Monday, 23 December 2013

ज्योतिष टिप्स

*  सोची हुई शुभ कामनाओं की पूर्ति के लिए नियमित रूप से प्रातः और सायं काल में सूर्य देव के दर्शन करके उन्हें श्रद्धापूर्वक नमस्कार करें।
* अगर किसी वजह से मन में दृढ़ संकल्प की कमी हो गयी हो तो स्फटिक के बनी भगवान शिव की पिंडी पर गंगा जल और बेल पत्र अर्पित करते हुए "ॐ नमः शिवाय" का जप करें।
*  शनि ग्रह के बुरे प्रभाव से अगर दुर्घटना, क़र्ज़, दुःख, बीमारी जैसी स्थिति हो तो काली वस्तुओं का दान करें।
*  रोग और दुखों की शांति के लिए पवित्र भाव से नियम पूर्वक प्रतिदिन अथवा प्रत्येक मंगलवार और शनिवार को सुंदरकांड का पाठ करें। *  हनुमान बाहुक का पाठ नियमित करते रहने से भी सभी रोगों में शांति मिलने लगती है।
*  गुरु ग्रह के शुभ प्रभाव में वृद्धि के लिए पुखराज या भृंगराज की जड़ शुभ मुहूर्त में गुरूवार के दिन पुष्य नक्षत्र में धारण करें।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिष एवं वास्तु सलाहकार

Thursday, 21 November 2013

वास्तु दोष भी है विवाह में विलम्ब का कारण

     वास्तु शास्त्र का सम्बन्ध हमारे सम्पूर्ण जीवन से है। भवन और जमीन की स्थिति, शयन करने के तरीके, बेड की स्थिति आदि का प्रभाव किसी न किसी रूप में हमारे ऊपर अवश्य ही पड़ता है। वास्तु दोष होने पर कैरियर, धन, संतान, दाम्पत्य जीवन, संतान की पढ़ाई और उनके विवाह आदि में समस्याएँ आने लगती हैं। सब कुछ ठीक होने के बावजूद अगर विवाह योग्य लड़के अथवा लड़की के विवाह में अनावश्यक विलम्ब हो रहा हो तो इसका कारण जन्म कुंडली में ग्रह दोष या वास्तु दोष हो सकता है।
    वास्तु के अनुसार गलत दिशा में लगाया गया बेड विवाह में बाधक होता है। लड़के को सदैव पूर्व या उत्तर-पूर्व दिशा अर्थात ईशान कोण में तथा लड़की को उत्तर-पश्चिम दिशा अर्थात वायव्य कोण में ही अपना बेड लगाना चाहिए।  
    बेड दीवार से अलग हटकर लगाना चाहिए। दीवार से सटाकर लगाया हुआ बेड दोषपूर्ण माना जाता है। बेड पर बैठकर भोजन करने से बचना चाहिए। सोते समय करवट बायीं  तरफ ही रहे। दाहिनी ओर करवट लेकर सोने से मानसिक अस्थिरता एवं नकारात्मकता बनी रहती है।
    बेड के नीचे किसी तरह का कोई सामान, कागज, कबाड़ा आदि नहीं रखना चाहिए। अगर बेड बॉक्स वाला है तो इस बात का विशेष ध्यान रखें कि उसमें केवल ओढ़ने-बिछाने के कपडे, चादर, रजाई, गद्दे, तकिया आदि ही रखें जाएँ। अन्य सामान भरने से नकारात्मक ऊर्जा का संचार होने लगता है। जिससे विवाह में बाधा आती है। 
     जगह की कमी की वजह से यदि बॉक्स वाले बेड में अन्य सामान रखना मजबूरी हो तो इस नकारात्मक प्रभाव से बचने के लिए बेड के नीचे एक बाउल में समुद्री या सेंधा नमक रखें या फिर बेड के चारों पायों के नीचे तांबे की एक-एक स्प्रिंग लगा दें। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल,फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार

Thursday, 14 November 2013

तुलसी विवाह कराने से मिलता है परम धाम

 तुलसी विवाह कराने से मिलता है परम धाम
     कार्तिक मास में तुलसी पूजन को विशेष महत्त्व दिया गया है। तुलसी को भगवान् विष्णु की प्रिया माना जाता है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी, दशमी तथा एकादशी तिथि को तुलसी का पूजन और व्रत  करके सुयोग्य ब्राह्मण को तुलसी का पौधा दान  करना शुभ फल प्रदान करने वाला माना गया है। इस मास में एकादशी तिथि के दूसरे दिन अर्थात द्वादशी तिथि को तुलसी विवाहोत्सव मनाया जाता है। 
    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो मनुष्य कार्तिक मास में तुलसी को कन्या के रूप में स्वीकार हुए भगवान विष्णु को कन्यादान करके तुलसी विवाह संपन्न कराता है, उसे परम धाम की प्राप्ति होती है। कुछ श्रद्धालु एकादशी तिथि से कार्तिक की पूर्णिमा तक तुलसी का पूजन करते हैं और पूर्णिमा के दिन तुलसी विवाहोत्सव मनाते हैं। 
    धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से तुलसी को भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना में अनिवार्य माना जाता है। तुलसी दल के बिना शालिग्राम अथवा विष्णु शिला का पूजन अपूर्ण माना जाता है। 
    तुलसी को वृंदा भी कहा गया है। वृंदा जालंधर नाम के एक राक्षस की पतिव्रता पत्नी थी। राक्षस के अत्याचार का अंत करने के उद्देश्य से भगवान विष्णु ने छल करते हुए वृंदा का  पतिव्रत धर्म नष्ट कर दिया जिससे नाराज होकर उसने भगवान विष्णु को श्राप  दिया और स्वयं पति के शव के साथ सती हो गयी। तब विष्णु भगवान ने पश्चाताप स्वरुप वृंदा की चिता की भस्म में तुलसी, आंवला एवं मालती के वृक्ष लगाये। इसी तुलसी को भगवान विष्णु ने वृंदा के रूप में मान्यता दी और तुलसी पूजन तथा तुलसी विवाह को आवश्यक बताया। 
    ज्योतिष और वास्तु शास्त्र में तुलसी के बारे में कहा गया है कि जिस घर में तुलसी का वास होता है वहाँ गृह दोष और वास्तु दोष नहीं रहते। घर के आँगन में तुलसी का पौधा लगाकर प्रतिदिन उस पर जल अर्पित करके दीप जलाकर पूजन करने से घर में रोग, शत्रु भय, धनाभाव और बुरी आत्माओं का कोई प्रभाव नहीं होने पाता है। तुलसी आसपास के पर्यावरण को पूर्णतः कीटाणुमुक्त बनाये रखती है। इसलिए हमें अपने घर में अनिवार्य रूप से तुलसी लगानी चाहिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल

Wednesday, 13 November 2013

वैवाहिक जीवन में सुख-शांति लाता है वास्तु अनुरूप बेडरूम

     आवासीय भवन में बेडरूम या शयन कक्ष एक ऐसा महत्वपूर्ण स्थान है जहाँ पति और पत्नी अपना अधिकाँश जीवन साथ-साथ बिताते हैं। लेकिन सब कुछ अच्छा होने के बावजूद बहुत बार यह देखने में आता है  कि उनके बीच बिना किसी उचित कारण के वाद-विवाद तथा मतभेद की स्थिति बनी रहती है जिसकी वजह से उनका पारिवारिक जीवन अशांत और कलहपूर्ण हो जाता है। 
     वैवाहिक जीवन में अगर इस तरह की स्थिति आ रही हो तो वास्तु की दृष्टि से अपने बेडरूम पर एक बार नजर अवश्य डाल लेनी चाहिए, क्योंकि हो सकता है कि बेडरूम वास्तु दोष से प्रभावित हो। वैवाहिक जीवन को खुशनुमा, सुखी और शांतपूर्ण बनाने के लिए अपने बेडरूम को वास्तु अनुरूप बनाना चाहिए।
+ भवन की दक्षिण-पश्चिम दिशा को बेडरूम के लिए उपयुक्त स्थान माना गया है। लेकिन स्थानाभाव होने पर पश्चिम, उत्तर-पश्चिम अथवा दक्षिण दिशा में भी बेडरूम बनाया जा सकता है। बच्चों के लिए शयन कक्ष पश्चिम दिशा में ही बनाना शुभ रहता है। 
+ बेडरूम की छत का समतल होना आवश्यक है। ढालू छत वास्तु के अनुसार  दोषपूर्ण है। यदि बेडरूम की छत ढालू है तो बेड छत की उस दिशा की ओर रखना चाहिए जहां छत  की ऊंचाई कम हो। 
+ पति-पत्नी के बीच आपसी प्रेम सम्बन्धों की मजबूती के लिएबेडरूम में दीवारों का रंग गुलाबी अथवा हल्का पीला रखा जाए तो अच्छा रहता है। नीला, लाल, काला या बेंगनी रंग अनावश्यक टकराव और मानसिक तनाव देता है। इसलिए बेडरूम में इन रंगों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। 
 + बेडरूम में लेंटर की बीम या लोहे की गाटर हो तो बेड को भूलकर भी इनके नीचे नहीं लगाना चाहिए बल्कि अलग हटकर ही सोने का स्थान बनाना चाहिए। 
+ बेडरूम में शयन करते समय किसी भी परिस्थिति में दक्षिण दिशा में पैर नहीं होने चाहिए। इसी प्रकार बेडरूम के मुख्य प्रवेश द्वार की और सिर या पैर करके शयन करना भी दोषपूर्ण माना गया है। पूर्व दिशा में पैर करके शयन करने से सुख समृद्धि तथा पश्चिम दिशा में पैर करके शयन करने से धार्मिक व आध्यात्मिक भावनाओं में वृद्धि होती है। 
+ बेडरूम में दर्पण लगी ड्रेसिंग टेबल सिर के सामने नहीं होनी चाहिए। अगर जगह की कमी हो तो शयन करने से पूर्व दर्पण को किसी वस्त्र या चादर से ढक देना चाहिए। 
+  बेडरूम में कभी भी झाडू, अँगीठी, तेल का भरा हुआ टिन, कढाही,चिमटा, जल से भरा बड़ा बर्तन, मछली घर, सामान रखने का टोकरा, नशीले पदार्थ, सफ़ेद या पीले रंग के संगमरमर से बनी कोई मूर्ति या वस्तु, पीपल, नीम या गूलर, गूलर के पत्ते या टहनी आदि अन्य अनुपयोगी सामान नहीं रखना चाहिए। 
+ बेडरूम में दीवार पर स्वस्थ, सुन्दर और हँसते हुए बच्चे का चित्र, राधा-कृष्ण का सयुंक्त चित्र, खिले हुए गुलाब के जोड़े का चित्र लगाया जाना शुभ होता है।  परन्तु सर्प, गिद्ध, उल्लू, बाज, कबूतर, कौआ, बगुला, चीता और युद्ध व राक्षसों के चित्र अथवा मूर्ति नहीं लगानी चाहिए। 
+ बेडरूम में रात्रि के समय जलाने के लिए लगाया जाने वाला बल्व सदैव उत्तर-पूर्व दिशा यानि ईशान कोण में ही लगाना चाहिए। शयन करते समय बेडरूम में पूर्ण अन्धकार रखना दोषपूर्ण होता है। प्रमोद कुमार अग्रवाल



Sunday, 10 November 2013

अक्षय नवमी के पूजन से नष्ट होते हैं महापाप

     कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को अक्षय नवमी के रूप में जाना जाता है। इसे आंवला नवमी तथा कुष्मांड नवमी भी कहा जाता है। इस दिन व्रत, पूजन, तर्पण और दान करने से मनुष्य के महापाप नष्ट हो जाते हैं। अक्षय नवमी पर प्रातः काल में सूर्योदय से पहले गंगा, यमुना आदि पवित्र नदी में स्नान करके आंवले के वृक्ष नीचे पूर्व दिशा की ओर मुख करके आंवले के वृक्ष का पूजन करने का विधान है। पूजन के लिए जल, अक्षत, रोली, बतासे, आंवला, गुड़, पुष्प, मिष्ठान आदि का प्रयोग किया जाता है। पूजन करते समय आंवले के वृक्ष की जड़ में दुग्ध मिश्रित जल चढ़ाकर शुद्ध घी का दीपक  जलाना चाहिए और वृक्ष के चारों ओर कपास का सूत लपेटते हुए एक सौ  आठ बार परिक्रमा लगानी चाहिए।
    अक्षय नवमी पर कही जाने वाली लोक कथा के अनुसार, एक साहूकार प्रत्येक वर्ष अक्षय नवमी वाले दिन आंवले के वृक्ष की पूजा करने के बाद उसके नीचे श्रद्धा भाव से ब्राह्मणों को भोजन कराता और उन्हें स्वर्ण दान करता। साहूकार के बेटों को यह सब करना नहीं सुहाता था तथा वे इसे फिजूलखर्ची मानते हुए साहूकार का विरोध करते थे।
     बेटों के इस व्यवहार से परेशान होकर एक दिन साहूकार घर से अलग हो गया और उसने एक दुकान लेकर उसके आगे आंवले का वृक्ष लगा दिया। साहूकार पहले की तरह आंवले के वृक्ष की सेवा करता और अक्षय नवमी आने पर उसकी पूजा-अर्चना करके ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान करता। जिससे उसका व्यापार जल्दी ही फलने-फूलने लगा और वह पहले से भी अधिक समृद्धशाली हो गया।
   उधर साहूकार के बेटों का व्यापार पूरी तरह ठप हो गया। जब उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ तो वे अपने पिता के पास आकर क्षमा मांगने लगे। साहूकार ने बेटों को क्षमा करते हुए उन्हें आंवला वृक्ष का पूजन करने को कहा। साहूकार की बात मानकर बेटों ने आंवला वृक्ष का पूजन कर दान करना  आरम्भ किया। जिसके प्रभाव से वे पहले की तरह सुखी और संपन्न हो गए। 
    अक्षय नवमी पर्व पर आंवले का पूजन करने के साथ-साथ पितरों को जल से तर्पण करना भी शुभ होता है। इस दिन ब्राह्मणों को आंवला, गुड़, गाय, स्वर्ण, वस्त्र, आभूषण, अनाज, चीनी, बतासे आदि का दान करने से ब्रह्म ह्त्या जैसे महापाप भी नष्ट हो जाते हैं तथा जीवन में सुख, समृद्धि, शांति एवं समस्त प्रकार से सुख प्राप्त हो -- प्रमोद कुमार अग्रवाल,फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार

Thursday, 7 November 2013

कार्तिक मास में आवश्यक हैं पांच आचरण

   देवताओं की आराधना के लिए कार्तिक मास को धार्मिक ग्रन्थों में अत्यन्त महत्वपूर्ण माना गया है। इस मास में श्रद्धालुओं के लिए पांच आचरणों का पालन करने पर जोर दिया जाता है। यह पांच आचरण हैं- दीप दान, पवित्र नदी में स्नान, तुलसी का पूजन, भूमि पर शयन, पवित्र आचरण बनाए रखना और दालों के सेवन से परहेज। कार्तिक मास में इन सभी आचरणों का नियम पूर्वक पालन करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होकर अपना शुभाशीष प्रदान करते हैं जिससे जीवन में आरोग्य, धन-सम्पदा, स्नेह, प्रेम, खुशहाली और अन्य लाभों की प्राप्ति होती है।
    कार्तिक मास में प्रथम पन्द्रह दिनों तक रात्रि में घोर अन्धकार रहता है। अन्धकार लक्ष्मी जी की कृपा मिलने में बाधक होता है, इसलिए इन दिनों घरों में अन्धकार नहीं रहने देना चाहिए तथा प्रतिदिन अन्धकार होते ही दीपक प्रज्वलित करना चाहिये। घर में प्रकाश बने रहने से बुरी आत्मायें अपना दुष्प्रभाव नहीं दिखातीं तथा लक्ष्मी जी के आशीर्वाद से घर में धन की कमी भी नहीं रहती। घरों के अलावा देव मन्दिर, सार्वजनिक मार्ग, गली, चौराहा, पीपल, तुलसी, आंवला आदि के पास भी दीपक प्रज्वलित करना चाहिए।
    कार्तिक मास में आरोग्य प्राप्ति और उसकी रक्षा के लिए प्रतिदिन सूर्योदय से पूर्व ही पवित्र नदी जैसे गंगा, यमुना, गोदावरी, कावेरी आदि में स्नान करने का विशेष महत्व बताया गया है। स्नान के बाद विधि पूर्वक भगवान विष्णु और लक्ष्मी की आराधना करनी चाहिए।
    कार्तिक मास भगवान विष्णु की पूजा के लिए समर्पित माना गया है। वे वृन्दा अर्थात तुलसी के हृदय में शालिग्राम के रुप में रहते हैं। इन दिनों प्रातः और साँय काल में तुलसी जी के समक्ष प्रतिदिन शुद्ध घी का दीपक जलाते हुए उनकी पूजा करनी चाहिए। भगवान को भोग लगाते समय भी उसमें तुलसी दल अवश्य डालना चाहिए। आयुर्वेद में तुलसी को बहुत से रोगों के उपचार के लिए रामवाण के समान माना गया है, इसलिए तुलसी का उपयोग किसी न किसी रुप में अवश्य करना चाहिए।
    कार्तिक मास को पवित्रता और धार्मिकता का पर्याय माना जाता है। इस मास की पवित्रता को बनाए रखते हुए अपने आचरण की शुद्धता पर खास ध्यान देना चाहिए। कोई भी ऐसा काम नहीं करना चाहिए जिससे किसी भी प्राणी को कष्ट हो।
     इस मास में शराब, नशीले पदार्थ, मांसाहार, प्याज, लहसुन तथा अन्य अखाद्य व तामसिक पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। आचरण की पवित्रता बने रहने से मन और बुद्धि के समस्त विकार दूर हो जाते हैं।
    प्राचीन काल में हमारे ऋषि मुनि रात्रि में स्वच्छ भूमि पर ही शयन करते थे क्योंकि इससे उनमें विलासिता की प्रवृत्ति उत्पन्न नहीं होने पाती थी। कार्तिक मास में अपने आप को विलासितापूर्ण जीवन से मुक्त बनाए रखने के लिए भूमि पर ही शयन करना चाहिए। शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए प्राकृतिक जीवन जीने को आवश्यक बताया गया है।
    कार्तिक मास मौसम परिवर्तन से भी जुड़ा है। इस मास में गरिष्ट और अधिक मिर्च-मसालेदार भोजन करने से परहेज करना ही हितकर है। इस मास में दालों के सेवन से बचना चाहिए बल्कि घीया, तोरई, परवल, गोभी, सेम, मटर, मूली, सिंघाडा, आंवला गन्ना, शकरकन्दी आदि का सेवन करना चाहिए।
    देखा जाए तो कार्तिक मास ही एक मात्र ऐसा मास है जिसमें एक दर्जन से भी अधिक त्यौहार होते हैं जैसे करवा चौथ, अहोई अष्टमी, तुलसी एकादशी, धनतेरस, नरक चतुर्दशी, लक्ष्मी पूजन, गोवर्धन पूजा, भाई  दूज, डाला छठ, अक्षय नवमी, देवठान एकादशी, तुलसी विवाह, कार्तिक पूर्णिमा। इस मास की महत्ता को ध्यान में रखते हुए इन त्योहारों को मनाना चाहिए और भगवान विष्णु से सर्व कल्याण की कामना करनी चाहिए।--प्रमोद कुमार अग्रवाल

Wednesday, 30 October 2013

आरोग्य और धन के लिए करें धन्वन्तरि की पूजा

    कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को धन त्रयोदशी या धनतेरस के रूप में मनाया जाता है इस तिथि से पाँच दिनों तक मनाये जाने वाले प्रकाश पर्व दीपावली का शुभारम्भ हो जाता है इस दिन देवताओं के वैद्य धन्वन्तरि समुद्र से अमृत कलश लेकर आये थे, इसलिए इस दिन को धन्वन्तरि जयंती के रूप में जाता है 
    धनतेरस के दिन जल, रोली, अक्षत, गुड़, पुष्प, नैवेद्य आदि से वैदिक देवता यमराज का पूजन किये जाने का विधान है इसके अलावा आटे का बना दीपक सरसों का तेल और रुई की चार बत्तियां डालकर घर के मुख्य प्रवेश द्वार पर जलाया जाता है इसे यमराज के लिए दीपदान माना जाता है ऐसा करने से घर के सदस्यों को अकाल मृत्यु का कोई भय नहीं रहता, यह शास्त्रों में वर्णित है
    धनतेरस के दिन जहाँ एक ओर वैद्य और हकीम भगवान धन्वन्तरि की पूजा अर्चना करते हैं वहीं घर-परिवारों में पुराने और टूटे-फूटे बर्तनों को बदलना, नए बर्तन और चांदी के सिक्के खरीदना शुभ समझा जाता है 
    धनतेरस की महत्ता के सम्बन्ध में प्रचलित एक कथा के अनुसार एक बार भगवान् विष्णु ने लक्ष्मीजी को नाराज होकर बारह वर्ष तक पृथ्वी लोक पर एक किसान के घर रहकर उसकी सेवा करने की श्राप दे दिया। लक्ष्मीजी के आशीर्वाद से किसान का घर धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया समय पूरा होने पर जब विष्णु भगवान् लक्ष्मीजी को लेने आये तो किसान ने उन्हें जाने से रोका। विष्णुजी ने किसान को समझाते हुए श्राप के बारे बताया और कहा कि चंचल स्वभाव की लक्ष्मीजी को कोई एक स्थान पर नहीं रोक सकता, तुम्हारा हठ करना निरर्थक है
    विष्णुजी की बात सुनकर लक्ष्मीजी ने किसान से कहा कि अगर तुम मुझे अपने यहाँ रोकना चाहते हो तो तुम धनतेरस वाले दिन घर को स्वच्छ रखना और रात्रि में घी  का दीपक जलाकर प्रकाश बनाए रखना। किसान ने लक्ष्मीजी के कहे अनुसार धनतेरस की रात्रि में दीपक जलाया और उनकी पूजा भी की लक्ष्मीजी की कृपा से किसान के घर धन-धान्य के भण्डार भर गए 
    धनतेरस के अवसर पर कही जाने वाली एक अन्य कथा के अनुसार, प्राचीन समय में हिम नाम के एक राजा के यहाँ पुत्र संतान की प्राप्ति हुई तो ज्योतिषियों ने यह भविष्यवाणी की कि इसकी मृत्यु विवाह के चौथे दिन सर्प के काटने से हो जायेगी। सोलह वर्ष की आयु में राजकुमार का विवाह एक राजकन्या के साथ हुआ राजकन्या को जब राजकुमार की मृत्यु के बारे में जानकारी हुई तो उसने विवाह के चौथे दिन सर्प के आने के सभी संभावित मार्गों पर हीरे-जवाहरात बिछाते हुए पूरे घर को प्रकाशमय बना दिया और स्वयं राजकुमार को भक्ति गीत सुनाने लगी। निर्धारित समय पर यम देवता सर्प का रूप धारण करके राजमहल में आये, परन्तु हीरे-जवाहरात के तेज प्रकाश एवं राजकुमारी के गीत-संगीत के कारण वे मन्त्र-मुग्ध होकर एक स्थान पर बैठ गए उन्हें प्रातः काल होने का पता ही नहीं चला विवश होकर यमराज को राजकुमार के प्राण लिए बिना ही वापस लौटना पड़ा जिस दिन राजकुमारी ने अपनी सूझ-बूझ से राजकुमार को यमराज के पंजे से बचाया उस दिन धनतेरस थी। इसलिए इस दिन यमराज से बचने के लिए दीपदान करने के साथ-साथ घर में पूरी रात्रि प्रकाश रखा जाता है 
    धनतेरस पर घरों के अलावा कार्तिक स्नान करके प्रदोष काल में देव मंदिर, पवित्र नदी के तट, गौशाला, बावली, कुआं, पीपल, तुलसी, वट वृक्ष, आंवला आदि के समीप तीन दिनों तक दीपक प्रज्वलित किये जाने का भी  विधान है तुला राशि के सूर्य में चतुर्दशी और अमावस्या के सांध्य काल में एक लकड़ी की मशाल बनाकर उसे जलाने से पितरों का मार्ग प्रशस्त होता है जिससे पितर प्रसन्न होकर अपना शुभ आशीर्वाद देते हैं और अकाल मृत्यु से हमारी रक्षा करते हैं। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल,फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार

अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाता है पंच महोत्सव पर्व दीपावली

भारतीय धर्म और संस्कृति में तीज त्योहारों के आयोजन को विशेष महत्त्व दिया गया  है ये त्यौहार हमारे अन्दर नव उत्साह का संचार तो करते ही हैं, राष्ट्रीय एकता और सद्भावना को भी मजबूत बनाते हैं कार्तिक मास में कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि से लेकर इसी मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि तक पांच दिवसीय दीपावली पर्व मनाया जाता है इसे पंच महोत्सव भी कहते हैं। सुख, समृद्धि, ज्ञान, आरोग्य और दीर्घायु प्रदान करने वाले इस पंच दिवसीय महोत्सव में पहले दिन धनतेरस, दूसरे दिन नरक चतुर्दशी, तीसरे दिन  दीपावली, चौथे दिन गोवर्धन पूजा और पांचवे व अंतिम दिन यम द्वितीया या भाई दूज का त्यौहार मनाया जाता है पांच दिनों तक चलने वाले इस अद्भुत पर्व पर प्रत्येक दिन सांध्य काल से लेकर रात्रि तक दीप जलाकर दीपदान करना अनिवार्य बताया  गया है
  धनतेरस : कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को धनतेरस होती है धनतेरस से दीपोत्सव का आगाज हो जाता है इस दिन मृत्यु के देवता यमराज को प्रसन्न करने के लिए दक्षिण दिशा की ओर मुख करते हुए उनकी पूजा करके सायंकाल आटे का दीपक जलाया जाता है पुराणों के अनुसार इस दिन आरोग्य और आयु के देवता भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिए इस दिन इनका पूजन भी किया जाता है और चांदी या अन्य धातु के नए बर्तन भी खरीदे जाते हैं। धनतेरस के दिन दीपदान करते समय "मृत्युना पाशहस्तेन कालेन भार्यया सहा त्रयोदश्यां  दीपदानात्सूर्यजः प्रीतयामिति।" मन्त्र का जप करना चाहिए। 
नरक चतुर्दशी : धनतेरस के दूसरे दिन नरक चतुर्दशी मनाई जाती है।  इसे रूप चौदस अथवा छोटी दीपावली भी कहते हैं। कहते हैं कि इस दिन श्री कृष्ण भगवान ने नरकासुर नाम के दैत्य को मारकर ब्रजवासियों को उसके अत्याचार से मुक्ति दिलाई थी। नरकासुर के मरने की खुशी में इस दिन दीपक जलाकर उत्सव मनाया गया था। नरक गमन से बचने के लिए इस अवसर पर प्रातः काल में आटा, सरसों का तेल और हल्दी का उबटन शरीर पर लगाते हैं और अपामार्ग पौधे की पत्तियां पानी में डालकर स्नान करते हैं। इस अवसर पर "सीता लष्टि सहायुक्तः संकश्टक दलान्वितः।  हर पापमपामार्ग भ्राम्यमाण पुनः पुनः।" मन्त्र का जप करने से दरिद्रता और कष्टों का नाश होता है। 
दीपावलीपंच महोत्सव के तीसरे दिन दीपावली का मुख्य त्यौहार मनाया जाता है। इस दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्री राम चौदह वर्ष के वनवास की अवधि पूरी करके अयोध्या लौटे थे तथा उनका राज्याभिषेक होने की खुशी में अयोध्या को दीपकों के प्रकाश से सजाया गया था और खुशियाँ मनाई गयी थीं। इस दिन जैन मत के अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर, महर्षि दयानंद सरस्वती और स्वामी राम तीर्थ ने निर्वाण प्राप्त किया था।  भगवान श्री कृष्ण भी दीपावली के दिन शरीर से मुक्त हुए थे।  दीपावली का पर्व प्रकाश का पर्याय है क्योंकि इस दिन धन की महादेवी लक्ष्मी जी, श्री गणेश जी के साथ-साथ ज्ञान की देवी सरस्वती जी की पूजा अर्चना की जाती है। धन, ज्ञान और विद्या प्राप्त करने के लिए दीपावली से श्रेष्ठ कोई दूसरा पर्व नहीं हो सकता है। कार्तिक अमावस्या को मनाई जाने वाली दीपावली पर घोर अन्धकार को दीपक जलाकर दूर किया जाता है। ये दीपक घरों में, तुलसी व पीपल वृक्ष पर जलाए जा सकते हैं।  दीप जलाते समय "शुभम करोति कल्याणं आरोग्य धन संपदा। शत्रु बुद्धि विनाशयः दीप ज्योति नमोस्तुते। " मन्त्र का जप अवश्य करना चाहिए। दीपावली की रात जागरण करके लक्ष्मी जी की साधना भी की जाती है 
गोवर्धन पूजा : दीपावली के दूसरे दिन अन्न कूट अर्थात गोवर्धन पूजा पर्व मनाया जाता है। इस दिन भगवान् श्री कृष्ण ने ब्रजवासियों को इंद्र की पूजा छोड़कर गोवर्धन पर्वत की पूजा करने का ज्ञान दिया था।  गौ माता के गोबर से गोवर्धन महाराज की प्रतिमा बनाकर रोली, अक्षत, मिष्ठान, खीर, पुष्प आदि से उनकी पूजा अर्चना करके परिक्रमा लगाई जाती है तथा दीपदान करके भगवान श्री कृष्ण एवं लक्ष्मी जी से सभी के कल्याण की  कामना की जाती है। गोवर्धन पूजा के समय "गोवर्धन धराधर गोकुल त्राणकारक।  विष्णु बाहुकृतोकच्छराय गवां कोटिप्रदो भव। "मन्त्र का जप करना चाहिए। गोवर्धन पूजा धार्मिक मान्यता से तो जुड़ा है ही, पर्यावरण की सुरक्षा का भी सन्देश देता है 
भई दूज : पंच महोत्सव के पांचवे और अंतिम दिन भाई दूज का पर्व मनाया जाता है।  इसे यम द्वितीया के रूप में भी जाना जाता है। कहते हैं इस दिन यम देवता ने अपनी बहन यमी को दर्शन दिए थे यमी के द्वारा किये गए आदर सत्कार से प्रसन्न होकर यम ने बहन को यह वरदान दिया कि जो भाई-बहन आज अर्थात कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को एक साथ पवित्र  यमुना नदी में स्नान करेंगे तो उनकी मुक्ति हो जायेगी।  इस दिन बहन अपने भाई के तिलक लगाकर स्नेह-प्रेम की अभिव्यक्ति करती हैं। बदले में भाई अपनी बहन को उपहार आदि प्रदान करते हैं।  भाई-बहन के पवित्र रिश्ते से जुड़े इस अद्भुत पर्व के मर्म को समझना चाहिए और निहित स्वार्थ के लिए इस रिश्ते को कलंकित होने से बचाना चाहिए।
कार्तिक मास में पांच दिनों तक मनाये जाने वाले इस महोत्सव के प्रभाव से जीवन में धन सुख, स्वास्थ्य सुख, शांति, सद्भाव और सम्पन्नता प्राप्त होने के साथ-साथ स्नेह-प्रेम का भी संचार होता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल,फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार

Monday, 21 October 2013

सौभाग्य और संतान देने वाला है करवा चौथ का व्रत

  पति के स्वास्थ्य, लम्बी आयु, और सौभाग्य के साथ-साथ संतान सुख प्राप्त करने के लिये विवाहित महिलाओं द्वारा करवा चौथ का व्रत रखा जाता है। यह व्रत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को होता है। इस दिन महिलायें निर्जला व्रत रखते हुये शाम को व्रत के महात्म की कथा सुनती हैं और रात में चंद्रमा निकलने पर उसे अर्घ्य देकर भोजन करके व्रत का परायण करती हैं।
     करवा चौथ का व्रत रखने वाली महिलाओं द्वारा मिलकर व्रत की कथा सुनते समय चीनी अथवा मिट्टी के करवे का आदान-प्रदान किया जाता है तथा घर की बुजुर्ग महिला जैसे ददिया सास, सास, ननद या अन्य सदस्य को बायना, सुहाग सामग्री, फल, मिठाई, मेवा, अन्न, दाल आदि एवं धनराशि देकर और उनके चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लिया जाता है। इस व्रत में भगवान शिव शंकर, माता पार्वती, कार्तिकेय, गणेश और चंद्र देवता की पूजा अर्चना करने का विधान है।
     करवा चौथ के संबंध में एक कथा का उल्लेख मिलता है। प्राचीनकाल में एक धर्मपरायण साहूकार के सात बेटे तथा एक बेटी थी। बडी होने पर बेटी का विवाह हो गया। विवाह के बाद जब वह अपने मायके आई तो करवा चौथ का दिन भी पडा। उसने उस दिन निर्जला व्रत रखा। चंद्रमा निकलने से पहले ही उसे भूख सताने लगी। भूख के कारण उसका कोमल चेहरा मुरझाने लगा। बहन की यह दशा देखकर उसके भाईयो ने एक दीपक जलाकर छलनी से ढकते हुये नकली चंद्रमा बनाया और बहन ने बोले कि चांद निकल आया है, अर्घ्य देकर व्रत खोल लो। अपने भाईयो की बात पर विश्वास करके बहन ने चंद्रमा को अर्घ्य दे  दिया और भोजन कर लिया । भोजन के  समय उसके ग्रास में बाल और कंकड निकले। उसकी ससुराल से पति के गंभीर बीमार होने का समाचार भी आ गया। वह तत्काल मायके से विलाप करती हुई अपनी ससुराल के लिये चल पडी।
     दैवयोग ऐसा रहा कि उसी समय इन्द्राणी देवदासियो के साथ आकाश मार्ग से निकाल रही थी। उसने विलाप करती बहन को देखा तो वह उसके पास आ गई  और विलाप करने का कारण पूछा। कारण जानने के बाद इन्द्राणी ने कहा कि तुमने करवा चौथ के व्रत में चन्द्रमा निकलने से पहले ही अन्न-जल ग्रहण कर लिया था, इस कारण ही तुम्हारे पति की यह दशा हो गई है। अपने पति के प्राणो की रक्षा के लिए तुम्हें एक वर्ष तक हर माह चतुर्थी तिथि को व्रत रखते हुए पति की सेवा करनी होगी। करवा चौथ वाले दिन निर्जल व्रत रखकर विधि-विधान से गौरा पार्वती, भगवान शिव, कार्तिकेय और गणेश की पूजा करके और रात्रि में चन्द्र दर्शन के बाद अर्घ्य देकर ही अन्न-जल ग्रहण करने से तुम्हें तुम्हारा सुहाग वापस मिल जाएगा।
     इन्द्राणी के कहे अनुसार उस कन्या ने एक वर्ष तक पूरे मनोयोग से अपने पति की सेवा की, हर माह की चतुर्थी तिथि को नियम धर्म से व्रत रखते  हुए करवा चौथ के दिन निर्जला व्रत रखा और रात्रि में चन्द्रमा निकलने पर उसे अर्घ्य देकर व्रत का परायण किया। उसके द्वारा चौथ माता से अपनी भूल के लिए क्षमा याचना करते हुए पति के स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना भी की गई. इससे चौथ माता ने प्रसन्न होकर उसके पति को स्वस्थ कर दिया।
     करवा चौथ की यह कथा सुनने से विवाहित महिलाओं का सुहाग बना रहता है, उनके घर में सुख, शान्ति,समृद्धि और सन्तान सुख मिलता है। महाभारत में भी करवा चौथ के महात्म पर एक कथा का उल्लेख मिलता है, जिसके अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने द्रोपदी को करवा चौथ की यह कथा सुनाते हुये कहा था कि पूर्ण श्रद्धा और विधि पूर्वक इस व्रत को करने से समस्त दुख दूर हो जाते हैं और जीवन में सुख-सौभाग्य तथा धन-धान्य की प्राप्ति होने लगती है। श्री कृष्ण भगवान की आज्ञा मानकर द्रोपदी ने भी करवा चौथ का व्रत रखा था। इस व्रत के प्रभाव से ही अर्जुन सहित पांचो पाण्डवो ने महाभारत के युद्ध में कौरवो की सेना को पराजित कर विजय हासिल की।
     करवा चौथ के व्रत में चन्द्रमा निकलने तक कुछ भी अन्न-जल ग्रहण नहीं किया जाता है, इसलिये व्रत रखने से पूर्व महिलाओं को एक दिन पहले रात्रि में अपनी रुचि के अनुसार भोजन, मिष्ठान, फल आदि का सेवन अवश्य कर लेना चाहिये। जिन महिलाओं को ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, खून की कमी आदि बीमारी हो अथवा वे गर्भवती हो तो उन्हे अपने डॉक्टर से सलाह लेने के बाद ही व्रत रखना चाहिये। व्रत खोलते समय खाली पेट सिर्फ पानी नहीं पीना चाहिये बल्कि पहले कुछ मीठा या फल खाने के बाद ही पानी लेना चाहिये। ताजा फलो का रस भी लिया जा सकता है। खाली पेट पानी पीने से ऐसीडिटी अथवा पेट दर्द की समस्या हो सकती है। व्रत के बाद भोजन एक साथ न करके थोडे-थोडे अंतराल पर ही करना चाहिये। भोजन में अधिक तले-भुने और गरिष्ट खाद्य पदार्थो के सेवन से बचना चाहिये। व्रत शरीर और मन की शुद्धता के लिये किये जाते हैं,  इसलिये यह आवश्यक है कि महिलाये समझदारी से व्रत रखे और अपने संपूर्ण परिवार की खुशहाली का माध्यम बने। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल,फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार

Thursday, 17 October 2013

18 अक्तूबर , 2013 : शरद पूर्णिमा पर विशेष:

     आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णमासी तिथि को शरद पूर्णिमा या कार्तिक पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने मुरली वादन करते हुये पतित पावनी यमुना जी के तट पर गोपियो के साथ रास रचाया था इसलिये इसे "रास पूर्णिमा" भी कहा जाता है. नारद पुराण में इस तिथि को "कोजागर व्रत" कहा गया है।  पुराण और शास्त्रों के अनुसार इस दिन विधि-विधान से व्रत करके धन की देवी महालक्ष्मी, श्री कृष्ण और चन्द्र देवता की आराधना करने से धन-धान्य, सुख-शान्ति एवं सद्गति की प्राप्ति होती है।
     नारद पुराण में कहा गया है कि शरद पूर्णिमा के दिन प्रातः स्नान करके उपवास रखते हुए जितेंद्रिय भाव से रहना चाहिये। ताम्बे अथवा मिट्टी के कलश पर वस्त्र और आभूषण से सुसज्जित लक्ष्मी जी की प्रतिमा स्थापित करके उनकी धूप,  दीप,पुष्प, नैवेद्य, अन्न, फल, शाक आदि से पूजन करते हुए घी, शक्कर, चावल तथा दूध से निर्मित खीर का प्रसाद लगाकर उसे चन्द्रमा की चाँदनी में रखना चाहिए। इस दिन रात्रि के समय दीप दान करना भी शुभ माना गया है।  ऐसा करने से मनुष्य इस लोक में सुख भोग कर अन्त मे विष्णुलोक को प्राप्त होता है।
    कहा जाता है कि शरद पूर्णिमा की रात में धन एवं समृद्धि की देवी महालक्ष्मी अपना रुप परिवर्तित करके भू लोक पर विचरण करते हुए यह देखती है कि कौन-कौन मनुष्य जागरण कर रहा है।  देवी भागवत के अनुसार जो मनुष्य इस रात्रि में पूर्ण श्रद्धा भाव, नियम-धर्म और पवित्र आचरण के साथ  भगवान विष्णु एवं लक्ष्मी की  पूजा-अर्चना करते हुए जागरण करता  है, उस पर लक्ष्मी जी की असीम कृपा होती है और उसके जीवन में सुख-समृद्धि, धन तथा शान्ति का कभी अभाव नही रह्ता है।
    शरद पूर्णिमा के दिन सन्तान सुख की कामना के साथ व्रत रखे जाने का भी विधान है।  इस सम्बन्ध में एक कथा प्रचलित है।  एक साहूकार की दो पुत्रियों में से एक पुत्री तो पूर्णमासी का व्रत विधि-विधान के साथ पूरा करती, जबकी दूसरी पुत्री आधे-अधूरे मन से व्रत रखती। इस कारण उसकी संतानें जीवित नहीं रह पाती थी।  एक बार जब उस पुत्री के नवजात पुत्र की मृत्यु हो गई तो उसने एक ब्राह्मण के कहे अनुसार अपने मृत पुत्र को पीढ़े पर लिटाकर कपडे से ढक दिया।  इसके बाद उसने अपनी बहन को बुलाया और उस पीढे पर बैठने को कहा।  जैसे ही उस बहन का वस्त्र मृत बच्चे के शरीर से छुआ, वह जीवित होकर रोने  लगा।  यह देखकर बहन क्रोधित हो गई और बोली, अगर पीढ़े पर बैठने से लड़का मर जाता तो क्या उसे कलंक नहीं लगता। बहन की बात सुनकर उसने कहा कि उसका पुत्र तो पहले से ही मृत था, वह तो तुम्हारे स्पर्श से जीवित हुआ है क्योंकि तुम जो श्रद्धा भाव से पूर्णमासी का व्रत करती हो वह उसी का पुण्य प्रभाव है।  इसके बाद उसने यह मुनादी  करवा दी कि जो भी स्त्री-पुरुष शरद पूर्णिमा का व्रत करेंगें, उनकी समस्त मनोकामनायें पूरी होंगी और उन्हे सन्तान का सुख भी प्राप्त होगा।
    शरद पूर्णिमा वाले दिन सायं काल में घर के मन्दिर में, तुलसीजी के पास, पीपल के वृक्ष के नीचे शुद्ध घी के दीपक प्रज्ज्वलित करने चाहिए। रात्रि में पूर्ण विधि-विधान से महालक्ष्मी का अनुष्ठान करते हुए पुरुष सूक्त, श्री सूक्त, लक्ष्मीस्तव, कनकधारा स्त्रोत का पाठ करना चाहिए। पाठ पूर्ण होने के बाद कमलगट्टा, सुपारी, पंचमेवा, नारियल, बेलफल, मखाने, हवन सामग्री आदि से मन्त्र "ॐ ह्रीं श्री दारिद्र्यनाशिन्यै नारायण प्रियवल्लभायै भगवत्यै महालक्ष्मये स्वाहा" का  जप करते हुए एक सौ आठ आहुतियों के साथ हवन करना चाहिए। यदि स्वयं पाठ करना सम्भव न हो तो किसी वैदिक ब्राह्मण से पाठ करवा कर एवं अपनी श्रद्धा के अनुसार भोजन कराकर अन्न, वस्त्र, फल, धन आदि दान देना चाहिए। इस प्रकार किए गए अनुष्ठान से अनन्त फल की प्राप्ति होती है।
    ज्योतिष मान्यता के अनुसार शरद पूर्णिमा की रात्रि में चन्द्र देवता शोडश कलाओं से परिपूर्ण होते है. इस रात्रि  चन्द्रमा का प्रकाश अन्य दिनों की अपेक्षा बहुत अधिक होता है।  इसलिए शरद पूर्णिमा की रात्रि में चन्द्रमा को जल या दुग्ध मिश्रित जल से अर्घ्य देना, चन्द्रमा की रोशनी में खीर रखना, सुई में धागा पिरोना, रात्रि में चन्द्र दर्शन करना जैसे कार्य करना शुभ फल देने वाले माने गए है।  विवाह होने के बाद जो स्त्री-पुरुष पूर्णमासी का व्रत रखना चाह्ते है, उन्हें शरद पूर्णिमा से ही व्रत की शुरुआत करनी चाहिए।
    जन्म कुण्डली में ग्रह दोष होने पर शरद पूर्णिमा की रात्रि में चन्द्रमा का पूजन करके "ॐ श्रां श्री श्रौ सः सोमाय नमः" मन्त्र का जप करने से ग्रह शान्ति होने के साथ-साथ महालक्ष्मी और चन्द्र देवता की कृपा से विभिन्न समस्यायों का समाधान होता है तथा जीवन में समस्त सुखों की प्राप्ति होती है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल,फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार

Friday, 11 October 2013

विजय का पर्व विजयदशमी

    विजय दशमी को समस्त कामनाओं की पूर्ति और विजय का पर्व माना जाता है धार्मिक ग्रन्थों  में आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को विजय दशमी पर्व मनाये जाने का विधान है। इस दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने अधर्म, अन्याय और अत्याचार के प्रतीक लंका के राजा रावण का वध किया था धार्मिक ग्रन्थों  अनुसार जब भी पृथ्वी पर धर्म की हानि होने से अन्याय, अत्याचार और अनाचार बढने लगते हैं, भगवान मनुष्य  शरीर धारण करके इस पृथ्वी पर अवतरित होते हैं 
    भगवान विष्णु के अवतार के रुप में प्रभु श्री राम ने भी ऋषि-मुनियों तथा राज्य की जनता को राक्षसो से निजात दिलाने के लिए चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को कर्क लग्न और पुनर्वसु नक्षत्र में कौशल नरेश दशरथ के यहाँ महारानी कौशल्या की कोख से जन्म लिया। भगवान श्री राम महानता की अद्भुत प्रतिमूर्ति थे उनकी लीलायें मनुष्यों के लिए आदर्श का पर्याय हैं गुरुकुल में निस्वार्थ भाव से गुरु सेवा, वचन पालन के लिए वन गमन, शरणागत की रक्षा, मित्र धर्म का निर्वहन, एक पत्नीव्रत पालन, भाई के प्रति प्रेम, शान्त-चित्त व्यक्तित्व, उदारता, दया भाव, समस्त चर-अचर जीवों के प्रति प्रेम एवं स्नेह- भगवान श्री राम के व्यक्तित्व और कृतित्व की महानता को दर्शाते हैं 
    चूकि विजय दशमी को समस्त मांगलिक कार्यो के लिये प्रशस्त माना जाता है, इसलिये ज्योतिष शास्त्र में इन इस तिथि को अबूझ मानते हुए इस दिन विभिन्न संस्कार युक्त कार्य जैसे बच्चे का नामकरण, अन्न प्राशन, मुंडन, कर्ण छेदन, यज्ञोपवीत, वेदारंभ, ग्रह प्रवेश, भूमि पूजन, नवीन व्यापार या दुकान का  उद्घाटन, नए वाहन या सामान की खरीद आदि कार्य किए जाने की अनुमति दी गयी है
    नवरात्र के नौ दिनों तक मा दुर्गाजी के नौ स्वरूपों की आराधना करके दशमी तिथि को विजय दशमी पर समस्त सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिए अत्यन्त पवित्र माने जाने वाले शमी वृक्ष और अस्त्र-शस्त्र की पूजा की जाती है पौराणिक कथा के अनुसार हनुमान जी ने जनक नन्दनी सीता जी को शमी के समान पवित्र कहा था, इसलिए माना जाता है कि इस दिन घर की पूर्व दिशा में या मुख्य स्थान में शमी की टहनी प्रतिष्ठित करके उसके पूजन से घर-परिवार में खुशहाली आती है और विवाहित महिलाओ का सौभाग्य अखण्ड बना रहता है
शमी के पूजन से मनुष्य के पाप और मुसीबतों का अन्त भी होता है 
रावण काम, क्रोध, मद्, लोभ और मोह जैसी बुराइयो का प्रतीक हैअयोध्या पति श्री राम ने रावण का वध करके संसार को यह संदेश दिया कि ये सभी बुराईया मनुष्य के पतन का कारण हैं ज्ञानी-ध्यानी और विद्वान होने के बावजूद अगर किसी मनुष्य में ये समस्त बुराइया विद्यमान हैं तो उसकी सारी योग्यतायें व्यर्थ हैं मनुष्य के बुरे कर्म एक न एक दिन उसके अन्त का कारण अवश्य ही  बनते हैं 
 विजय दशमी के दिन सकल सिद्धियों की प्रदाता अपराजिता देवी जी की पूजा-अर्चना भी की जाती है शास्त्रों के अनुसार अपराजिता देवी को मा दुर्गा भगवती का अवतार माना गया है इनके पूजन  से कार्यों में विजय हासिल होती है और जीवन में आने वाली परेशानियों एवं समस्यायों का अन्त होता है इसके अलावा जीवन में सभी कामों में सफलता पाने के लिए इस दिन रामरक्षास्त्रोत, श्री रामचरित मानस का सुन्दरकाण्ड और लंका काण्ड में वर्णित राम-रावण युद्ध का पाठ करना भी शुभ माना गया है  
    वर्तमान समय में श्री राम का सम्पूर्ण जीवन दर्शन न सिर्फ प्रासंगिक और अनुकरणीय है बल्कि मनुष्य के भीतर छिपे दुर्गुणों को दूर करने के लिए भी अनिवार्य है जिस प्रकार विजय दशमी पर्व  अधर्म पर धर्म की विजय का पर्व है उसी प्रकार भगवान श्री राम का आदर्श व्यक्तित्व महान और प्रभावशाली है जीवन में सुख, समृद्धि, कामनाओ की पूर्ति तथा विजय प्राप्त करने के लिए विजय दशमी पर्व पर श्री राम की आराधना करते हुए उनके आदर्शों को आत्मसात करने का संकल्प लेना चाहिए-- प्रमोद कुमार अग्रवाल,फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार

Tuesday, 8 October 2013

सही दिशा में लगा नल देता है शुभ प्रभाव

 समस्त घरों में पानी की आपूर्ति के लिए नल और पानी की टंकी अथवा टैंक लगवाये जाते हैं. वास्तुशास्त्र के अनुसार घर में सही दिशा में लगाया गया नल शुभ प्रभाव देने के साथ-साथ धन की समस्या को भी दूर करता है. जिन घरों में वास्तु के नियमों के विपरीत नल, पानी की टंकी, बोरिंग आदि लगे होते हैं, उनमें कई तरह की समस्यायों का सामना करना पड़ सकता है.
     वास्तु के अनुसार घर की पूर्व दिशा में नल या पानी की टंकी लगवाने से घर के मालिक के मान-सम्मान और ऐश्वर्य में वृद्धि होती है. इसी प्रकार घर की उत्तर दिशा में पानी का स्त्रोत अत्यंत लाभदायक और धन लाभ कराने वाला माना गया है. 
     घर के ईशान कोण अर्थात उत्तर-पूर्व दिशा में नल, पानी की टंकी या बोरिंग लगवाने से शुभ प्रभाव मिलने के साथ ही आर्थिक उन्नति के भरपूर अवसर भी मिलने लगते हैं. वहीँ घर की पश्चिम दिशा में नल या पानी का स्त्रोत रखने से उस घर के सदस्यों को मानसिक एवं शारीरिक समस्याओं से जूझना पड़ सकता है. 
     घर की दक्षिण दिशा में नल या पानी का स्त्रोत रखने से तरह-तरह के कष्टों का सामना करने की संभावनाएं बनी रहती हैं. विशेषकर घर की महिलाओं को ज्यादा कष्टों का सामना करना पड़ सकता है. दक्षिण-पूर्व दिशा में नल या पानी का कोई भी स्त्रोत होने से घर के मालिक के पुत्रों में विवाद रहता है, जबकि दक्षिण-पश्चिम दिशा में नल आदि होने से घर के सदस्यों को मृत्युतुल्य कष्ट मिलता है. घर के मध्य भाग में कोई कुं आ या पानी का भंडारण नहीं होना चाहिए।ऐसा होने से घर में बीमारियाँ, कलह और अर्थाभाव देखने को मिलता है. 
घर में लगे सभी नलों की उचित देख-रेख भी आवश्यक है. इस बात पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए कि घर में लगे किसी भी नल से पानी न टपकता हो. नलों से पानी का टपकना एक प्रकार का वास्तु दोष ही है. इसके कारण घर के मुखिया की आय कम होने लगती है, जबकि घर के खर्चे अधिक हो जाते हैं.  घर में सुख, शांति और समृद्धि के लिए नल और पानी के समस्त स्त्रोतों को वास्तु के अनुसार सही दिशा में ही रखा जाना चाहिए। --प्रमोद कुमार अग्रवाल, फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार 

Friday, 4 October 2013

दुर्गा सप्तशती पाठ से होती हैं मनोकामनाएं पूरी

    वैदिक ज्योतिष में प्रत्येक वर्ष चार नवरात्रों का उल्लेख मिलता है इन नवरात्रों में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में वासंतिक नवरात्र, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में शारदीय नवरात्र तथा आषाढ़ एवं माघ मास के शुक्ल पक्ष में गुप्त नवरात्र मनाये जाते हैं इन चारों नवरात्रों में आदि शक्ति माँ भगवती देवी की पूर्ण भक्ति भाव और उल्लास के साथ पूजा-अर्चना होती है कहा जाता है कि नवरात्र के दिनों में जो भक्त दुर्गा सप्तशती के साथ-साथ राम चरित मानस, रामायण का अखंड पाठ, नवाह्न पारायण पाठ करता है , उसे समस्त सुख और सिद्धि प्राप्त हो जाती हैं 
    नवरात्र में नौ दिनों तक महाशक्ति के रूप में माँ भगवती के नौ अलग-अलग स्वरूपों की विधि-विधान से आराधना की जाती है धर्म ग्रंथों में कहा गया है कि आदिशक्ति दुर्गा समस्त जगत का कल्याण करने वाली हैं इन्हीं से मरुदगण, गन्धर्व, इन्द्र देवता, अग्नि देवता, अश्वनी कुमार का उद्भव हुआ है. श्रद्धा, बुद्धि, मेधा और कल्याण की प्रदाता दुर्गा धर्म, सत्य, सदाचार, नीति, सृजन, शान्ति, और सुख की वाहक हैं इनकी उपासना मात्र से मनुष्यों के समस्त कष्ट एवं पाप दूर हो जाते हैं तथा जन्म कुंडली में स्थित ग्रह-नक्षत्रों के दोष और भवन के वास्तु दोष दूर हो जाते हैं 
    आश्विन मास के शुक्ल पक्ष के नवरात्रों में भगवती दुर्गा की पूजा-अर्चना विशेष फलदायी मानी गयी है इन दिनों प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती का श्रद्धापूर्वक और विधि-विधान से पाठ करने से जीवन में शांति, सुख-समृद्धि एवं सुविचारों का उदय होता है भविष्य पुराण के प्रतिसर्गपर्व के द्वितीय खंड के अनुसार दुर्गा सप्तशती के आदि चरित्र, मध्यम चरित्र और उत्तम चरित्र के माहात्म का ध्यान पूर्वक अध्ययन एवं मनन करने से मनुष्य को वेदों के पढने का फल मिलता है, उसके पाप नष्ट होते हैं तथा इस जन्म में समस्त सुख भोग करके वह अंत में परम गति को प्राप्त होता है 
     माँ भगवती की उपासना के दौरान दुर्गा सप्तशती  का पाठ करने से पूर्व भक्तों को स्नान आदि दैनिक कर्मों से निवृत्त होकर घर की पूर्व दिशा अथवा उत्तर-पूर्व दिशा में  देवी जी की प्रतिमा अथवा मूर्ति को एक स्वच्छ एवं ऊंचे आसन पर लाल वस्त्र बिछाकर विराजमान करना चाहिए तथा उनके समक्ष शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करना चाहिए। 
     दुर्गा सप्तशती के पाठ से पूर्व भगवान् श्री गणेश, भोलेनाथ, विष्णु भगवान, लक्ष्मीजी, सरस्वतीजी एवं महाकाली का ध्यान करना चाहिए। तत्पश्चात विधि पूर्वक कलश, पञ्च लोकपाल, दस दिकपाल, सोलह मातृका, नवग्रह आदि का पूजन करते हुए दुर्गा सप्तशती के तेरह अध्यायों का पाठ करना चाहिए। दुर्गा सप्तशती के पाठों में शापोद्धार सहित कवच, अर्गला, कीलक एवं तीनों रहस्यों को भी पढ़ना चाहिए। पाठ पूर्ण होने के बाद नवार्ण मन्त्र का 108 बार जप करना चाहिए। इसके बाद पुनः शापोद्धार, उत्कीलन, मृत संजीवनी विद्या के मन्त्र, ऋवेदोक्त देविसुक्त, प्राधानिक रहस्य, वैकृतिक रहस्य, मूर्ति रहस्य, सिद्धिकुंजिकास्त्रोत, क्षमा प्रार्थना, भैरवनामावली पाठ, आरती तथा मन्त्र पुष्पांजलि के साथ पाठ का समापन करना चाहिए। जो लोग किसी कारण से दुर्गा सप्तशती का पाठ करने में असमर्थ हों वे नवरात्र में व्रत रखकर प्रतिदिन माँ भगवती के समक्ष हवन व आरती कर सकते हैं 

    दुर्गा सप्तशती का पाठ करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए कि दुर्गा सप्तशती की पुस्तक अपने हाथ में या जमीन पर न रखी जाए बल्कि किसी आधार पर रखने के बाद ही दुर्गा सप्तशती का पाठ आरम्भ किया जाए पाठ करते समय न तो पाठ को मन ही मन में पढ़ा जाये और न ही पाठ का उच्चारण स्वर बहुत तेज हो बल्कि दुर्गा सप्तशती  का पाठ करते समय वाचक का स्वर संतुलित एवं मध्यम रहे पाठ करते समय मन को एकाग्रचित्त बनाये रखना भी बहुत आवश्यक है, वरना पाठ करने का कोई लाभ प्राप्त नहीं होगा। दुर्गा सप्तशती के पाठ के बाद माँ भगवती दुर्गा की जय-जयकार भी करनी चाहिए। 
     नवरात्र के दिनों में देवी पूजन की पूर्णता के लिए कन्या-लांगुरों की पूजा करके उन्हें प्रसाद देकर प्रसन्न करना भी जरुरी है इससे माँ भगवती की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है नवरात्र में विधि-विधान से देवी जी की आराधना करने से भक्तों के समस्त मानसिक और शारीरिक विकार दूर हो जाते हैं, जीवन में सुख, समृद्धि, सुख-शान्ति, सुरक्षा और विश्वास आने लगते हैं
    वर्तमान समय में जबकि आजकल चहुँ और अनीति, अनैतिकता, अन्याय, अशांति, अधर्म, असत्य और अनाचार का बोलबाला है, आदिशक्ति देवी की पूजा अर्चना और दुर्गा सप्तशती का पाठ सम्पूर्ण जगत के लिए कल्याकारी सिद्ध हो सकता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल,फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार

शारदीय नवरात्र में श्री राम और हनुमान उपासना से होता है कल्याण

     आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथिसे शारदीय नवरात्र का शुभारम्भ  है. इस तिथि से नौ दिनों तक दुर्गाजी की पूजा-अर्चना होती है और दशमी तिथि को विजय पर्व दशहरा का त्यौहार मनाया जाता है. नवरात्र और दशहरा एक-दूसरे के पर्याय हैं क्योकि जहाँ एक ओर इन दिनों जगत जननी माँ दुर्गा की आराधना होती है, वहीँ दूसरी ओर भगवान् विष्णु के अवतार भगवान् श्री राम के जन्म से लेकर कौशल राज्य के राजा के रूप में राजगद्दी सम्हालने और आगे तक की लीलाओं का मंचन किया जाता है.
  नवरात्र में माँ दुर्गा और प्रभु श्री राम की उपासना किये जाने के सम्बन्ध में यह  माना जाता है कि रावण पर विजय प्राप्त करने के लिए श्री राम ने आश्विन मास में माँ शक्ति की आराध्य दुर्गाजी के काली स्वरुप की श्रद्धा भाव से पूजा-अर्चना करके उनका आशीर्वाद प्राप्त किया था. 
  मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्री राम ने दुर्गाजी की कृपा से अपने सहयोगियों सुग्रीव, विभीषण, जामवंत, हनुमान, अंगद आदि के नेतृत्व में लंकापति रावन के साथ युद्ध किया और उस पर विजय प्राप्त करके अन्याय और अत्याचार के युग का अंत किया। उसी समय से नवरात्र पूजन का चलन हुआ माना जाता है. नवरात्र पूजन के दौरान दुर्गाजी की भक्ति के साथ-साथ श्री  रामजी  की विशेष कृपा प्राप्त करने के लिए रामायण का अखंड पाठ और श्री राम के अनन्य भक्त मारुती नन्दन अंजनी पुत्र पवनसुत हनुमान जी की भी आराधना की जाती है. हनुमान जी के दिव्य एवं संकटमोचक चरित्र को जानने के लिए श्रीरामचरित मानस का सुन्दरकाण्ड और हनुमान चालीसा अद्भुत ग्रन्थ हैं. रुद्रावतार श्री हनुमान की श्री राम के प्रति अनन्य भक्ति, समर्पण भाव, निःस्वार्थ  प्रेम, मित्रता, वफादारी, परोपकार की भावना अपने आप में एक  मिसाल है. सदैव अमरता का वरदान प्राप्त हनुमान जी की उपासना और श्रद्धा भाव से उनके नाम का स्मरण मंगलकारी, विघ्ननाशक तथा संकटमोचक है.
   कहते हैं कि प्रभु श्री राम की कृपा से हनुमान जी को सदैव अमरता का वरदान मिला हुआ है. जहाँ कहीं भी रामायण का पाठ होता है, श्री राम जी की महिमा का बखान होता है अथवा दुर्गाजी की आराधना होती है, वहां हनुमान जी अवश्य ही उपस्थित रहते हैं. हनुमानजी के ह्रदय में दुर्गा जी के प्रति इतना अधिक प्रेम और श्रद्धा है कि वे स्वयं उनके आगे-आगे विजय पताका यानि ध्वज लेकर चलते हैं. जिस प्रकार दुर्गाजी लाल वस्त्र एवं चुनरी धारण करतीहैं, उसी प्रकार हनुमानजी भी अपने शरीर पर लाल सिन्दूर और लाल वस्त्र धारण करना पसंद करते हैं. दुर्गाजी के समान ही हनुमानजी पर लाल रंग के पुष्प जैसे लाल  कनेर,कुमुद, केतकी, मालती, मल्लिका, नागकेसर, कमल आदि अर्पित किये जाते हैं. 
    नवरात्र में दुर्गाजी और श्री रामजी की अद्भुत कृपा पाने के लिए तुलसी दास द्वारा रचित श्री हनुमान चालीसा का पाठ किया जाता है. वहीँ सुन्दरकाण्ड का पाठ करके हनुमान जी को प्रसन्न किया जा सकता है. वैसे तो सम्पूर्ण हनुमान चालीसा की प्रत्येक चौपाई तथा दोहे चमत्कारी  प्रभाव रखते हैं, फिर भी इसकी कुछ चौपाइयाँ ऐसी हैं जिनके पढ़ने और स्मरण करते रहने से बहुत से कष्ट, रोग एवं समस्याओं का त्वरित समाधान हो जाता है. 
     मन की शुद्धता और बुरे विचारों को दूर करने के लिए "महावीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी।।"का पाठ करना चाहिए। भूत-प्रेत जैसी बाधा से मुक्ति पाने के लिए "भूत पिसाच निकट नहीं आवैं। महाबीर जब नाम सुनावै।।" का जप करना चाहिए। शारीरिक एवं मानसिक बीमारियों में लाभ प्राप्त करने के लिए "नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा।। का पाठ बार-बार करना चाहिए।
     जीवन में आने वाले तरह-तरह के संकटों से बचने के लिए हनुमान चालीसा की ये दो चौपाई सहायता करती हैं:-"संकट ते हनुमान छुडावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।"तथा  "संकट कटे मिटे सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।" मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए "और मनोरथ  जो कोई लावै। सोई अमित जीवन फल पावै।।" का जप करना लाभकारी होता है.
    जीवन की विभिन्न समस्याओं से मुक्ति पाने के लिए सुन्दरकाण्ड का पाठ भी श्रद्धापूर्वक किया जा सकता है. वैसे तो सुन्दरकाण्ड के नियमित पाठ से शीघ्र लाभ मिलता है, लेकिन अगर समय का अभाव हो तो सप्ताह में दो बार अर्थात मंगलवार और शनिवार को यह पाठ अवश्य करना चाहिए। कहते हैं कि हनुमान उपासना एवं सुन्दरकाण्ड का पाठ करने से दोषपूर्ण मंगल और शनि ग्रह के दुष्प्रभाव भी दूर होने लगते हैं.                 सुन्दरकाण्ड का पाठ करने से संतान बाधा, व्यापार बाधा, असाध्य रोग, शत्रु पीड़ा, परिश्रम के बावजूद असफलता, वास्तु दोष आदि दूर होने लगते हैं और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सकारात्मकता एवं शुभता आने लगती है.
सुन्दरकाण्ड में दी गयी चौपाई "प्रबिसि नगर कीजे सब काजा, ह्रदय राखि कौसलपुर राजा।" ; " गरल सुधा रिपु करहिं मिताई, गोपद सिंधु अनल सितलाई।" ; "दीन दयाल बिरदु संभारी, हरहूँ नाथ मम संकट भारी।" ;  "अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता।।" ; "आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना।।" ; " तुम्ह कृपाल  अनुकूला। ताहि  न ब्याप त्रिबिध भव सूला" ; "करहुं कृपा प्रभु अस  । निर्भर प्रेम मगन हनुमाना।।" ; "कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटी बिलोकत सकल सभीता।।" ; "देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महूँ गरुड़ असंका।।" ; "सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा।।" का पाठ करने से आशातीत लाभ होते हैं.  
     जीवन में रोग, कष्ट और समस्याओं निजात पाने के लिए हनुमान जी की उपासना और उपरोक्त पाठ करना विशेष फलदायी होता है तथा भक्तों पर हनुमान जी एवं प्रभु श्री राम तथा जानकी जी की कृपा  बनी रहती है.-- प्रमोद कुमार अग्रवाल,फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार

जन-जन के प्रणेता हैं महाराजा अग्रसेन

     एक ईंट और एक रूपया देकर समाज के कमजोर वर्ग के लोगों का आर्थिक विकास करके समतावाद स्थापित करने का स्वप्न साकार करने वाले अग्रवाल शिरोमणि महाराजा अग्रसेन का नाम जन-जन के प्रणेता के रूप में सम्मान के साथ लिया जाता है प्रताप नगर के सूर्यवंशी क्षत्रिय राजा वल्लभ तथा महारानी भगवती के पुत्र अग्रसेन बचपन से ही अत्यंत तेजस्वी एवं मेधावी थे 
     अग्रसेन की योग्यता, शास्त्रों में निपुणता, सहिष्णुता, करुणा, सौम्यता, सौहार्दता और दयाभाव से प्रभावित होकर नागराज कुमुट की सुपुत्री माधवी ने अपने स्वयंवर में पधारे वीर योद्धा, महाराजा, देवता और राजाओं को छोड़कर अग्रसेन के गले में वरमाला डाल कर उनका पति के रूप में वरण कर लिया जिससे देवराज इंद्र ने नाराज होकर उनके राज्य में वर्षा नहीं की. परिणामस्वरूप राज्य में सूखा पड़ने से प्रजा में त्राहि-त्राहि मच गयी, परन्तु अग्रसेन जी ने विचलित हुए बिना अपने इष्ट देव भगवान् शिव की आराधना की भगवान् शिव की अनुकम्पा से अग्रसेन जी के राज्य में न केवल प्रचुर वर्षा हुई बल्कि वहां सुख-समृद्धि और खुशहाली आ गयी
     महाराजा अग्रसेन ने समता और समाजवाद पर आधारित एक ऐसे समाज की स्थापना की जहाँ न तो कोई छोटा था और न कोई बड़ा उन्होनें अपने राज्य में समस्त निवासियों के लिए धन-संपदा एवं वैभव हेतु महालक्ष्मी जी की कठोर तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया और उनसे समस्त सिद्धि और धन-वैभव प्राप्त होने का आशीर्वाद लिया।
     महाराजा अग्रसेन ने अपने राज्य में यज्ञ के समय दी जाने वाली पशु-बलि का न सिर्फ विरोध किया बल्कि यह आदेश भी लागू कर दिया कि राज्य का कोई भी मनुष्य पशुओं की बलि नहीं चढ़ाएगा और न ही पशुओं का वध करके उनका मांस भक्षण करेगा। अग्रसेन जी का कहना था कि मनुष्यों के समान समस्त जीव-जंतुओं में भी प्राण होते हैं उनका वध करने का अर्थ है जीवों के प्रति हिंसा।
     समस्त वेद, वेदों के छः अंग, निरुक्त ज्ञान, ज्योतिष, व्याकरण, कल्प शिक्षा, अस्त्र-शस्त्र संचालन आदि में प्रवीण महाराजा अग्रसेन ने अग्रोहा गणराज्य की स्थापना की उनके राज्य के निवासियों को योध्या तथा अगेया के नाम से जाना जाता था उनके राज्य में कहीं कोई दुखी व दरिद्र नहीं था कहते हैं कि उनके राज्य में करीब एक लाख परिवार निवास करते थे। जब भी कोई नया व्यक्ति बाहर से आकर परिवार सहित उनके राज्य में बसना चाहता, एक ईंट-एक रूपया नीति के तहत उसे बसने के लिए एक लाख ईंट और व्यवसाय के लिए एक लाख रुपये मिल जाते। 
    समाज के निर्धन वर्ग के उत्थान की दिशा में महाराजा अग्रसेन की यह नीति अपने आप में अनोखी थी क्योंकि इसमें समाज के पारस्परिक सहयोग से राज्य के समस्त नागरिकों को समानता का अधिकार देने की निःस्वार्थ भावना थी जिसमें किसी तरह का कोई भेद-भाव, दाता अथवा याचक का भाव नहीं होता था
    गुरुसेवी, सत्यवादी, कूटनीतिज्ञ, प्रजापालक, कुशल शासक, दूरदर्शी एवं वीर योद्धा के रूप में महाराजा अग्रसेन ने अपने राज्य पर आक्रमण करने वाले राजाओं को पराजित किया और अनेक युद्धों में विजय पताका फहराई। अग्रसेन जी ने एक सौ आठ वर्षों तक कुशलतापूर्वक शासन करके दुनिया को यह सन्देश दिया कि स्व हित का त्याग करके राज्य की जनता की भलाई के लिए पूर्ण समर्पण भाव से राजा के कर्तव्यों का निर्वहन करना ही सबसे बड़ी सेवा है
    महाराजा अग्रसेन जी ने अपने राज्य में जनहित में स्कूल, अस्पताल, धर्मशालाएं, बावडी आदि का निर्माण कराया।  महाराजा अग्रसेन जी ने काम, क्रोध, लोभ और मद को अपने वश में रखने तथा सदैव धर्मपूर्ण आचरण पर चलने की शिक्षा समाज को दी उन्होनें अपने राज्य में आत्मनिर्भरता, समानता, जीवन मूल्य, धार्मिक सहिष्णुता, समाजवाद, निष्काम कर्म, दयालुता, सत्यवादिता, कृतज्ञता जैसे दिव्य आदर्श गुणों को आत्मसात करने की प्रेरणा दी
    जन-जन के प्रणेता महाराज अग्रसेन जी का सम्पूर्ण जीवन दर्शन सभी के लिए न सिर्फ अनुकरणीय है बल्कि वर्तमान समय के लिए सामयिक भी है।अग्रसेन जी के बताये गए सिद्धांत और नीतियों को अपनाकर एक सुखी, समृद्ध और सामाजिक समरसता पर आधारित समाज की स्थापना की जा सकती है, इसमें कोई सन्देह नहीं है--- प्रमोद कुमार अग्रवाल, फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार 

Monday, 30 September 2013

माँ भगवती की आराधना से मिलेगी विद्या

    वर्तमान समय में प्रतियोगी परीक्षाओं की बढ़ती प्रतिस्पर्धा और उच्चतर शिक्षा एवं ज्ञान हासिल करके समस्त सुख-सुविधायें प्राप्त करने की तीव्र अभिलाषा   ने युवक तथा युवतियों को अति व्यस्त बना दिया है. अपने लक्ष्य को पाने के लिए वे दिन-रात मेहनत करते हैं, परन्तु कई बार के प्रयासों के बावजूद असफलता  ही हाथ लगती है. विद्या एवं ज्ञान की प्राप्ति के लिए शक्ति की आराध्या माँ भगवती की आराधना की जा सकती है. 
     शुक्ल पक्ष के किसी भी रविवार, सोमवार अथवा शुक्रवार से आरम्भ करके प्रतिदिन प्रातः काल में एकाग्रचित्त होकर माँ भगवती के सामने आसन लगाकर पूर्ण भक्ति भावना  के साथ इस श्लोक का 51 अथवा 101 बार जप करना चाहिए-
" जयंती मंगला काली भद्र  काली कपालिनी। 
  दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते।। 
 विद्या वन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु। 
 रूपं देहि  जयं देहि यशो देहि द्विषोजही।।"
     श्लोक पठन  से पूर्व जप करने वाले व्यक्ति को जगतजननी माँ दुर्गा भगवती के चित्र पर पुष्प माला अर्पित करके उनके समक्ष शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करना चाहिए तथा पुष्प, अक्षत, रोली आदि से पूजा-अर्चना करते हुए माँ भगवती, भगवान् शिव और गणेशजी का ध्यान करना चाहिए।श्लोक का उच्चारण करते समय स्वर मध्यम ही रहना चाहिए। 
     श्रद्धा और विश्वास के साथ इस श्लोक का नियमित जप करने से विद्या और लक्ष्मी की प्राप्ति के योग प्रबल बनते हैं. --- प्रमोद कुमार अग्रवाल, फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार 

Thursday, 19 September 2013

पितृ ऋण से मुक्ति देता है श्राद्ध कर्म

वैदिक कर्मकांड के अंतर्गत होने वाले पांच महायज्ञों में श्राद्ध कार्य को विशेष महत्त्व दिया है. श्राद्ध में पिंड दान, तर्पण और ब्राहमण भोजन शामिल हैं. ऐसा माना जाता है कि ऋण से मुक्त होने के लिए पुत्र को श्राद्ध कर्म का पालन आवश्यक रूप से करना चाहिए। पुराणों के  अनुसार माता-पिता अथवा अन्य पूर्वजों की निर्वाण तिथि पर गया में पिंड दान करने, ब्राह्मण को भोजन कराने और तर्पण करने से पुत्र को पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है.
   पितृ पक्ष में सूर्य देवता कन्या राशि के दशम अंश पर आते हैं और वहां से तुला राशि की ओर गमन करते हैं. सूर्य देव की इस गति को कन्यागत सूर्य कहा जाता है. इस स्थिति में अपने पितरों का श्राद्ध करना आवश्यक माना गया है. प्रति वर्ष आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से अमावस्या तिथि तक श्राद्ध पक्ष होता है. इस वर्ष 20 सितम्बर से पितृ पक्ष आरम्भ हो रहे हैं. 
श्राद्ध पक्ष में अपने दिवंगत पूर्वजों की शांति और तृप्ति के निमित्त पकाए हुए शुद्ध पकवान, दूध, दही, घी, मिष्ठान आदि का दान करने का विधान है. 
     ब्रह्म पुराण के अनुसार श्रद्धा पूर्वक किये गए श्राद्ध से पित्रगण  प्रसन्न होकर मनुष्य को धन, संतान, विद्या, आरोग्य, लौकिक सुख, मोक्ष एवं स्वर्ग प्रदान करते हैं. याग्वल्क्य के मतानुसार श्राद्ध करने के पुण्य प्रभाव से दीर्घायु, आज्ञाकारी पुत्र, धन, विद्या, दुर्लभ मोक्ष, संसार के समस्त सुख आदि प्राप्त होते हैं. 
   वर्ष की जिस तिथि को पूर्वज दिवंगत हुए हैं, उसी तिथि वाले दिन श्राद्ध करना चाहिए। इसके लिए श्राद्ध वाले दिन मनुष्य को प्रातः नित्य कर्मों से निवृत्त होने के उपरांत सुयोग्य ब्राह्मण को अपने यहाँ भोजन के लिए श्रद्धा पूर्वक आमंत्रित करना चाहिए। विष्णु पुराण में कहा गया है कि श्राद्ध और तर्पण से पितृगण तृप्त और प्रसन्न होकर समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करते हैं. इसलिए श्राद्ध वाले दिन ब्राह्मण को शुद्ध भोजन, वस्त्र, अन्न, दक्षिणा आदि देकर प्रसन्न करना चाहिए। इसके अलावा पकाए गए भोजन में से ,गौ माता, श्वान, काक, चींटी और देवताओं के नाम से भी ग्रास निकालना चाहिए। श्राद्ध कर्म की इस प्रक्रिया में भोजन के कुछ अंश को अग्नि देव को समर्पित करके भी जल से तर्पण किया जाता है. 
श्राद्ध कर्म के लिए इस बात का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए कि श्राद्ध सदैव अपने घर पर ही किया जाये। किसी दुसरे के घर पर किया गया श्राद्ध निषिद्ध होता है. श्राद्ध करते समय किसी तरह का दिखावा नहीं करना चाहिए तथा अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार ही श्राद्ध में दान आदि करना उचित रहता है. धन के अभाव में घर में निर्मित खाद्य पदार्थ को अग्नि को समर्पित करके जल से तर्पण करते हुए गौ माता को खिला कर भी श्राद्ध कर्म पूर्ण किया जा सकता है. 
   श्राद्ध कर्म में कभी भी बासी अथवा अखाद्य पदार्थ नहीं परोसने चाहिए।धार्मिक ग्रंथों के अनुसार श्राद्ध के भोजन में बेंगन, गाजर, मसूर की दाल, अरहर की दाल, हींग, प्याज, लहसुन, काला नमक, गोल लौकी,  जामुन,महुआ, चना, अलसी, काला  जीरा,पीली सरसों, आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए अन्यथा श्राद्ध प्रभावहीन हो जाता है. 
  श्राद्ध पक्ष में किसी भी तरह के शुभ और मंगल कार्य को करना निषिद्ध माना गया है. इसके अलावा इन दिनों बाल कटवाना, घर में दही बिलोना, देव प्रतिमा की प्रतिष्ठा करना, नए वस्त्र  खरीदना,मकान में पेंट या पुताई करवाना, संतान का विवाह करना अथवा विवाह की बात चलाना, नए मकान का मुहूर्त करना, कुआ खुदवाना, किसी नए कार्य या व्यापार की शुरुआत करना भी अशुभ माना गया है.  
   श्राद्ध के सम्बन्ध में यह जानना भी आवश्यक है कि जन्म देने वाले पूर्वजों जैसे  दादा-दादी और माता-पिता की मृत्यु के प्रथम वर्ष में श्राद्ध नहीं करना चाहिए। श्राद्ध करने का सही समय अपराह्न काल है. पूर्वाह्न में, सायं काल में, रात्रि के समय, चतुर्दशी तिथि को और परिवार के किसी सदस्य या स्वयं के जन्म दिन को श्राद्ध नहीं करना चाहिए। कूर्म पुराण में कहा गया है कि अग्नि या विष आदि द्वारा आत्महत्या करके मृत्यु को प्राप्त व्यक्ति का श्राद्ध नहीं करना चाहिए। जिन पितृगण की मृत्यु चतुर्दशी तिथि को हुई हो, उनका श्राद्ध अमावस्या की तिथि वाले दिन करना चाहिए। युद्ध के दौरान शस्त्र से मृत्यु को प्राप्त पितरों का श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को किया जा सकता है. 
   श्राद्ध पक्ष वास्तव में पितरों को याद करके उनके प्रति श्रद्धा भाव प्रदर्शित करने और नयी पीढी को अपनी प्राचीन वैदिक और पौराणिक संस्कृति से अवगत करवाने का पर्व है. इस पक्ष में ब्राह्मण को भोजन करने, दान-दक्षिणा आदि देने से हमारे पापों का अंत होता है, ग्रहों के दुष्प्रभाव दूर होते हैं और पितरों का आशीर्वाद एवं कृपा प्राप्त होने से समस्त सुख-सुविधाएं मिलने लगती हैं. पितरों का श्राद्ध करने से जन्म कुंडली में पितृ दोष से भी छुटकारा मिलता है.--- प्रमोद कुमार अग्रवाल, फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार 

श्राद्ध कर्मों के लिए सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है गया

मृत पूर्वजों का आशीर्वाद और भगवान् विष्णु की कृपा प्राप्ति के लिए श्राद्ध कर्म करने का विधान पुराणों में मिलता है. भविष्य पुराण में कहा गया है कि श्राद्ध बारह तरह के होते हैं, जिनके नाम हैं- नित्य श्राद्ध, नैमित्यिक श्राद्ध, काम्य श्राद्ध, वृद्धि श्राद्ध, सपिण्डन श्राद्ध, पार्वण श्राद्ध, गोष्ठ श्राद्ध, शुद्धि श्राद्ध, कर्मांग श्राद्ध, दैविक श्राद्ध, औपचारिक श्राद्ध और साम्वत्सरिक श्राद्ध। इन समस्त श्राद्धों में साम्वत्सरिक श्राद्ध को सबसे श्रेष्ठ माना गया है. साम्वत्सरिक श्राद्ध मृत पूर्वज की मृत्यु की तिथि वाले दिन किया जाता है. 
   पुराणों की अनुसार पितरों का श्राद्ध और तर्पण करने के लिए गया से श्रेष्ठ स्थान कोई दूसरा नहीं है. कहा जाता है कि गया में स्वयं भगवान् विष्णु पितृ देवता के रूप में निवास करते हैं. गया तीर्थ में श्राद्ध कर्म पूर्ण करने के बाद भगवान विष्णु के दर्शन करने से मनुष्य पितृ ऋण, माता के ऋण और गुरु के ऋण से मुक्त हो जाता है. पूर्ण श्रद्धा और विधि-विधान के साथ श्राद्ध और तर्पण करने से पितृ, देवता, गन्धर्व, यक्ष आदि अपना शुभ आशीर्वाद देते हैं जिससे मनुष्य के समस्त पापों का अंत हो जाता है. 
   गया तीर्थ में पितरों का श्राद्ध और तर्पण किये जाने के बारे में एक प्राचीन कथा का उल्लेख पुराणों में मिलता है. कथा के अनुसार, गयासुर नाम के एक अत्यंत पराक्रमी असुर ने घोर तपस्या करके भगवान् से आशीर्वाद प्राप्त कर लिया। भगवान् से मिले आशीर्वाद का सदुपयोग न करके गयासुर ने देवताओं को ही परेशान करना शुरू कर दिया। गयासुर के अत्याचार से संतप्त देवताओं ने भगवान् विष्णु की शरण ली और उनसे प्रार्थना की कि  वे गयासुर से देवताओं की रक्षाकरें।  इस पर भगवान् विष्णु ने अपनी गदा से गयासुर का वध कर दिया। बाद में भगवान् विष्णु ने गयासुर के सर पर एक पत्थर रख कर उसे मोक्ष प्रदान किया। कहते हैं कि गया स्थित विष्णुपद मंदिर में वह पत्थर आज भी मौजूद है. भगवान् विष्णु द्वारा गदा से गयासुर का वध किये जाने से उन्हें गया तीर्थ में मुक्तिदाता माना गया. 
   कहा जाता है कि गया में यज्ञ, श्राद्ध, तर्पण और पिंड दान करने से मनुष्य को स्वर्गलोक एवं ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है. गया के धर्म पृष्ठ, ब्रह्म सप्त, गया शीर्ष और अक्षय वट के समीप जो कुछ भी पितरों को अर्पण किया जाता है , वह अक्षय होता है. गया के प्रेत शिला में पिंड दान करने से पितरों का उद्धार होता है. पिंड दान करने  के लिए काले तिल, जौ का आटा , खीर, चावल, दूध, सत्तू आदि का प्रयोग किये जाने का  विधान है. 
    अगर किसी मनुष्य की मृत्यु संस्कार रहित दशा में अथवा किसी पशु, चोर, सर्प या जंतु के काटने से हो जाती है तो गया तीर्थ में उस मृत व्यक्ति का श्राद्ध कर्म करने से वह बंधनमुक्त होकर स्वर्ग को गमन करता है, इसमें किसी को कोई संदेह नहीं होना चाहिए। गया में श्राद्ध कर्म करने के लिए दिन और रात का कोई विचार नहीं है. दिन अथवा रात में किसी भी समय श्राद्ध कर्म और तर्पण किया जा सकता है.   
     नारद पुराण में पितरों का श्राद्ध और तर्पण करने का तरीका बताया गया है. जिसके अनुसार विधि-विधान से मन्त्र उच्चारण करते हुए योग्य ब्राह्मणों को भोजन कराने, अपनी श्रद्धानुसार दान देने और उन्हें प्रसन्न करने से पितरों के आशीर्वाद से  धन,संपत्ति, सुख, आरोग्य मिलने लगते हैं तथा संतान परम्परा का नाश नहीं होता है. 
    पापों की मुक्ति के लिए भी श्राद्ध कर्म करना श्रेष्ठ माना गया है. कहते हैं कि जो मनुष्य अपने पूर्वजों का श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध नहीं करता है, उसके द्वारा की गयी पूजा को भगवान् भी स्वीकार नहीं करते हैं. माता-पिता का श्राद्ध न करने वाली संतान घोर नरक में जाती है, ऐसा पुराणों में वर्णित है. वेद ग्रंथों के विक्रय और स्त्री से प्राप्त धनराशि से श्राद्ध कर्म नहीं करना चाहिए। 
     पितृ पक्ष श्राद्ध कर्म के लिए श्रेष्ठ माने गए हैं. परन्तु जिस मनुष्य को अपने माता-पिता की मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो तो वह अमावस्या के दिन विधि पूर्वक श्राद्ध कर सकता है. गौ माता, पितर, और ब्राह्मण की भक्ति पूर्वक पूजा करने से श्राद्ध कर्म पूर्ण हुआ माना जाता है.
   श्राद्ध करने के अधिकारी केवल पुत्र ही नहीं है, बल्कि मृतक की पुत्री अथवा अन्य महिला सदस्य भी पितरों का श्राद्ध कर सकती हैं. स्मृति संग्रह और श्राद्ध कल्पलता में दी गयी व्यवस्था के अनुसार पुत्र, पुत्र, पुत्री का पुत्र, पत्नी, भाई-भतीजा, पुत्र-वधु, बहन, भांजा, पूर्व की सात पीढी तक के परिवार का सदस्य और आठवी पीढी से चौदहवी पीढ़ी तक का परिवार का सदस्य श्राद्ध कर्म कर सकता है. यदि इस क्रम में कोई न मिले तो, माता पक्ष के सपिंड (पूर्व की सात पीढी तक के परिवार का सदस्य )और सोदक ( आठवी पीढी से चौदहवी पीढ़ी तक का परिवार का सदस्य ) को श्राद्ध करने का अधिकार दिया गया है. धर्म शास्त्रों के अनुसार विवाहित पुत्री, पत्नी, कुल पुरोहित, मित्र आदि भी श्राद्ध करने के अधिकारी माने गए हैं. 
    धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि मृतक का श्राद्ध समय पर ही करना चाहिए। क्योकि सपिण्डी श्राद्ध द्वारा मृतक को पितरों की श्रेणी में प्रवेश मिलता है. श्राद्ध करने में देरी करने से मृतक की आत्मा को कष्ट मिलता है, जिसके प्रभाव से मृतक की संतान भी अनेक प्रकार के कष्ट भोगती हैं. प्रत्येक माह में आने वाली अमावस्या की तिथि को भी दक्षिण की मुख करके जल द्वारा तर्पण किया जा सकता है. 
     गरुण पुराण में गया को मुक्ति का साधन बताते हुए कहा गया है कि मनुष्य की मुक्ति के चार मार्ग हैं- ब्रह्म ज्ञान, गया में श्राद्ध, कुरुक्षेत्र में निवास तथा गौशाला में मृत्यु। जो मनुष्य अपने घर से गया के लिए प्रस्थान करते हैं, गया पहुँचने तक उनका प्रत्येक कदम पितरों के स्वर्गारोहण के लिए सीढ़ी बनता जाता है. पितृ पक्ष में पितरों के श्राद्ध और तर्पण के लिए गया जाकर हम अपने लिए पितृ ऋण से मुक्त होने का मार्ग चुन  सकते हैं.--- प्रमोद कुमार अग्रवाल, फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार 

Tuesday, 17 September 2013

18 सितम्बर,2013: अनन्त चतुर्दशी व्रत पर्व पर विशेष

अनन्त चतुर्दशी व्रत से मिलती हैं समस्त सिद्धियाँ


     भाद्रपद मास की चतुर्दशी तिथि को अनन्त चतुर्दशी का व्रत किया जाता है. इस दिन अनन्त भगवान् की पूजा अर्चना की जाती है तथा रेशम के धागे में चौदह गांठ लगाकर अनन्त बनाते हैं और अपनी भुजा में बांधते हैं. पुरुषों के लिए दाहिनी भुजा में और स्त्रियों के लिए बायीं भुजा में बनाया गया अनन्त बाँधने का विधान है.अनन्त भगवान् का श्रृंगार करके पूजा उपासना के बाद उनके भी अनन्त धारण किया जाता है. 
     भविष्य पुराण में कहा गया है कि अनन्त नाम  भगवान् श्री  कृष्ण का ही है. पुराण में दिए गए एक प्रसंग में भगवान  कृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि संसार का भार उतारने और दानवों का संहार करने के लिए ही वे वासुदेव जी के कुल में अवतरित हुए हैं तथा वे ही विष्णु, शिव, ब्रह्मा, भास्कर, शेष, सर्व व्यापी ईश्वर तथा अनन्त हैं.
     अनन्त चतुर्दशी के दिन स्त्री एवं पुरुष प्रातः स्नान आदि से निवृत्त होने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करके पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, मीठी पूरी अथवा हलवा आदि से अनन्त स्वरुप भगवान् विष्णु की उपासना करते हैं. भगवान् अनन्त के समक्ष चौदह गाँठ लगाकर बनाया गया अनंत " अनन्तसंसारमहासमुद्रे मग्नान सम्भ्युद्दर वासुदेव। अनन्तरूपे विनियोजितात्मा ह्यनन्तरूपाय नमो नमस्ते।।" मन्त्र का उच्चारण  करते हुए अपनी भुजा में धारण करते हैं. अनन्त चतुर्दशी पर बांधे गए अनन्त को गाज  कहा जाता है. इस प्रकार धारण कियॆ गए गाज अर्थात अनन्त को भाद्रपद मास के किसी भी शुभ दिन को खोला जाता है।  गाज खोलने के बाद इस गाज को मीठी पूरी पर रखते हैं और गेहूं  के दानों  के साथ गाज माता की कथा सुनते हैं. 
     गाज माता की कहानी के अनुसार, एक निःसंतान रानी को अनन्त और गाज माता की कृपा से संतान उत्पन्न हुई. रानी ने किये गए संकल्प जब पूरे नहीं किए तो गाज माता के क्रोध ने उस संतान को रानी के घर से एक भील के यहाँ पहुंचा दिया। रानी को जब अपनी भूल का अहसास हुआ तो उसने गाज माता से क्षमा याचना की और पूर्ण विधि-विधान से गाज माता की कथा सुनी। इससे गाज माता की अनुकम्पा से रानी को उसकी संतान वापस प्राप्त हो गयी. 
     अनन्त चतुर्दशी का व्रत-अनुष्ठान करने वाले स्त्री-पुरुषों के समस्त पाप दूर हो जाते हैं,मनोकामनाओं की पूर्ति होती है और समस्त रिद्धियाँ प्राप्त होती हैं. भगवान् कृष्ण ने स्वयं कहा है कि जो मनुष्य अनन्त - व्रत करता है, उसे उत्तम नक्षत्र, पुत्र एवं पौत्र सुख की प्राप्ति होती हैं तथा वह इस  लोक में समस्त सुख भोगकर अन्त में मोक्ष को प्राप्त हो जाता है.--- प्रमोद कुमार अग्रवाल, फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार 

Tuesday, 10 September 2013

ज्योतिष के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए प्रमोद अग्रवाल को मिला सम्मान - पत्र और अंतर्राष्ट्रीय सदस्यता

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ज्योतिष और वेद -शास्त्रों के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित इण्टरनेशनल ज्योतिष एवं वेद विज्ञान रिसर्च फाउण्डेशन, के अध्यक्ष प्रख्यात ज्योतिषाचार्य पण्डित वेद प्रकाश जाबली और महासचिव डॉक्टर रवि रस्तोगी ने ज्योतिष एवं धर्म-अध्यात्म के क्षेत्र में लेखन और जागरूकता कार्य के लिए कमला नगर, आगरा निवासी ज्योतिषविद प्रमोद कुमार अग्रवाल को श्रेष्ठ कार्यकर्त्ता के रूप में सम्मानित करते हुए फाउण्डेशन में विशिष्ट सहयोगी सदस्य के पद पर मनोनीत किया है. 
 विधि एवं लेखन के क्षेत्र से जुड़े तथा "ज्योतिष विद्या विशारद" प्रशिक्षित प्रमोद अग्रवाल को वर्ष 2012 में इंडियन एस्ट्रोलोजिकल रिसर्च इंस्टीटय़ूट,जसीडिह झारखण्ड द्वारा "ज्योतिष दिग्विजयी" तथा मई, 2013 में भारतीय वैदिक ज्योतिष संस्थानम,वाराणसी उत्तर प्रदेश द्वारा "ज्योतिष कौमुदी" के राष्ट्रीय सम्मान से भी नवाजा जा चुका है। 
 उल्लेखनीय है कि प्रमोद अग्रवाल के देश के विभिन्न समाचार पत्र और पत्रिकाओं में फलित ज्योतिष, वास्तु शास्त्र, सामुद्रिक शास्त्र के साथ- साथ धार्मिक और अध्यात्मिक विषयों पर नियमित लेख प्रकाशित हो रहे हैं. 


Saturday, 7 September 2013

08 सितम्बर (रविवार) : हरतालिका व्रत पर्व पर विशेष

हरतालिका व्रत से मिलता है सौभाग्य
 भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीय तिथि को हरतालिका व्रत किया जाता है. इसे भविष्य पुराण में हरकाली व्रत के नाम से बताया गया है. सौभाग्य की आकांक्षा रखने वाली स्त्रियों को यह व्रत करना करना चाहिए, परन्तु इस व्रत को पुरुष भी कर सकते हैं क्योंकि इस व्रत के करने के लिए स्त्री पुरुषों में किसी प्रकार का कोई भेद नहीं किया गया है और इस व्रत के प्रभाव से स्त्री और पुरुषों को समान रूप से मिलने वाले शुभ फल का प्रावधान भविष्य पुराण में है. इस व्रत में आरोग्य, दीर्घायु, सौभाग्य, संतान, धन-सम्पदा, शारीरिक एवं बल तथा ऐश्वर्य आदि प्रदान करने वाली माता भगवती हरकाली देवी जी की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है.
  हरतालिका व्रत किये जाने के सम्बन्ध में एक प्राचीन कथा है. जिसके अनुसार, महाराजा दक्ष प्रजापति की काली नाम की कन्या का विवाह भगवान् शंकर के साथ हुआ था. काली का वर्ण नीलकमल के सामान काला था. एक बार जब भगवान् शंकर भगवान् विष्णु जी के साथ विराजमान थे, तभी भगवान् शंकर ने काली को "प्रिये गौरी " का उच्चारण करते हुए पुकारा। यह सुनकर काली ने इसे अपना अपमान समझा और हरित वर्ण की कांति हरी दूर्वा घास में अग्नि प्रज्वलित  करते हुए उस अग्नि में अपनी देह को भस्म कर लिया।
 तत्पश्चात काली ने दुबारा हिमालय राज के यहाँ गौरवर्ण पुत्री के रूप में जन्म लिया। नए जन्म में उनका नाम गौरी रखा गया. इस जन्म में भी उन्होंने भगवान् शिव को अपने वर के रूप में चुनते हुए विवाह रचाया। इसलिए भगवान् शिव की आराध्या शक्ति माता भगवती का नाम हरकाली कहलाया।
 भविष्य पुराण में वर्णित है कि हरकाली अर्थात हरतालिका व्रत रखने वाली स्त्रियों को इस दिन नए धान्य एकत्र करके अंकुरित हरी घास से भगवती हरकाली की प्रतिमा बनानी चाहिए और पुष्प, धूप, दीप, मोदक, फल आदि के साथ उनकी उपासना करनी चाहिए। उपासना करते समय "हरकर्मसमुत्पन्ने हरकाये हरप्रिये। माँ त्राहीशस्य मूर्तिस्थते प्रणतोअस्मि नमो नमः. मन्त्र का जप अवश्य करना चाहिए। रात्रि काल में सौभाग्यवती स्त्रियों को माँ हरकाली देवी की कृपा प्राप्त  करने के लिए रात्रि जागरण करते हुए भक्तिमय गीत, संगीत और नृत्य करना चाहिए।
दूसरे दिन प्रातःकाल में अर्थात चतुर्थी के दिन माँ हरकाली की प्रतिमा को किसी पवित्र नदी अथवा जलाशय में "अर्चितासी मया भक्त्या गच्छ देवी सुरालयम। हरकाले शिवे गौरि पुनरागमनाय च." मन्त्र  का जप करते हुए विसर्जित कर देना चाहिए।
 इस प्रकार पूर्ण श्रद्धा भाव और विधि-विधान से हरतालिका व्रत करने से माँ हरकाली और भगवान् शिव की असीम कृपा से स्त्रियों को पति सुख के साथ-साथ अन्य समस्त सुख भी प्राप्त होते हैं. जो पुरुष इस व्रत को प्रत्येक वर्ष करते हैं उन्हें भी दीर्घायु, आरोग्य, संतान और धन आदि सुखों की सहज ही प्राप्ति होती है.--- प्रमोद कुमार अग्रवाल, फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार 

Wednesday, 28 August 2013

चन्द्र स्वर में कार्य करें तो मिलेगी सफलता

समस्त प्राणियों में जीवित रहने के लिए श्वास प्रक्रिया आवश्यक होती है। इसमें जीवनदायिनी ऑक्सीजन गैस ग्रहण करके दूषित कार्बन डाई ऑक्साइड गैस का उत्सर्जन किया जाता है। मनुष्यों में श्वास प्रक्रिया के लिए नाक में बने हुए दो नासा छिद्र सहयोग करते हैं। एक नासा छिद्र से श्वास का आगमन होता है तो दूसरे छिद्र से श्वास का उत्सर्जन होता है। यह क्रम स्वतः ही परिवर्तित होता रहता है।

ज्योतिष शास्त्र में स्वरोदय विज्ञान इस बात को स्पष्ट करता है कि यदि नासा छिद्रों की श्वास प्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए कोई कार्य किया जाये तो उसमें अपेक्षित सफलता अवश्य प्राप्त होती है। 

नासिका के दाहिने छिद्र अथवा बाएं छिद्र से श्वास आगमन को "स्वर चलना" कहा जाता है। नासिका के दाहिने छिद्र से चलने वाले स्वर को "सूर्य स्वर" और बाएं छिद्र से चलने वाले स्वर को "चन्द्र स्वर" कहते हैं। सूर्य स्वर को भगवान शिव का जबकि चन्द्र स्वर को शक्ति की आराध्य देवी माँ का प्रतीक माना जाता है। 

स्वर शास्त्र के अनुसार वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर और मीन राशियां चन्द्र स्वर से तथा मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु एवं कुम्भ राशियाँ सूर्य स्वर से मान्य होती हैं। चन्द्र स्वर में श्वास चलने को "इडा" और सूर्य स्वर में श्वास चलने को "पिंगला" कहा जाता है।  दोनों छिद्रों से चलने वाली श्वास प्रक्रिया "सुषुम्ना स्वर" कहलाती है। 

स्वरोदय विज्ञान की मान्यता के अनुसार पूर्व और उत्तर दिशा में चन्द्र तथा पश्चिम और दक्षिण दिशा में सूर्य रहता है। इस कारण जब नासिका से सूर्य स्वर चले तो  पश्चिम और दक्षिण दिशा में तथा जब नासिका से चन्द्र स्वर चले तो  पूर्व और उत्तर दिशा में जाना अशुभ फल देने वाला होता है। चन्द्र स्वर चलने पर बायां पैर और सूर्य स्वर चलने पर दाहिना पैर आगे बढाकर यात्रा करना शुभ होता है।

 चन्द्र स्वर चलते समय किये गए समस्त कार्यों में सफलता प्राप्त होती है। पुत्र रत्न की प्राप्ति के लिए यदि स्त्री के साथ प्रसंग के आरम्भ में पुरुष का सूर्य स्वर चले तथा समापन पर चन्द्र स्वर चले तो शुभ होता है।

सूर्य स्वर चलने के दौरान अध्ययन एवं अध्यापन करना, शास्त्रों का पठन-पाठन, पशुओं की खरीद-फरोख्त,औषधि सेवन, शारीरिक श्रम, तंत्र-मन्त्र साधना, वाहन का शुभारम्भ करना जैसे कार्य किये जा सकते हैं। जबकि चन्द्र स्वर चलते समय गृह प्रवेश, शिक्षा का शुभारम्भ, धार्मिक अनुष्ठान, नए वस्त्र और आभूषण धारण करना, भू-संपत्ति का क्रय-विक्रय, नए व्यापार का शुभारम्भ, नवीन मित्र सम्बन्ध बनाना, कृषि कार्य और पारस्परिक विवादों का निस्तारण करना जैसे कार्य शुभ फल देने वाले हो. ---- प्रमोद कुमार अग्रवाल, फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार 

Saturday, 17 August 2013

19 अगस्त को मंगल का कर्क राशि में प्रवेश, मिलेंगे शुभ-अशुभ फल

   गोचर भ्रमण के चलते भूमि पुत्र मंगल ग्रह 19 अगस्त को पुनर्वसु नक्षत्र के चतुर्थ चरण एवं कर्क राशि में प्रवेश कर रहा है. कर्क राशि में 5 अक्तूबर तक बने रहकर मंगल विभिन्न राशियों  पर शुभ, अशुभ और मिश्रित प्रभाव उत्पन्न करेगा। भारतीय ज्योतिष के अनुसार कर्क मंगल की नीच राशि है. इस कारण इस अवधि में मंगल दूसरे ग्रहों की तुलना में शक्तिहीन और निर्बल हो जायेगा। मंगल के जातक की राशि से तीसरे, छठे, दसवें और ग्यारहवें स्थान पर आने से  शुभ प्रभाव तथा पहले,  चौथे, आठवें और बारहवें स्थान पर आने से अशुभ प्रभाव देखने को मिलेंगे। 

    ज्योतिष दिग्विजयी प्रमोद कुमार अग्रवाल के अनुसार मंगल के कर्क राशि में प्रवेश के बाद मेष, मिथुन, कर्क, मकर एवं मीन  राशि के जातकों को मानसिक संताप, कलह, कष्ट, अनावश्यक व्यय, वाद-विवाद, आपसी मतभेद, बनते कार्यों में रूकावट  जैसी समस्याओं  का सामना करना पड़ सकता है, जबकि वृष, सिंह, तुला, एवं कुम्भ राशि के जातकों के लिए मंगल शुभ और मेहरबान रहेगा जिससे इन राशि के जातकों को सुख, मानसिक शांति, धन लाभ, पदोन्नति, भूमि व वाहन सुख, आरोग्य, भाग्योदय के योग बनेंगे। वहीं वृश्चिक, धनु एवं कन्या राशि के जातकों को मिले-जुले अर्थात शुभ-अशुभ दोनों ही तरह के प्रभाव मिलेंगे। 

    ज्योतिषविद प्रमोद कुमार अग्रवाल के अनुसार मंगल के कर्क राशि में प्रवेश परिवर्तन से किसी को भी भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है. मंगल की शांति और शुभ प्रभाव प्राप्त करने के लिए श्री हनुमान जी की नियमित उपासना करने के साथ-साथ मंगल की वस्तुओं प्रवाल, मूंगा, तांबा, केसर, स्वर्ण, लाल रंग के वस्त्र, फल एवं पुष्प, लाल चन्दन, मसूर की दाल, गुड़, सिन्दूर आदि का दान मंगलवार के दिन दोपहर के समय किसी ब्रह्मचारी व्यक्ति को देना चाहिए। मंगल के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए यह भी बहुत आवश्यक है कि जातक मांसाहार, शराब, नशीले पदार्थों का भूलकर भी सेवन न करे और किसी भी तरह के अनैतिक कार्य करने से बचे. मंगल की शुभता के लिए पवित्रता और नियम पालन अनिवार्य माने गए हैं.   

Tuesday, 6 August 2013

सूर्य भगवान् के पूजन से मिलता है मनोवांछित फल

 समस्त संसार को अपने प्रकाश से आलोकित करने वाले भगवान् सूर्य का स्मरण और प्रातः पूजन मनोवांछित फल प्रदान करने वाला है। सप्तमी तिथि को भगवान् सूर्य का आविर्भाव हुआ था। इस कारण सप्तमी तिथि भगवान् सूर्य को अत्यंत प्रिय है। किसी भी मास  के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि अथवा किसी सूर्य ग्रहण या मकर संक्रांति के दिन से आरम्भ करके जो भक्त पूर्ण श्रद्धाभाव से भगवान् सूर्य की पूजा अर्चना करता है, उसे समस्त समस्त सुख प्राप्त होने लगते हैं। 
भगवान् सूर्य की प्रातः कालीन आराधना के समय सूर्य देव को जल अर्पित करना, "ॐ खकोल्काय स्वाहा" मन्त्र का जप करते हुए हवन करना, सूर्य से सम्बंधित वस्तुओं जैसे गेंहू, माणिक्य, रक्तवर्ण पुष्प, गुड, केसर, ताम्बा, स्वर्ण, रक्त चन्दन, रक्त कमल, भूमि, भवन आदि का दान करना शुभ होता है। 
वर्ष के बारह मास में भगवान् सूर्य के अलग-अलग नाम एवं रूपों की आराधना की जाती है। चैत्र मास में विशाखा, वैशाख मास में धाता, ज्येष्ठ मास में इंद्र, आषाढ़ मास में रवि, श्रावण मास में नभ, भाद्रपद मास में यम, आश्विन मास में पर्जन्य, कार्तिक मास में त्वष्टा, मार्गशीर्ष मास में मित्र, पौष मास में विष्णु, माघ मास में वरुण तथा फाल्गुन मास में सूर्य नामक भगवान् सूर्य की उपासना की जाती है। 
भगवान् सूर्य  की विधि विधान से सप्तमी तिथि को उपवास करके पूजा करने से सभी प्रकार के कष्टों का निवारण होता है, जीवन में प्रसन्नता आती है और भगवान् सूर्य की कृपा से सभी दोषपूर्ण ग्रहों के अशुभ प्रभाव दूर होते हैं।--- प्रमोद कुमार अग्रवाल, फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार 

Friday, 14 June 2013

दुर्लभ और पुण्य दाई है गंगा स्नान

"सर्वत्र सुलभा गंगा त्रिशुस्थानेशु दुर्लभा।
गंगा द्वारे प्रयागे च गंगा सागर संगमे।।"
यद्यपि गंगा सर्वत्र सुलभ है परन्तु हरिद्वार, प्रयाग और गंगा सागर के संगम में गंगा दुर्लभ है। भारतीय धर्म एवं संस्कृति में गंगा को पवित्र माना गया है। गंगा स्नान से मनुष्य के समस्त पापों का अंत हो जाता है। अभीष्ठ की सिद्धी प्राप्त करने के लिए  गंगा स्नान के बाद श्रद्धा भाव से दान अवश्य करना चाहिए। अपने पूर्वजों एवं मृतात्माओं की शांति के लिए गंगा जी में स्नान, दान, जप, तप, पूजा, श्राद्ध और तर्पण करना विशेष फलदायी माना गया है।
पुराणों के अनुसार ज्येष्ठ मास, शुक्ल पक्ष, हस्त नक्षत्र, बुधवार, दशमी तिथि, गर करण, आनंद योग, व्यतिपात, कन्या राशि और वृष राशि के सूर्य में यदि गंगा स्नान किया जाये तो मनुष्य को महान पुण्य़  मिलता है। इन दिनों अगर दशमी तिथि भी हो तो गंगा स्नान सभी पापों का नाश करके मोक्षदायी हो जाता है।
श्री गंगा  दशहरा ज्येष्ठ शुक्ल की दशमी तिथि को होता है। इस वर्ष इस दिन व्यतिपात भी होने से गंगा  में स्नान करना पुण्य़ फल प्रदान करने वाला है।
जो मनुष्य इस पवित्र दिन गंगा में प्रसन्न भाव से विधि पूर्वक स्नान करके दान आदि करता है वह इस जन्म में सुख भोग करके मृत्यु के उपरान्त भगवान् विष्णु के धाम को प्राप्त करता है। ऐसा नारद पुराण में वर्णित है।
"गंगा  पश्यति यः स्तौति स्नाती भक्त्या पिबेज्जलम।
स स्वर्ग ज्ञान माम्लम योगम मोक्षं च विन्दन्ति।।" 
गंगा  जी के दर्शन मात्र से मनुष्य की समस्त इन्द्रियों के दुर्व्यव्सन, निर्दयता और पाप पूर्ण आचरण दूर हो जाते हैं। गंगा  जी में स्नान करने से मन निर्मल हो जाता है तथा मोक्ष मिलता है। अविनाशी सनातन पद प्राप्त करने के लिए श्री गंगा  जी के जल को बार-बार स्पर्श करना कहा गया है। 
भगवान् विष्णु के चरण कमलों से प्रकट हुई गंगा जी भगवान् शिव के मस्तक से होकर मंद-मंद वेग से इस सम्पूर्ण धरती के प्राणियों और पादपों का पोषण  करती है। पवित्र गंगा  के तट पर भक्ति भाव से गंगा -गंगा  का उच्चारण करना भी पापों को नष्ट कर देने वाला माना गया है। गंगा  में स्नान करने वाला मनुष्य अपने माता-पिता  के कुल की कई पीढ़ियों का उद्धार करके उन्हें भगवान् विष्णु के धाम पहुंचा देता है। गंगा स्नान के साथ गंगा जल का पान करने से मनुष्य की सातों पीढियां पवित्र और पाप मुक्त हो जाती हैं। श्री गंगा  दशहरा के पावन पर्व की सार्थकता के लिए पवित्र गंगा  को प्रदूषण  मुक्त रखना परम आवश्यक है और हम सभी धर्म प्रेमियों का पावन दायित्व भी है। --- प्रमोद कुमार अग्रवाल, फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार 

Monday, 27 May 2013

शोधपूर्ण व्याख्यान के लिए प्रमोद अग्रवाल ज्योतिष कौमुदी की मानद उपाधि से सम्मानित

शोधपूर्ण व्याख्यान के लिए प्रमोद अग्रवाल ज्योतिष कौमुदी की मानद उपाधि से सम्मानित 
भारतीय वैदिक ज्योतिष संस्थानम, वाराणसी के तत्वाधान में वृन्दावन (मथुरा) में 25 और 26 मई, 2013 को संपन्न हुए दो दिवसीय अखिल भारतीय ज्योतिष सम्मलेन एवं सनातन धर्म संगोष्ठी में अपना शोध व्याख्यान प्रस्तुत करने पर ज्योतिषविद प्रमोद कुमार अग्रवाल को "ज्योतिष कौमुदी" की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया है। प्रमोद अग्रवाल ने "ज्योतिष मनुष्य को भाग्यवादी न बनाकर कर्मशील बनाता है" विषय पर शोधपूर्ण व्याख्यान दिया। 
विधि एवं लेखन के क्षेत्र से जुड़े तथा "ज्योतिष विद्या विशारद" प्रशिक्षित प्रमोद अग्रवाल को वर्ष 2012 में भी झारखण्ड सरकार से मान्य ज्योतिष संस्था इंडियन एस्ट्रोलोजिकल रिसर्च इंस्टीटय़ूट से ज्योतिष और धर्म एवं अध्यात्म से सम्बंधित विभिन्न विषयों पर लेखन द्वारा मानवता की सेवा के लिए "ज्योतिष दिग्विजयी" के राष्ट्रीय सम्मान से भी नवाजा जा चुका है।