्त होती है।  
कुण्डली  में स्थित पितृ दोष को दूर करने के लिए जातक को प्रत्येक अमावस्या को पितरों की पूजा करनी चाहिए। अपने बड़े-बुजुर्गों, गरीब और जरूरतमंदों की सेवा व सहायता करने से भी पितृ दोष का निवारण होता है।  -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद 

आदित्य स्तोत्र के पाठ से मिलते हैं चमत्कारिक फल


जीवन में अचानक बाधाएं, कष्ट, रोग, शत्रु बाधा, असफलता, पारिवारिक तनाव जेसी समस्याएं आने लगती हैं तो मनुष्य अपनी जन्म कुंडली में छिपे रस्यों के अनुसार ग्रह-नक्षत्रों की शांति के उपाय करता है। एसा करने से सकारात्मक परिणाम भी मिलने लगते हैं। सूर्य ग्रह  के दोष की वजह से ह्रदय रोग होने की आशंका सबसे ज्यादा रहती है। इससे बचने के लिए स्वर्ण धातु की अंगूठी पहनने की सलाह दी जाती है।
 आदित्य ह्रदय स्तोत्र का पाठ श्रद्धापूर्वक नियमित रूप से करते रहने से भी ह्रदय रोग में आशातीत लाभ मिलता है। आदित्य ह्रदय स्तोत्र के पाठ से मिर्गी, ब्लडप्रेशर मानसिक रोग आदि भी ठीक होने लगते हैं। आदित्य ह्रदय स्तोत्र  के पाठ से नौकरी में पदोन्नति, धन प्राप्ति, प्रसन्नता, आत्मविश्वास में वृद्धि होने के साथ-साथ समस्त कार्यों में सफलता व सिद्धि मिलने लगती है। 
आदित्य ह्रदय स्तोत्र  का पाठ आरम्भ करने के लिए शुक्ल पक्ष के प्रथम रविवार का दिन शुभ माना गया है। इसके बाद आने वाले प्रत्येक रविवार को यह पाठ करते रहना चाहिए। इस दिन सूर्य देवता की धूप, दीप, लाल चन्दन, लाल कनेर के पुष्प, घृत आदि से पूजन करके उपवास रखना चाहिए। सांयकाल आटे से बने मीठे हलवे का प्रसाद लगाकर उसे ग्रहण करना चाहिए। सूर्य देव के प्रति पूर्ण श्रद्धाभाव एवं विश्वास  के साथ नियम पूर्वक उनकी उपासना व आराधना करते रहने से चमत्कारिक फल मिलने लगते हैं। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद  

वास्तु शास्त्र के नियमों के अनुसार लगाये पेड़-पोधे


वास्तु शास्त्र के नियमों के अनुसार यदि घर के अन्दर और आसपास पेड़-पोधे लगाये जाएँ तो उसके शुभ परिणाम मिलते हैं। घर की पूर्व दिशा में पीपल, दक्षिण दिशा में पलाश, पश्चिम दिशा में वट और उत्तर दिशा में उदुम्बर के पेड़ कभी नहीं लगाने चाहिए अन्यथा गृह स्वामी को सदैव समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। पश्चिम दिशा में लगाया गया पीपल का पेड़  धन-धान्य की प्राप्ति कराता है।
वास्तु शास्त्र  के अनुसार नैरित्य  और आग्नेय  कोण में उद्यान और बगीचा नहीं लगाना चाहिए। घर के अन्दर बने बगीचे में नीलिमा एवं हरिद्रा लिए हुए पौधे लगाने से धन और संतान की हानि होने की आशंका बनी रहती है। इसी प्रकार घर के पास फलदार, कांटेदार और दूधदार पौधे भी नहीं लगाने चाहिए।
घर के अन्दर बेर, केला, अनार, अरण्डी  तथा कांटेदार पेड़ लगाने से उस घर की संतानों का विकास बाधित होने के साथ-साथ गृह स्वामी को शत्रुभय बना रहता है तथा आर्थिक तंगी  भी बनी रहती है। जिस पौधे में फल, दूध और कांटे तीनों ही मौजूद हों तो उसे भूलकर भी घर के अन्दर नहीं लगाना चाहिए अन्यथा घर के सदस्यों को काल का भय बना रहता है। --- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद  

मंत्र शक्ति का चमत्कार


दुःख व चिंताओं को दूर करके शांति और आनंद का अनुभव करने, तन व मन को स्वस्थ बनाये रखने, बुद्धि एवं कार्य करने की शक्ति में वृद्धि  करने तथा वृद्धावस्था को दूर रखने के लिए एक चमत्कारी मंत्र है :  
                             ॐ श्री प्रकाशम् "  .     
 दिल्ली के योगाचार्य श्री कृष्ण गोयल द्वारा हमें यह मंत्र भेजा गया है. श्री गोयल के अनुसार इस मंत्र का मन ही मन जाप करने के लिए एकांत जगह को चुनें और अपनी आँखों को धीमे से मूँद कर अपने ध्यान को मंत्र की शांत तरंगों पर केन्द्रित करें.
 जाप करते समय अपने होंठ व जीभ को न हिलाएं. पांच मिनट जाप करने के बाद आराम से बैठ कर महसूस करें कि आपका शरीर शांति की मूर्ति बन गया है , शरीर में अपार ऊर्जा व शक्ति का संचार हो गया है तथा सम्पूर्ण शरीर में एक अनोखा प्रकाश भर गया है. इस मंत्र के निरंतर जाप एवं अभ्यास से हमें आन्तरिक प्रकाश का दर्शन होने  लगेगा और तब धीरे - धीरे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में आशातीत लाभ होगा.

जन्म राशि के अनुसार करें आराधना


प्रत्येक मनुष्य मनोकामनाओं को पूरा करने के लिए अपने इष्ट देवी-देवता की पूजा अर्चना करता है। अपनी जन्म राशि  के अनुसार यदि अपने  इष्ट  देवी-देवता  की  पूर्ण  श्रद्धा  और  विश्वास  से आराधना की जाये तो जीवन में अच्छे परिणाम देखने को मिल सकते हैं। यहाँ हम समस्त बारह जन्म राशियों के अनुसार इष्ट देवी-देवता की आराधना करने के सम्बन्ध में चर्चा कर रहे हैं। 
मेष और वृश्चिक राशि :
 इन दोनों राशियों के स्वामी ग्रह मंगल हैं। इन राशि के जातकों को पवनसुत हनुमानजी, महा काली और तारा देवी की आराधना करने के साथ-साथ दुर्गा सप्तशती में दिए गए देवीजी के प्रथम चरित्र का पाठ करना शुभ फलदायी होता है।
वृष और तुला राशि  : इन दोनों राशियों  के स्वामी ग्रह शुक्र हैं, जो रजो गुण प्रधान हैं। इन जातकों को ज्ञान की देवी सरस्वती जी की आराधना करना शुभ होता है।
मिथुन और कन्या राशि :
इन राशियों  के स्वामी ग्रह बुध हें। बुध भी रजो प्रधान ग्रह हैं। इन जातकों को माता दुर्गा और भुवनेश्वरी देवी जी की आराधना करना शुभ फलदायी माना गया  है।
कर्क राशि :
इस राशि के स्वामी सतो गुण प्रधान चन्द्र ग्रह हैं। इस राशि के जातकों को धन की देवी महालक्ष्मी जी की आराधना करनी चाहिए।
सिंह राशि :
इस राशि के स्वामी सतोगुण प्रधान ग्रह सूर्य है। इस राशि  के जातकों को सूर्य भगवान्, धन की देवी महालक्ष्मी , बगला मुखी एवं सिद्धिदात्री देवी की आराधना करनी चाहिए। 
धनु और मीन राशि :
इन दोनों राशियों के स्वामी ग्रह गुरु अर्थात ब्रहस्पति  हैं। ये सतो गुण प्रधान हैं। इन दोनों राशियों के जातकों के लिए महालक्ष्मी, कमला और सिद्धिदात्री देवी की आराधना करना फलदायी होता है। 
मकर और कुम्भ राशि :
इन दोनों राशिओं के स्वामी ग्रह  शनि हैं जो तमो प्रधान गुण रखते हैं। इन जातकों को शनि देव और महाकाली जी की उपासना करनी चाहिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद

वास्तु अनुरूप लगायें पौधे


वास्तु शास्त्र के नियमों के अनुसार यदि घर के अन्दर और आसपास पेड़-पोधे लगाये जाएँ तो उसके शुभ परिणाम मिलते हैं। घर की पूर्व दिशा में पीपल, दक्षिण दिशा में पलाश, पश्चिम दिशा में वट और उत्तर दिशा में उदुम्बर के पेड़ कभी नहीं लगाने चाहिए अन्यथा गृह स्वामी को सदैव समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। पश्चिम दिशा में लगाया गया पीपल का पेड़  धन-धान्य की प्राप्ति कराता है।
वास्तु शास्त्र  के अनुसार नैरित्य  और आग्नेय  कोण में उद्यान और बगीचा नहीं लगाना चाहिए। घर के अन्दर बने बगीचे में नीलिमा एवं हरिद्रा लिए हुए पौधे लगाने से धन और संतान की हानि होने की आशंका बनी रहती है। इसी प्रकार घर के पास फलदार, कांटेदार और दूधदार पौधे भी नहीं लगाने चाहिए।
घर के अन्दर बेर, केला, अनार, अरण्डी  तथा कांटेदार पेड़ लगाने से उस घर की संतानों का विकास बाधित होने के साथ-साथ गृह स्वामी को शत्रुभय बना रहता है तथा आर्थिक तंगी  भी बनी रहती है। जिस पौधे में फल, दूध और कांटे तीनों ही मौजूद हों तो उसे भूलकर भी घर के अन्दर नहीं लगाना चाहिए अन्यथा घर के सदस्यों को काल का भय बना रहता है। --- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद  

शनि को प्रसन्न करने के उपाय


सौर मंडल में भ्रमण करने वाले नौ ग्रहों में शनि एक ऐसा ग्रह  है  जिसे  दुःख देने वाला माना जाता है। शनि ग्रह  के मारकेश या अष्टमेश में होने, शनि की साढ़े साती अथवा शनि की ढईया होने पर जातक के जीवन में अशुभ प्रभाव देखने को मिलते हैं। शनि ग्रह  मकर और कुम्भ राशियों के स्वामी हैं। तुला राशि में शनि उच्च के तथा मेष राशि में शनि नीच के होते हैं। सूर्य, चन्द्र और मंगल शनि के शत्रु हैं।
शनि के कुपित होने से जीवन में धन की कमी, कष्ट, शारीरिक बीमारियाँ, कैंसर, दांत व दाढ़  में दर्द, लकवा, कलह, अकारण विवाद, पदावनति, दुर्बलता, चिंता जैसी समस्याओं का सामना करना पड  सकता है। शनि के प्रसन्न होने पर जातक न्याय-प्रिय, सुखी, संपन्न और अतुलनीय धन-सम्पदा  का स्वामी हो जाता है।
शनि के अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए पक्षिओं को दाना चुगाना, अपनी परछाई देख कर शनिवार के दिन सरसों के तेल का दान करना, अमोघ शिव कवच और महा मृत्युंजय मन्त्र का जाप करना, शनि स्त्रोत का पाठ करना, प्रत्येक शनिवार को उपवास करके श्री हनुमानजी की भक्ति भाव से आराधना करना उपयुक्त माना गया है। इसके अलावा लाल चन्दन की अभिमंत्रित माला अथवा श्रवण नक्षत्र में शनिवार के दिन काले रंग के धागे में शमी की अभिमंत्रित जड़ या बिच्छू घास की जड़ धारण करने, शनि से सम्बंधित वस्तुएं जैसे तेल, लोहा, काले तिल, कुल्थी या काली मसूर की दाल, काले जूते, कस्तूरी, नीलम रत्न आदि का दान करने से भी शनि के अशुभ प्रभाव से बचा जा सकता है।
शनि से सम्बंधित लघु मन्त्र 'ॐ प्रां प्रीम प्रों सः शनये नमः'  का निरंतर जाप करते रहने से भी शनि प्रसन्न होते हैं और जातक के दुःख एवं कष्टों का निवारण होने लगता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद 

स्फटिक की माला दूर करती है आर्थिक संकट


धार्मिक मान्यताओं के अनुसार स्फटिक को धन की देवी लक्ष्मी जी का स्वरुप माना गया है, जिसे कंठ हार अर्थात माला  के रूप में धारण किया जाता है। स्फटिक निर्मल,रंगहीन, पारदर्शी और शीत प्रभाव रखने वाला उप-रत्न है। आयुर्वेद में स्फटिक का प्रयोग सभी प्रकार के ज्वर, पित्त प्रकोप, शारीरिक दुर्बलता एवं रक्त विकारों को दूर करने के लिए शहद अथवा गौ मूत्र  के साथ औषधि के रूप में किया जाता है।
 ज्योतिष की दृष्टि से स्फटिक को पूर्ण विधि-विधान और श्रद्धाभाव के साथ कंठ हार के रूप में धारण करते रहने से समस्त कार्यों में सफलता मिलने लगती है तथा विवाद और समस्याओं का अंत होने लगता है। इसके अलावा स्फटिक की माला धारण करने से शत्रु भय भी नहीं रहता है। किसी महत्वपूर्ण कार्य के लिए घर से बाहर जाने से पहले यदि माता लक्ष्मी जी की पूजा-अर्चना करने के बाद स्फटिक की माला धारण करके जाया जाये तो वह कार्य  आसानी से पूरा हो सकता है और  उस कार्य में सफलता मिल सकती है।
 यदि घर-परिवार में किसी कारण से आर्थिक संकट चल रहा हो तो स्फटिक रत्न को गंगा जल से पवित्र करने के बाद मंत्रो से शुद्ध करके पूजा स्थल पर रखना शुभ होता है। इसके साथ-साथ धन प्राप्ति के लिए माता लक्ष्मी जी के मन्त्र " ॐ श्री लक्ष्मये नमः " का कम से कम एक माला जाप प्रतिदिन करना चाहिए।
 व्यापारिक प्रतिष्ठानों और दुकानों के स्वामी यदि पवित्र एवं मन्त्रों से सिद्ध की गयी स्फटिक की माला अथवा स्फटिक रत्न को अपनी धन रखने की तिजोरी में रखें तो आश्चर्यजनक रूप से व्यापार में लाभ मिलने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। यह उपाय करते समय इतना अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि  जिस तिजोरी में स्फटिक माला अथवा रत्न रखा जाये उसका दरवाजा उत्तर दिशा में ही खुले। वैसे भी वास्तु शास्त्र के अनुसार धन रखने की तिजोरी सदैव दक्षिण दिशा में ही रखनी चाहिए जिससे कि जब उसे खोला जाये तो उसका दरवाजा या मुख उत्तर दिशा में ही खुले।
-- ज्योतिषविद प्रमोद कुमार अग्रवाल 

जड़ी धारण करने से होता है कष्टों का निवारण

मनुष्य को जीवन में जब कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है तब वह ज्योतिष, तन्त्र -मन्त्र, रत्न और जड़ी बूटियों  का सहारा लेता है। ज्योतिष शास्त्र में ऐसी  बहुत सारी जड़ी  का उल्लेख मिलता है जिनके धारण करने से जन्म कुंडली में स्थित ग्रहों के अशुभ प्रभाव को दूर किया जा सकता है।
 आर्थिक कारणों से जब कोई व्यक्ति महंगे नाग धारण नहीं कर पाता  है तो  जड़ी  धारण की जा सकती है। शुभ मुहूर्त में विधि पूर्वक प्राप्त की गयी जड़ी भी ग्रहों की निर्बलता या अशुभ प्रभाव को दूर करने में प्रभावी होती है। सूर्य ग्रह  के लिए बेलपत्र की जड़, चन्द्र ग्रह  के लिए खिरनी या खजूर की जड़, मंगल ग्रह  के लिए अनंतमूल या नाग जिह्वा की जड़, बुध ग्रह के लिए विधारा की जड़, ब्रहस्पति ग्रह के लिए भृंगराज की जड़, शुक्र ग्रह  के लिए अश्वगंधा की जड़, शनि ग्रह  के लिए लाल चन्दन या सिंह पुच्छ की जड़, राहु  ग्रह  के लिए लाल व सफ़ेद चन्दन और केतु ग्रा  के लिए अश्वगंधा की जड़ को उपयोग में लाया जाता है
। जड़ी का प्रयोग करते समय यह अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि  जिस जड़ी  का प्रयोग किया जा रहा हो उससे सम्बंधित ग्रह, वार एवं नक्षत्र में उस रंग के धागे अथवा कपडे  में जडी को बाँध लिया  जाये। विधि पूर्वक और शुद्ध मन एवं विश्वास  के साथ जड़ी  का प्रयोग करने से मनुष्य के जीवन में प्रसन्नता, सफलता,  सुख और शांति आने लगती है तथा  बाधा एवं कष्टों का निवारण होने लगता है।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद्  

व्रत के नियम और कर्म

अपने इष्ट देवी-देवताओं की पूजा अर्चना के साथ-साथ व्रत रखने को भी धर्म पालन माना गया है। क्षमा, सत्य, दया, दान, संतोष, शौच, इन्द्रिय निग्रह, देव पूजा, हवन और चोरी न करना -व्रत के दस आवश्यक नियम माने गए हैं। पूर्ण विधि-विधान से व्रत रखने वालों को चाहिए कि वे सच्चे मन, वचन और कर्म से निराहार रहकर अपने इष्ट भगवान् की आराधना करें तथा अपने सम्पूर्ण शरीर के शोधन, प्रभु मिलन की आस और ईश्वर की कृपा प्राप्त करने के लिए क्रोध, लोभ एवं मोह से अपने को सदैव दूर रखें। नियम और कर्म से व्रत रखना अपने आप में असाध्य माना जाता है, लेकिन यह भी सत्य है कि  व्रत रखने से  तन और मन दोनों ही शुद्ध होते हैं तथा ईश्वर  की कृपा और आशीर्वाद भी प्राप्त होने लगते हैं। व्रत का संकल्प लेने वालों को सूर्योदय से सूर्यास्त तक निराहार रहना होता है। व्रत रखने वाले दिन पवित्र भाव से स्नान आदि  से शुद्ध होने के उपरान्त पूर्ण श्रद्धा भाव से अपने इष्ट देव की आराधना करनी चाहिये।  व्रत के मध्य में बार-बार फल, चाय, दूध आदि के सेवन से व्रत खंडित माना जाता है, लेकिन स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए वे बीच में एक बार चाय या फलों का सेवन कर सकते हैं। व्रत रखने वालों के लिए मौसम के अनुसार फल, केला,साबूदाना, आलू, सिंघाड़े व कूटू के आटे  से बने खाद्य पदार्थ  उपयुक्त माने गए हैं। व्रत रहने के दौरान तम्बाकू, गुटखा, पान, शराब तथा अन्य नशीले पदार्थों का सेवन, स्त्री संसर्ग, दिन में शयन  कदापि नहीं करना चाहिए अन्यथा व्रत भंग माना जाता है। व्रत के दौरान अपने आप को विषय-वासनाओं से मुक्त ही रखना चाहिए। व्रत के दौरान यदि व्रत रखने वाला व्यक्ति बेहोश हो जाये तो उसे पानी या फलों का ताज़ा रस सेवन कराने से व्रत खंडित नहीं माना जाता है। महिलाओं को रजोदर्शन  होने पर व्रत नहीं रखना चाहिये। परन्तु व्रत काल में यदि रजोदर्शन हो जाये तो व्रत खंडित नहीं माना जाता है। इस स्थिति में महिलाओं को पूजा आदि  नहीं करनी चाहिए तथा किसी अन्य व्यक्ति से व्रत का भोजन बनवाकर व्रत का  परायण करना चाहिए। बीमारी की दशा में भी व्रत रखने से बचना चाहिये बल्कि उस स्थिति में पूर्ण श्रद्धा भाव से ईश्वर की आराधना करनी चाहिए। ऐसा करने से व्रत से मिलने वाले लाभ प्राप्त हो जाते हैं।  -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिष विद्या विशारद

बजरंग बाण के पाठ से होता है कष्टों का निवारण

 मनुष्य के जीवन में सुख और दुःख साथ-साथ चलते हैं। दुःख के समय में मनुष्य सर्व शक्तिमान ईश्वर से प्रार्थना करते हुए सुख, शांति और समृद्धि की कामना करता है। जीवन में दुर्भाग्य, भूत-प्रेत की बाधा, असाध्य रोग, शारीरिक और मानसिक कष्ट, कारोबार में रूकावट जैसी समस्याएँ आने पर प्रभु श्री राम के परम भक्त मंगल मूर्ति मारुति नंदन श्री हनुमान जी का  पूर्ण श्रद्धा भाव से पूजन तथा बजरंग बाण का पाठ करना शुभ फलदायी माना गया है। इसके लिए अपनी सुविधानुसार मंगलवार अथवा शनिवार के दिन स्नान आदि से निवृत्त होने के उपरान्त पूजन स्थल पर हनुमान जी का चित्र या मूर्ति  की स्थापना करके वहां लाल रंग का आसन लगायें। अगर घर में स्थान की कमी हो अथवा घर का वातावरण अशांत हो तो किसी भी एकांत स्थल या हनुमान जी के मंदिर में यह अनुष्ठान किया जा सकता है।
 हनुमान जी की उपासना एवं पाठ  से पूर्व गेंहू, चावल, मूंग, उड़द और काले तिल  के मिश्रित आटे  का दीपक बनाकर शुद्ध तिली के तेल तथा लाल रंग में रंगे सूत की पंचमुखी बत्ती से दीपक प्रज्वलित करना चाहिए। शुद्ध गूगल, धूप, लाल रंग के पुष्प, लाल चन्दन या लाल रोली आदि से हनुमान जी की ध्यान मग्न होकर उपासना करते हुए बजरंग बाण का पाठ करना चाहिए। यहाँ यह ध्यान देना आवश्यक है कि  एक ही बैठक में बजरंग बाण के एक सौ आठ पाठ पूरे किये जाएँ और इस दौरान दीपक लगातार प्रज्वलित होता रहे। पाठ पूर्ण होने पर हनुमान जी की आरती करके प्रसाद लगाया जाए और प्रसाद का वितरण भी किया जाए।
 सच्चे मन, शुद्ध चित्त व पवित्र भावना के साथ हनुमान जी की उपासना और बजरंग बाण का पाठ करने से हनुमान जी की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में आने वाले कष्ट तथा बाधाओं का निवारण होने लगता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद

श्री गणेशजी के पूजन से होती हैं मनोकामनाएं पूरी

समस्त देवताओं में प्रथम पूज्य विघ्नहर्ता रिद्धि-सिद्धि विनायक श्री गणेशजी सुख, समृद्धि, धन, ज्ञान विद्या और शांति के प्रदाता हैं। श्री गणेशजी के बारह स्वरूपों की पूजा अर्चना की जाती है। ये स्वरुप हैं : गजानन, लम्बोदर, एकदंत, भाल चन्द्र, मंगल मूर्ति, चतुर्भुज, कृष्ण पंगाक्ष, सिन्दूर् वर्ण, वक्र् तुंड, शूपकर्ण , ओमकार और महाकाय।

वास्तु शास्त्र में श्री गणेशजी के विधि-विधान से पूजन और उनकी प्रतिमा अथवा तस्वीर अनुकूल दिशा में लगाने मात्र से भवन अथवा व्यावसायिक प्रतिष्ठान में वास्तु दोषों का शमन होता है।
श्रीगणेशजी के पूजन के लिए प्रत्येक बुधवार या हर माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी का दिन् शुभ और विशेष लाभ देने वाला माना गया है। श्री गणेशजी के पूजन के लिए दूब , मोदक, सिन्दूर, लाल कनेर, लोंग , सुपारी और अक्षत आदि का उपयोग करना चाहिए।
श्री गणेशजी के पूजन में तुलसी दल का प्रयोग नहीं किया जाता है। श्री गणेशजी का पूजन पूर्ण श्रद्धा और विश्यास के साथ करने से श्री गणेशजी अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।
--- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद