Wednesday, 28 August 2013

चन्द्र स्वर में कार्य करें तो मिलेगी सफलता

समस्त प्राणियों में जीवित रहने के लिए श्वास प्रक्रिया आवश्यक होती है। इसमें जीवनदायिनी ऑक्सीजन गैस ग्रहण करके दूषित कार्बन डाई ऑक्साइड गैस का उत्सर्जन किया जाता है। मनुष्यों में श्वास प्रक्रिया के लिए नाक में बने हुए दो नासा छिद्र सहयोग करते हैं। एक नासा छिद्र से श्वास का आगमन होता है तो दूसरे छिद्र से श्वास का उत्सर्जन होता है। यह क्रम स्वतः ही परिवर्तित होता रहता है।

ज्योतिष शास्त्र में स्वरोदय विज्ञान इस बात को स्पष्ट करता है कि यदि नासा छिद्रों की श्वास प्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए कोई कार्य किया जाये तो उसमें अपेक्षित सफलता अवश्य प्राप्त होती है। 

नासिका के दाहिने छिद्र अथवा बाएं छिद्र से श्वास आगमन को "स्वर चलना" कहा जाता है। नासिका के दाहिने छिद्र से चलने वाले स्वर को "सूर्य स्वर" और बाएं छिद्र से चलने वाले स्वर को "चन्द्र स्वर" कहते हैं। सूर्य स्वर को भगवान शिव का जबकि चन्द्र स्वर को शक्ति की आराध्य देवी माँ का प्रतीक माना जाता है। 

स्वर शास्त्र के अनुसार वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर और मीन राशियां चन्द्र स्वर से तथा मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु एवं कुम्भ राशियाँ सूर्य स्वर से मान्य होती हैं। चन्द्र स्वर में श्वास चलने को "इडा" और सूर्य स्वर में श्वास चलने को "पिंगला" कहा जाता है।  दोनों छिद्रों से चलने वाली श्वास प्रक्रिया "सुषुम्ना स्वर" कहलाती है। 

स्वरोदय विज्ञान की मान्यता के अनुसार पूर्व और उत्तर दिशा में चन्द्र तथा पश्चिम और दक्षिण दिशा में सूर्य रहता है। इस कारण जब नासिका से सूर्य स्वर चले तो  पश्चिम और दक्षिण दिशा में तथा जब नासिका से चन्द्र स्वर चले तो  पूर्व और उत्तर दिशा में जाना अशुभ फल देने वाला होता है। चन्द्र स्वर चलने पर बायां पैर और सूर्य स्वर चलने पर दाहिना पैर आगे बढाकर यात्रा करना शुभ होता है।

 चन्द्र स्वर चलते समय किये गए समस्त कार्यों में सफलता प्राप्त होती है। पुत्र रत्न की प्राप्ति के लिए यदि स्त्री के साथ प्रसंग के आरम्भ में पुरुष का सूर्य स्वर चले तथा समापन पर चन्द्र स्वर चले तो शुभ होता है।

सूर्य स्वर चलने के दौरान अध्ययन एवं अध्यापन करना, शास्त्रों का पठन-पाठन, पशुओं की खरीद-फरोख्त,औषधि सेवन, शारीरिक श्रम, तंत्र-मन्त्र साधना, वाहन का शुभारम्भ करना जैसे कार्य किये जा सकते हैं। जबकि चन्द्र स्वर चलते समय गृह प्रवेश, शिक्षा का शुभारम्भ, धार्मिक अनुष्ठान, नए वस्त्र और आभूषण धारण करना, भू-संपत्ति का क्रय-विक्रय, नए व्यापार का शुभारम्भ, नवीन मित्र सम्बन्ध बनाना, कृषि कार्य और पारस्परिक विवादों का निस्तारण करना जैसे कार्य शुभ फल देने वाले हो. ---- प्रमोद कुमार अग्रवाल, फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार 

Saturday, 17 August 2013

19 अगस्त को मंगल का कर्क राशि में प्रवेश, मिलेंगे शुभ-अशुभ फल

   गोचर भ्रमण के चलते भूमि पुत्र मंगल ग्रह 19 अगस्त को पुनर्वसु नक्षत्र के चतुर्थ चरण एवं कर्क राशि में प्रवेश कर रहा है. कर्क राशि में 5 अक्तूबर तक बने रहकर मंगल विभिन्न राशियों  पर शुभ, अशुभ और मिश्रित प्रभाव उत्पन्न करेगा। भारतीय ज्योतिष के अनुसार कर्क मंगल की नीच राशि है. इस कारण इस अवधि में मंगल दूसरे ग्रहों की तुलना में शक्तिहीन और निर्बल हो जायेगा। मंगल के जातक की राशि से तीसरे, छठे, दसवें और ग्यारहवें स्थान पर आने से  शुभ प्रभाव तथा पहले,  चौथे, आठवें और बारहवें स्थान पर आने से अशुभ प्रभाव देखने को मिलेंगे। 

    ज्योतिष दिग्विजयी प्रमोद कुमार अग्रवाल के अनुसार मंगल के कर्क राशि में प्रवेश के बाद मेष, मिथुन, कर्क, मकर एवं मीन  राशि के जातकों को मानसिक संताप, कलह, कष्ट, अनावश्यक व्यय, वाद-विवाद, आपसी मतभेद, बनते कार्यों में रूकावट  जैसी समस्याओं  का सामना करना पड़ सकता है, जबकि वृष, सिंह, तुला, एवं कुम्भ राशि के जातकों के लिए मंगल शुभ और मेहरबान रहेगा जिससे इन राशि के जातकों को सुख, मानसिक शांति, धन लाभ, पदोन्नति, भूमि व वाहन सुख, आरोग्य, भाग्योदय के योग बनेंगे। वहीं वृश्चिक, धनु एवं कन्या राशि के जातकों को मिले-जुले अर्थात शुभ-अशुभ दोनों ही तरह के प्रभाव मिलेंगे। 

    ज्योतिषविद प्रमोद कुमार अग्रवाल के अनुसार मंगल के कर्क राशि में प्रवेश परिवर्तन से किसी को भी भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है. मंगल की शांति और शुभ प्रभाव प्राप्त करने के लिए श्री हनुमान जी की नियमित उपासना करने के साथ-साथ मंगल की वस्तुओं प्रवाल, मूंगा, तांबा, केसर, स्वर्ण, लाल रंग के वस्त्र, फल एवं पुष्प, लाल चन्दन, मसूर की दाल, गुड़, सिन्दूर आदि का दान मंगलवार के दिन दोपहर के समय किसी ब्रह्मचारी व्यक्ति को देना चाहिए। मंगल के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए यह भी बहुत आवश्यक है कि जातक मांसाहार, शराब, नशीले पदार्थों का भूलकर भी सेवन न करे और किसी भी तरह के अनैतिक कार्य करने से बचे. मंगल की शुभता के लिए पवित्रता और नियम पालन अनिवार्य माने गए हैं.   

Tuesday, 6 August 2013

सूर्य भगवान् के पूजन से मिलता है मनोवांछित फल

 समस्त संसार को अपने प्रकाश से आलोकित करने वाले भगवान् सूर्य का स्मरण और प्रातः पूजन मनोवांछित फल प्रदान करने वाला है। सप्तमी तिथि को भगवान् सूर्य का आविर्भाव हुआ था। इस कारण सप्तमी तिथि भगवान् सूर्य को अत्यंत प्रिय है। किसी भी मास  के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि अथवा किसी सूर्य ग्रहण या मकर संक्रांति के दिन से आरम्भ करके जो भक्त पूर्ण श्रद्धाभाव से भगवान् सूर्य की पूजा अर्चना करता है, उसे समस्त समस्त सुख प्राप्त होने लगते हैं। 
भगवान् सूर्य की प्रातः कालीन आराधना के समय सूर्य देव को जल अर्पित करना, "ॐ खकोल्काय स्वाहा" मन्त्र का जप करते हुए हवन करना, सूर्य से सम्बंधित वस्तुओं जैसे गेंहू, माणिक्य, रक्तवर्ण पुष्प, गुड, केसर, ताम्बा, स्वर्ण, रक्त चन्दन, रक्त कमल, भूमि, भवन आदि का दान करना शुभ होता है। 
वर्ष के बारह मास में भगवान् सूर्य के अलग-अलग नाम एवं रूपों की आराधना की जाती है। चैत्र मास में विशाखा, वैशाख मास में धाता, ज्येष्ठ मास में इंद्र, आषाढ़ मास में रवि, श्रावण मास में नभ, भाद्रपद मास में यम, आश्विन मास में पर्जन्य, कार्तिक मास में त्वष्टा, मार्गशीर्ष मास में मित्र, पौष मास में विष्णु, माघ मास में वरुण तथा फाल्गुन मास में सूर्य नामक भगवान् सूर्य की उपासना की जाती है। 
भगवान् सूर्य  की विधि विधान से सप्तमी तिथि को उपवास करके पूजा करने से सभी प्रकार के कष्टों का निवारण होता है, जीवन में प्रसन्नता आती है और भगवान् सूर्य की कृपा से सभी दोषपूर्ण ग्रहों के अशुभ प्रभाव दूर होते हैं।--- प्रमोद कुमार अग्रवाल, फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार