Wednesday, 30 October 2013

आरोग्य और धन के लिए करें धन्वन्तरि की पूजा

    कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को धन त्रयोदशी या धनतेरस के रूप में मनाया जाता है इस तिथि से पाँच दिनों तक मनाये जाने वाले प्रकाश पर्व दीपावली का शुभारम्भ हो जाता है इस दिन देवताओं के वैद्य धन्वन्तरि समुद्र से अमृत कलश लेकर आये थे, इसलिए इस दिन को धन्वन्तरि जयंती के रूप में जाता है 
    धनतेरस के दिन जल, रोली, अक्षत, गुड़, पुष्प, नैवेद्य आदि से वैदिक देवता यमराज का पूजन किये जाने का विधान है इसके अलावा आटे का बना दीपक सरसों का तेल और रुई की चार बत्तियां डालकर घर के मुख्य प्रवेश द्वार पर जलाया जाता है इसे यमराज के लिए दीपदान माना जाता है ऐसा करने से घर के सदस्यों को अकाल मृत्यु का कोई भय नहीं रहता, यह शास्त्रों में वर्णित है
    धनतेरस के दिन जहाँ एक ओर वैद्य और हकीम भगवान धन्वन्तरि की पूजा अर्चना करते हैं वहीं घर-परिवारों में पुराने और टूटे-फूटे बर्तनों को बदलना, नए बर्तन और चांदी के सिक्के खरीदना शुभ समझा जाता है 
    धनतेरस की महत्ता के सम्बन्ध में प्रचलित एक कथा के अनुसार एक बार भगवान् विष्णु ने लक्ष्मीजी को नाराज होकर बारह वर्ष तक पृथ्वी लोक पर एक किसान के घर रहकर उसकी सेवा करने की श्राप दे दिया। लक्ष्मीजी के आशीर्वाद से किसान का घर धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया समय पूरा होने पर जब विष्णु भगवान् लक्ष्मीजी को लेने आये तो किसान ने उन्हें जाने से रोका। विष्णुजी ने किसान को समझाते हुए श्राप के बारे बताया और कहा कि चंचल स्वभाव की लक्ष्मीजी को कोई एक स्थान पर नहीं रोक सकता, तुम्हारा हठ करना निरर्थक है
    विष्णुजी की बात सुनकर लक्ष्मीजी ने किसान से कहा कि अगर तुम मुझे अपने यहाँ रोकना चाहते हो तो तुम धनतेरस वाले दिन घर को स्वच्छ रखना और रात्रि में घी  का दीपक जलाकर प्रकाश बनाए रखना। किसान ने लक्ष्मीजी के कहे अनुसार धनतेरस की रात्रि में दीपक जलाया और उनकी पूजा भी की लक्ष्मीजी की कृपा से किसान के घर धन-धान्य के भण्डार भर गए 
    धनतेरस के अवसर पर कही जाने वाली एक अन्य कथा के अनुसार, प्राचीन समय में हिम नाम के एक राजा के यहाँ पुत्र संतान की प्राप्ति हुई तो ज्योतिषियों ने यह भविष्यवाणी की कि इसकी मृत्यु विवाह के चौथे दिन सर्प के काटने से हो जायेगी। सोलह वर्ष की आयु में राजकुमार का विवाह एक राजकन्या के साथ हुआ राजकन्या को जब राजकुमार की मृत्यु के बारे में जानकारी हुई तो उसने विवाह के चौथे दिन सर्प के आने के सभी संभावित मार्गों पर हीरे-जवाहरात बिछाते हुए पूरे घर को प्रकाशमय बना दिया और स्वयं राजकुमार को भक्ति गीत सुनाने लगी। निर्धारित समय पर यम देवता सर्प का रूप धारण करके राजमहल में आये, परन्तु हीरे-जवाहरात के तेज प्रकाश एवं राजकुमारी के गीत-संगीत के कारण वे मन्त्र-मुग्ध होकर एक स्थान पर बैठ गए उन्हें प्रातः काल होने का पता ही नहीं चला विवश होकर यमराज को राजकुमार के प्राण लिए बिना ही वापस लौटना पड़ा जिस दिन राजकुमारी ने अपनी सूझ-बूझ से राजकुमार को यमराज के पंजे से बचाया उस दिन धनतेरस थी। इसलिए इस दिन यमराज से बचने के लिए दीपदान करने के साथ-साथ घर में पूरी रात्रि प्रकाश रखा जाता है 
    धनतेरस पर घरों के अलावा कार्तिक स्नान करके प्रदोष काल में देव मंदिर, पवित्र नदी के तट, गौशाला, बावली, कुआं, पीपल, तुलसी, वट वृक्ष, आंवला आदि के समीप तीन दिनों तक दीपक प्रज्वलित किये जाने का भी  विधान है तुला राशि के सूर्य में चतुर्दशी और अमावस्या के सांध्य काल में एक लकड़ी की मशाल बनाकर उसे जलाने से पितरों का मार्ग प्रशस्त होता है जिससे पितर प्रसन्न होकर अपना शुभ आशीर्वाद देते हैं और अकाल मृत्यु से हमारी रक्षा करते हैं। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल,फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार

अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाता है पंच महोत्सव पर्व दीपावली

भारतीय धर्म और संस्कृति में तीज त्योहारों के आयोजन को विशेष महत्त्व दिया गया  है ये त्यौहार हमारे अन्दर नव उत्साह का संचार तो करते ही हैं, राष्ट्रीय एकता और सद्भावना को भी मजबूत बनाते हैं कार्तिक मास में कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि से लेकर इसी मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि तक पांच दिवसीय दीपावली पर्व मनाया जाता है इसे पंच महोत्सव भी कहते हैं। सुख, समृद्धि, ज्ञान, आरोग्य और दीर्घायु प्रदान करने वाले इस पंच दिवसीय महोत्सव में पहले दिन धनतेरस, दूसरे दिन नरक चतुर्दशी, तीसरे दिन  दीपावली, चौथे दिन गोवर्धन पूजा और पांचवे व अंतिम दिन यम द्वितीया या भाई दूज का त्यौहार मनाया जाता है पांच दिनों तक चलने वाले इस अद्भुत पर्व पर प्रत्येक दिन सांध्य काल से लेकर रात्रि तक दीप जलाकर दीपदान करना अनिवार्य बताया  गया है
  धनतेरस : कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को धनतेरस होती है धनतेरस से दीपोत्सव का आगाज हो जाता है इस दिन मृत्यु के देवता यमराज को प्रसन्न करने के लिए दक्षिण दिशा की ओर मुख करते हुए उनकी पूजा करके सायंकाल आटे का दीपक जलाया जाता है पुराणों के अनुसार इस दिन आरोग्य और आयु के देवता भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिए इस दिन इनका पूजन भी किया जाता है और चांदी या अन्य धातु के नए बर्तन भी खरीदे जाते हैं। धनतेरस के दिन दीपदान करते समय "मृत्युना पाशहस्तेन कालेन भार्यया सहा त्रयोदश्यां  दीपदानात्सूर्यजः प्रीतयामिति।" मन्त्र का जप करना चाहिए। 
नरक चतुर्दशी : धनतेरस के दूसरे दिन नरक चतुर्दशी मनाई जाती है।  इसे रूप चौदस अथवा छोटी दीपावली भी कहते हैं। कहते हैं कि इस दिन श्री कृष्ण भगवान ने नरकासुर नाम के दैत्य को मारकर ब्रजवासियों को उसके अत्याचार से मुक्ति दिलाई थी। नरकासुर के मरने की खुशी में इस दिन दीपक जलाकर उत्सव मनाया गया था। नरक गमन से बचने के लिए इस अवसर पर प्रातः काल में आटा, सरसों का तेल और हल्दी का उबटन शरीर पर लगाते हैं और अपामार्ग पौधे की पत्तियां पानी में डालकर स्नान करते हैं। इस अवसर पर "सीता लष्टि सहायुक्तः संकश्टक दलान्वितः।  हर पापमपामार्ग भ्राम्यमाण पुनः पुनः।" मन्त्र का जप करने से दरिद्रता और कष्टों का नाश होता है। 
दीपावलीपंच महोत्सव के तीसरे दिन दीपावली का मुख्य त्यौहार मनाया जाता है। इस दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्री राम चौदह वर्ष के वनवास की अवधि पूरी करके अयोध्या लौटे थे तथा उनका राज्याभिषेक होने की खुशी में अयोध्या को दीपकों के प्रकाश से सजाया गया था और खुशियाँ मनाई गयी थीं। इस दिन जैन मत के अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर, महर्षि दयानंद सरस्वती और स्वामी राम तीर्थ ने निर्वाण प्राप्त किया था।  भगवान श्री कृष्ण भी दीपावली के दिन शरीर से मुक्त हुए थे।  दीपावली का पर्व प्रकाश का पर्याय है क्योंकि इस दिन धन की महादेवी लक्ष्मी जी, श्री गणेश जी के साथ-साथ ज्ञान की देवी सरस्वती जी की पूजा अर्चना की जाती है। धन, ज्ञान और विद्या प्राप्त करने के लिए दीपावली से श्रेष्ठ कोई दूसरा पर्व नहीं हो सकता है। कार्तिक अमावस्या को मनाई जाने वाली दीपावली पर घोर अन्धकार को दीपक जलाकर दूर किया जाता है। ये दीपक घरों में, तुलसी व पीपल वृक्ष पर जलाए जा सकते हैं।  दीप जलाते समय "शुभम करोति कल्याणं आरोग्य धन संपदा। शत्रु बुद्धि विनाशयः दीप ज्योति नमोस्तुते। " मन्त्र का जप अवश्य करना चाहिए। दीपावली की रात जागरण करके लक्ष्मी जी की साधना भी की जाती है 
गोवर्धन पूजा : दीपावली के दूसरे दिन अन्न कूट अर्थात गोवर्धन पूजा पर्व मनाया जाता है। इस दिन भगवान् श्री कृष्ण ने ब्रजवासियों को इंद्र की पूजा छोड़कर गोवर्धन पर्वत की पूजा करने का ज्ञान दिया था।  गौ माता के गोबर से गोवर्धन महाराज की प्रतिमा बनाकर रोली, अक्षत, मिष्ठान, खीर, पुष्प आदि से उनकी पूजा अर्चना करके परिक्रमा लगाई जाती है तथा दीपदान करके भगवान श्री कृष्ण एवं लक्ष्मी जी से सभी के कल्याण की  कामना की जाती है। गोवर्धन पूजा के समय "गोवर्धन धराधर गोकुल त्राणकारक।  विष्णु बाहुकृतोकच्छराय गवां कोटिप्रदो भव। "मन्त्र का जप करना चाहिए। गोवर्धन पूजा धार्मिक मान्यता से तो जुड़ा है ही, पर्यावरण की सुरक्षा का भी सन्देश देता है 
भई दूज : पंच महोत्सव के पांचवे और अंतिम दिन भाई दूज का पर्व मनाया जाता है।  इसे यम द्वितीया के रूप में भी जाना जाता है। कहते हैं इस दिन यम देवता ने अपनी बहन यमी को दर्शन दिए थे यमी के द्वारा किये गए आदर सत्कार से प्रसन्न होकर यम ने बहन को यह वरदान दिया कि जो भाई-बहन आज अर्थात कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को एक साथ पवित्र  यमुना नदी में स्नान करेंगे तो उनकी मुक्ति हो जायेगी।  इस दिन बहन अपने भाई के तिलक लगाकर स्नेह-प्रेम की अभिव्यक्ति करती हैं। बदले में भाई अपनी बहन को उपहार आदि प्रदान करते हैं।  भाई-बहन के पवित्र रिश्ते से जुड़े इस अद्भुत पर्व के मर्म को समझना चाहिए और निहित स्वार्थ के लिए इस रिश्ते को कलंकित होने से बचाना चाहिए।
कार्तिक मास में पांच दिनों तक मनाये जाने वाले इस महोत्सव के प्रभाव से जीवन में धन सुख, स्वास्थ्य सुख, शांति, सद्भाव और सम्पन्नता प्राप्त होने के साथ-साथ स्नेह-प्रेम का भी संचार होता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल,फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार

Monday, 21 October 2013

सौभाग्य और संतान देने वाला है करवा चौथ का व्रत

  पति के स्वास्थ्य, लम्बी आयु, और सौभाग्य के साथ-साथ संतान सुख प्राप्त करने के लिये विवाहित महिलाओं द्वारा करवा चौथ का व्रत रखा जाता है। यह व्रत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को होता है। इस दिन महिलायें निर्जला व्रत रखते हुये शाम को व्रत के महात्म की कथा सुनती हैं और रात में चंद्रमा निकलने पर उसे अर्घ्य देकर भोजन करके व्रत का परायण करती हैं।
     करवा चौथ का व्रत रखने वाली महिलाओं द्वारा मिलकर व्रत की कथा सुनते समय चीनी अथवा मिट्टी के करवे का आदान-प्रदान किया जाता है तथा घर की बुजुर्ग महिला जैसे ददिया सास, सास, ननद या अन्य सदस्य को बायना, सुहाग सामग्री, फल, मिठाई, मेवा, अन्न, दाल आदि एवं धनराशि देकर और उनके चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लिया जाता है। इस व्रत में भगवान शिव शंकर, माता पार्वती, कार्तिकेय, गणेश और चंद्र देवता की पूजा अर्चना करने का विधान है।
     करवा चौथ के संबंध में एक कथा का उल्लेख मिलता है। प्राचीनकाल में एक धर्मपरायण साहूकार के सात बेटे तथा एक बेटी थी। बडी होने पर बेटी का विवाह हो गया। विवाह के बाद जब वह अपने मायके आई तो करवा चौथ का दिन भी पडा। उसने उस दिन निर्जला व्रत रखा। चंद्रमा निकलने से पहले ही उसे भूख सताने लगी। भूख के कारण उसका कोमल चेहरा मुरझाने लगा। बहन की यह दशा देखकर उसके भाईयो ने एक दीपक जलाकर छलनी से ढकते हुये नकली चंद्रमा बनाया और बहन ने बोले कि चांद निकल आया है, अर्घ्य देकर व्रत खोल लो। अपने भाईयो की बात पर विश्वास करके बहन ने चंद्रमा को अर्घ्य दे  दिया और भोजन कर लिया । भोजन के  समय उसके ग्रास में बाल और कंकड निकले। उसकी ससुराल से पति के गंभीर बीमार होने का समाचार भी आ गया। वह तत्काल मायके से विलाप करती हुई अपनी ससुराल के लिये चल पडी।
     दैवयोग ऐसा रहा कि उसी समय इन्द्राणी देवदासियो के साथ आकाश मार्ग से निकाल रही थी। उसने विलाप करती बहन को देखा तो वह उसके पास आ गई  और विलाप करने का कारण पूछा। कारण जानने के बाद इन्द्राणी ने कहा कि तुमने करवा चौथ के व्रत में चन्द्रमा निकलने से पहले ही अन्न-जल ग्रहण कर लिया था, इस कारण ही तुम्हारे पति की यह दशा हो गई है। अपने पति के प्राणो की रक्षा के लिए तुम्हें एक वर्ष तक हर माह चतुर्थी तिथि को व्रत रखते हुए पति की सेवा करनी होगी। करवा चौथ वाले दिन निर्जल व्रत रखकर विधि-विधान से गौरा पार्वती, भगवान शिव, कार्तिकेय और गणेश की पूजा करके और रात्रि में चन्द्र दर्शन के बाद अर्घ्य देकर ही अन्न-जल ग्रहण करने से तुम्हें तुम्हारा सुहाग वापस मिल जाएगा।
     इन्द्राणी के कहे अनुसार उस कन्या ने एक वर्ष तक पूरे मनोयोग से अपने पति की सेवा की, हर माह की चतुर्थी तिथि को नियम धर्म से व्रत रखते  हुए करवा चौथ के दिन निर्जला व्रत रखा और रात्रि में चन्द्रमा निकलने पर उसे अर्घ्य देकर व्रत का परायण किया। उसके द्वारा चौथ माता से अपनी भूल के लिए क्षमा याचना करते हुए पति के स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना भी की गई. इससे चौथ माता ने प्रसन्न होकर उसके पति को स्वस्थ कर दिया।
     करवा चौथ की यह कथा सुनने से विवाहित महिलाओं का सुहाग बना रहता है, उनके घर में सुख, शान्ति,समृद्धि और सन्तान सुख मिलता है। महाभारत में भी करवा चौथ के महात्म पर एक कथा का उल्लेख मिलता है, जिसके अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने द्रोपदी को करवा चौथ की यह कथा सुनाते हुये कहा था कि पूर्ण श्रद्धा और विधि पूर्वक इस व्रत को करने से समस्त दुख दूर हो जाते हैं और जीवन में सुख-सौभाग्य तथा धन-धान्य की प्राप्ति होने लगती है। श्री कृष्ण भगवान की आज्ञा मानकर द्रोपदी ने भी करवा चौथ का व्रत रखा था। इस व्रत के प्रभाव से ही अर्जुन सहित पांचो पाण्डवो ने महाभारत के युद्ध में कौरवो की सेना को पराजित कर विजय हासिल की।
     करवा चौथ के व्रत में चन्द्रमा निकलने तक कुछ भी अन्न-जल ग्रहण नहीं किया जाता है, इसलिये व्रत रखने से पूर्व महिलाओं को एक दिन पहले रात्रि में अपनी रुचि के अनुसार भोजन, मिष्ठान, फल आदि का सेवन अवश्य कर लेना चाहिये। जिन महिलाओं को ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, खून की कमी आदि बीमारी हो अथवा वे गर्भवती हो तो उन्हे अपने डॉक्टर से सलाह लेने के बाद ही व्रत रखना चाहिये। व्रत खोलते समय खाली पेट सिर्फ पानी नहीं पीना चाहिये बल्कि पहले कुछ मीठा या फल खाने के बाद ही पानी लेना चाहिये। ताजा फलो का रस भी लिया जा सकता है। खाली पेट पानी पीने से ऐसीडिटी अथवा पेट दर्द की समस्या हो सकती है। व्रत के बाद भोजन एक साथ न करके थोडे-थोडे अंतराल पर ही करना चाहिये। भोजन में अधिक तले-भुने और गरिष्ट खाद्य पदार्थो के सेवन से बचना चाहिये। व्रत शरीर और मन की शुद्धता के लिये किये जाते हैं,  इसलिये यह आवश्यक है कि महिलाये समझदारी से व्रत रखे और अपने संपूर्ण परिवार की खुशहाली का माध्यम बने। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल,फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार

Thursday, 17 October 2013

18 अक्तूबर , 2013 : शरद पूर्णिमा पर विशेष:

     आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णमासी तिथि को शरद पूर्णिमा या कार्तिक पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने मुरली वादन करते हुये पतित पावनी यमुना जी के तट पर गोपियो के साथ रास रचाया था इसलिये इसे "रास पूर्णिमा" भी कहा जाता है. नारद पुराण में इस तिथि को "कोजागर व्रत" कहा गया है।  पुराण और शास्त्रों के अनुसार इस दिन विधि-विधान से व्रत करके धन की देवी महालक्ष्मी, श्री कृष्ण और चन्द्र देवता की आराधना करने से धन-धान्य, सुख-शान्ति एवं सद्गति की प्राप्ति होती है।
     नारद पुराण में कहा गया है कि शरद पूर्णिमा के दिन प्रातः स्नान करके उपवास रखते हुए जितेंद्रिय भाव से रहना चाहिये। ताम्बे अथवा मिट्टी के कलश पर वस्त्र और आभूषण से सुसज्जित लक्ष्मी जी की प्रतिमा स्थापित करके उनकी धूप,  दीप,पुष्प, नैवेद्य, अन्न, फल, शाक आदि से पूजन करते हुए घी, शक्कर, चावल तथा दूध से निर्मित खीर का प्रसाद लगाकर उसे चन्द्रमा की चाँदनी में रखना चाहिए। इस दिन रात्रि के समय दीप दान करना भी शुभ माना गया है।  ऐसा करने से मनुष्य इस लोक में सुख भोग कर अन्त मे विष्णुलोक को प्राप्त होता है।
    कहा जाता है कि शरद पूर्णिमा की रात में धन एवं समृद्धि की देवी महालक्ष्मी अपना रुप परिवर्तित करके भू लोक पर विचरण करते हुए यह देखती है कि कौन-कौन मनुष्य जागरण कर रहा है।  देवी भागवत के अनुसार जो मनुष्य इस रात्रि में पूर्ण श्रद्धा भाव, नियम-धर्म और पवित्र आचरण के साथ  भगवान विष्णु एवं लक्ष्मी की  पूजा-अर्चना करते हुए जागरण करता  है, उस पर लक्ष्मी जी की असीम कृपा होती है और उसके जीवन में सुख-समृद्धि, धन तथा शान्ति का कभी अभाव नही रह्ता है।
    शरद पूर्णिमा के दिन सन्तान सुख की कामना के साथ व्रत रखे जाने का भी विधान है।  इस सम्बन्ध में एक कथा प्रचलित है।  एक साहूकार की दो पुत्रियों में से एक पुत्री तो पूर्णमासी का व्रत विधि-विधान के साथ पूरा करती, जबकी दूसरी पुत्री आधे-अधूरे मन से व्रत रखती। इस कारण उसकी संतानें जीवित नहीं रह पाती थी।  एक बार जब उस पुत्री के नवजात पुत्र की मृत्यु हो गई तो उसने एक ब्राह्मण के कहे अनुसार अपने मृत पुत्र को पीढ़े पर लिटाकर कपडे से ढक दिया।  इसके बाद उसने अपनी बहन को बुलाया और उस पीढे पर बैठने को कहा।  जैसे ही उस बहन का वस्त्र मृत बच्चे के शरीर से छुआ, वह जीवित होकर रोने  लगा।  यह देखकर बहन क्रोधित हो गई और बोली, अगर पीढ़े पर बैठने से लड़का मर जाता तो क्या उसे कलंक नहीं लगता। बहन की बात सुनकर उसने कहा कि उसका पुत्र तो पहले से ही मृत था, वह तो तुम्हारे स्पर्श से जीवित हुआ है क्योंकि तुम जो श्रद्धा भाव से पूर्णमासी का व्रत करती हो वह उसी का पुण्य प्रभाव है।  इसके बाद उसने यह मुनादी  करवा दी कि जो भी स्त्री-पुरुष शरद पूर्णिमा का व्रत करेंगें, उनकी समस्त मनोकामनायें पूरी होंगी और उन्हे सन्तान का सुख भी प्राप्त होगा।
    शरद पूर्णिमा वाले दिन सायं काल में घर के मन्दिर में, तुलसीजी के पास, पीपल के वृक्ष के नीचे शुद्ध घी के दीपक प्रज्ज्वलित करने चाहिए। रात्रि में पूर्ण विधि-विधान से महालक्ष्मी का अनुष्ठान करते हुए पुरुष सूक्त, श्री सूक्त, लक्ष्मीस्तव, कनकधारा स्त्रोत का पाठ करना चाहिए। पाठ पूर्ण होने के बाद कमलगट्टा, सुपारी, पंचमेवा, नारियल, बेलफल, मखाने, हवन सामग्री आदि से मन्त्र "ॐ ह्रीं श्री दारिद्र्यनाशिन्यै नारायण प्रियवल्लभायै भगवत्यै महालक्ष्मये स्वाहा" का  जप करते हुए एक सौ आठ आहुतियों के साथ हवन करना चाहिए। यदि स्वयं पाठ करना सम्भव न हो तो किसी वैदिक ब्राह्मण से पाठ करवा कर एवं अपनी श्रद्धा के अनुसार भोजन कराकर अन्न, वस्त्र, फल, धन आदि दान देना चाहिए। इस प्रकार किए गए अनुष्ठान से अनन्त फल की प्राप्ति होती है।
    ज्योतिष मान्यता के अनुसार शरद पूर्णिमा की रात्रि में चन्द्र देवता शोडश कलाओं से परिपूर्ण होते है. इस रात्रि  चन्द्रमा का प्रकाश अन्य दिनों की अपेक्षा बहुत अधिक होता है।  इसलिए शरद पूर्णिमा की रात्रि में चन्द्रमा को जल या दुग्ध मिश्रित जल से अर्घ्य देना, चन्द्रमा की रोशनी में खीर रखना, सुई में धागा पिरोना, रात्रि में चन्द्र दर्शन करना जैसे कार्य करना शुभ फल देने वाले माने गए है।  विवाह होने के बाद जो स्त्री-पुरुष पूर्णमासी का व्रत रखना चाह्ते है, उन्हें शरद पूर्णिमा से ही व्रत की शुरुआत करनी चाहिए।
    जन्म कुण्डली में ग्रह दोष होने पर शरद पूर्णिमा की रात्रि में चन्द्रमा का पूजन करके "ॐ श्रां श्री श्रौ सः सोमाय नमः" मन्त्र का जप करने से ग्रह शान्ति होने के साथ-साथ महालक्ष्मी और चन्द्र देवता की कृपा से विभिन्न समस्यायों का समाधान होता है तथा जीवन में समस्त सुखों की प्राप्ति होती है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल,फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार

Friday, 11 October 2013

विजय का पर्व विजयदशमी

    विजय दशमी को समस्त कामनाओं की पूर्ति और विजय का पर्व माना जाता है धार्मिक ग्रन्थों  में आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को विजय दशमी पर्व मनाये जाने का विधान है। इस दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने अधर्म, अन्याय और अत्याचार के प्रतीक लंका के राजा रावण का वध किया था धार्मिक ग्रन्थों  अनुसार जब भी पृथ्वी पर धर्म की हानि होने से अन्याय, अत्याचार और अनाचार बढने लगते हैं, भगवान मनुष्य  शरीर धारण करके इस पृथ्वी पर अवतरित होते हैं 
    भगवान विष्णु के अवतार के रुप में प्रभु श्री राम ने भी ऋषि-मुनियों तथा राज्य की जनता को राक्षसो से निजात दिलाने के लिए चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को कर्क लग्न और पुनर्वसु नक्षत्र में कौशल नरेश दशरथ के यहाँ महारानी कौशल्या की कोख से जन्म लिया। भगवान श्री राम महानता की अद्भुत प्रतिमूर्ति थे उनकी लीलायें मनुष्यों के लिए आदर्श का पर्याय हैं गुरुकुल में निस्वार्थ भाव से गुरु सेवा, वचन पालन के लिए वन गमन, शरणागत की रक्षा, मित्र धर्म का निर्वहन, एक पत्नीव्रत पालन, भाई के प्रति प्रेम, शान्त-चित्त व्यक्तित्व, उदारता, दया भाव, समस्त चर-अचर जीवों के प्रति प्रेम एवं स्नेह- भगवान श्री राम के व्यक्तित्व और कृतित्व की महानता को दर्शाते हैं 
    चूकि विजय दशमी को समस्त मांगलिक कार्यो के लिये प्रशस्त माना जाता है, इसलिये ज्योतिष शास्त्र में इन इस तिथि को अबूझ मानते हुए इस दिन विभिन्न संस्कार युक्त कार्य जैसे बच्चे का नामकरण, अन्न प्राशन, मुंडन, कर्ण छेदन, यज्ञोपवीत, वेदारंभ, ग्रह प्रवेश, भूमि पूजन, नवीन व्यापार या दुकान का  उद्घाटन, नए वाहन या सामान की खरीद आदि कार्य किए जाने की अनुमति दी गयी है
    नवरात्र के नौ दिनों तक मा दुर्गाजी के नौ स्वरूपों की आराधना करके दशमी तिथि को विजय दशमी पर समस्त सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिए अत्यन्त पवित्र माने जाने वाले शमी वृक्ष और अस्त्र-शस्त्र की पूजा की जाती है पौराणिक कथा के अनुसार हनुमान जी ने जनक नन्दनी सीता जी को शमी के समान पवित्र कहा था, इसलिए माना जाता है कि इस दिन घर की पूर्व दिशा में या मुख्य स्थान में शमी की टहनी प्रतिष्ठित करके उसके पूजन से घर-परिवार में खुशहाली आती है और विवाहित महिलाओ का सौभाग्य अखण्ड बना रहता है
शमी के पूजन से मनुष्य के पाप और मुसीबतों का अन्त भी होता है 
रावण काम, क्रोध, मद्, लोभ और मोह जैसी बुराइयो का प्रतीक हैअयोध्या पति श्री राम ने रावण का वध करके संसार को यह संदेश दिया कि ये सभी बुराईया मनुष्य के पतन का कारण हैं ज्ञानी-ध्यानी और विद्वान होने के बावजूद अगर किसी मनुष्य में ये समस्त बुराइया विद्यमान हैं तो उसकी सारी योग्यतायें व्यर्थ हैं मनुष्य के बुरे कर्म एक न एक दिन उसके अन्त का कारण अवश्य ही  बनते हैं 
 विजय दशमी के दिन सकल सिद्धियों की प्रदाता अपराजिता देवी जी की पूजा-अर्चना भी की जाती है शास्त्रों के अनुसार अपराजिता देवी को मा दुर्गा भगवती का अवतार माना गया है इनके पूजन  से कार्यों में विजय हासिल होती है और जीवन में आने वाली परेशानियों एवं समस्यायों का अन्त होता है इसके अलावा जीवन में सभी कामों में सफलता पाने के लिए इस दिन रामरक्षास्त्रोत, श्री रामचरित मानस का सुन्दरकाण्ड और लंका काण्ड में वर्णित राम-रावण युद्ध का पाठ करना भी शुभ माना गया है  
    वर्तमान समय में श्री राम का सम्पूर्ण जीवन दर्शन न सिर्फ प्रासंगिक और अनुकरणीय है बल्कि मनुष्य के भीतर छिपे दुर्गुणों को दूर करने के लिए भी अनिवार्य है जिस प्रकार विजय दशमी पर्व  अधर्म पर धर्म की विजय का पर्व है उसी प्रकार भगवान श्री राम का आदर्श व्यक्तित्व महान और प्रभावशाली है जीवन में सुख, समृद्धि, कामनाओ की पूर्ति तथा विजय प्राप्त करने के लिए विजय दशमी पर्व पर श्री राम की आराधना करते हुए उनके आदर्शों को आत्मसात करने का संकल्प लेना चाहिए-- प्रमोद कुमार अग्रवाल,फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार

Tuesday, 8 October 2013

सही दिशा में लगा नल देता है शुभ प्रभाव

 समस्त घरों में पानी की आपूर्ति के लिए नल और पानी की टंकी अथवा टैंक लगवाये जाते हैं. वास्तुशास्त्र के अनुसार घर में सही दिशा में लगाया गया नल शुभ प्रभाव देने के साथ-साथ धन की समस्या को भी दूर करता है. जिन घरों में वास्तु के नियमों के विपरीत नल, पानी की टंकी, बोरिंग आदि लगे होते हैं, उनमें कई तरह की समस्यायों का सामना करना पड़ सकता है.
     वास्तु के अनुसार घर की पूर्व दिशा में नल या पानी की टंकी लगवाने से घर के मालिक के मान-सम्मान और ऐश्वर्य में वृद्धि होती है. इसी प्रकार घर की उत्तर दिशा में पानी का स्त्रोत अत्यंत लाभदायक और धन लाभ कराने वाला माना गया है. 
     घर के ईशान कोण अर्थात उत्तर-पूर्व दिशा में नल, पानी की टंकी या बोरिंग लगवाने से शुभ प्रभाव मिलने के साथ ही आर्थिक उन्नति के भरपूर अवसर भी मिलने लगते हैं. वहीँ घर की पश्चिम दिशा में नल या पानी का स्त्रोत रखने से उस घर के सदस्यों को मानसिक एवं शारीरिक समस्याओं से जूझना पड़ सकता है. 
     घर की दक्षिण दिशा में नल या पानी का स्त्रोत रखने से तरह-तरह के कष्टों का सामना करने की संभावनाएं बनी रहती हैं. विशेषकर घर की महिलाओं को ज्यादा कष्टों का सामना करना पड़ सकता है. दक्षिण-पूर्व दिशा में नल या पानी का कोई भी स्त्रोत होने से घर के मालिक के पुत्रों में विवाद रहता है, जबकि दक्षिण-पश्चिम दिशा में नल आदि होने से घर के सदस्यों को मृत्युतुल्य कष्ट मिलता है. घर के मध्य भाग में कोई कुं आ या पानी का भंडारण नहीं होना चाहिए।ऐसा होने से घर में बीमारियाँ, कलह और अर्थाभाव देखने को मिलता है. 
घर में लगे सभी नलों की उचित देख-रेख भी आवश्यक है. इस बात पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए कि घर में लगे किसी भी नल से पानी न टपकता हो. नलों से पानी का टपकना एक प्रकार का वास्तु दोष ही है. इसके कारण घर के मुखिया की आय कम होने लगती है, जबकि घर के खर्चे अधिक हो जाते हैं.  घर में सुख, शांति और समृद्धि के लिए नल और पानी के समस्त स्त्रोतों को वास्तु के अनुसार सही दिशा में ही रखा जाना चाहिए। --प्रमोद कुमार अग्रवाल, फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार 

Friday, 4 October 2013

दुर्गा सप्तशती पाठ से होती हैं मनोकामनाएं पूरी

    वैदिक ज्योतिष में प्रत्येक वर्ष चार नवरात्रों का उल्लेख मिलता है इन नवरात्रों में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में वासंतिक नवरात्र, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में शारदीय नवरात्र तथा आषाढ़ एवं माघ मास के शुक्ल पक्ष में गुप्त नवरात्र मनाये जाते हैं इन चारों नवरात्रों में आदि शक्ति माँ भगवती देवी की पूर्ण भक्ति भाव और उल्लास के साथ पूजा-अर्चना होती है कहा जाता है कि नवरात्र के दिनों में जो भक्त दुर्गा सप्तशती के साथ-साथ राम चरित मानस, रामायण का अखंड पाठ, नवाह्न पारायण पाठ करता है , उसे समस्त सुख और सिद्धि प्राप्त हो जाती हैं 
    नवरात्र में नौ दिनों तक महाशक्ति के रूप में माँ भगवती के नौ अलग-अलग स्वरूपों की विधि-विधान से आराधना की जाती है धर्म ग्रंथों में कहा गया है कि आदिशक्ति दुर्गा समस्त जगत का कल्याण करने वाली हैं इन्हीं से मरुदगण, गन्धर्व, इन्द्र देवता, अग्नि देवता, अश्वनी कुमार का उद्भव हुआ है. श्रद्धा, बुद्धि, मेधा और कल्याण की प्रदाता दुर्गा धर्म, सत्य, सदाचार, नीति, सृजन, शान्ति, और सुख की वाहक हैं इनकी उपासना मात्र से मनुष्यों के समस्त कष्ट एवं पाप दूर हो जाते हैं तथा जन्म कुंडली में स्थित ग्रह-नक्षत्रों के दोष और भवन के वास्तु दोष दूर हो जाते हैं 
    आश्विन मास के शुक्ल पक्ष के नवरात्रों में भगवती दुर्गा की पूजा-अर्चना विशेष फलदायी मानी गयी है इन दिनों प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती का श्रद्धापूर्वक और विधि-विधान से पाठ करने से जीवन में शांति, सुख-समृद्धि एवं सुविचारों का उदय होता है भविष्य पुराण के प्रतिसर्गपर्व के द्वितीय खंड के अनुसार दुर्गा सप्तशती के आदि चरित्र, मध्यम चरित्र और उत्तम चरित्र के माहात्म का ध्यान पूर्वक अध्ययन एवं मनन करने से मनुष्य को वेदों के पढने का फल मिलता है, उसके पाप नष्ट होते हैं तथा इस जन्म में समस्त सुख भोग करके वह अंत में परम गति को प्राप्त होता है 
     माँ भगवती की उपासना के दौरान दुर्गा सप्तशती  का पाठ करने से पूर्व भक्तों को स्नान आदि दैनिक कर्मों से निवृत्त होकर घर की पूर्व दिशा अथवा उत्तर-पूर्व दिशा में  देवी जी की प्रतिमा अथवा मूर्ति को एक स्वच्छ एवं ऊंचे आसन पर लाल वस्त्र बिछाकर विराजमान करना चाहिए तथा उनके समक्ष शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करना चाहिए। 
     दुर्गा सप्तशती के पाठ से पूर्व भगवान् श्री गणेश, भोलेनाथ, विष्णु भगवान, लक्ष्मीजी, सरस्वतीजी एवं महाकाली का ध्यान करना चाहिए। तत्पश्चात विधि पूर्वक कलश, पञ्च लोकपाल, दस दिकपाल, सोलह मातृका, नवग्रह आदि का पूजन करते हुए दुर्गा सप्तशती के तेरह अध्यायों का पाठ करना चाहिए। दुर्गा सप्तशती के पाठों में शापोद्धार सहित कवच, अर्गला, कीलक एवं तीनों रहस्यों को भी पढ़ना चाहिए। पाठ पूर्ण होने के बाद नवार्ण मन्त्र का 108 बार जप करना चाहिए। इसके बाद पुनः शापोद्धार, उत्कीलन, मृत संजीवनी विद्या के मन्त्र, ऋवेदोक्त देविसुक्त, प्राधानिक रहस्य, वैकृतिक रहस्य, मूर्ति रहस्य, सिद्धिकुंजिकास्त्रोत, क्षमा प्रार्थना, भैरवनामावली पाठ, आरती तथा मन्त्र पुष्पांजलि के साथ पाठ का समापन करना चाहिए। जो लोग किसी कारण से दुर्गा सप्तशती का पाठ करने में असमर्थ हों वे नवरात्र में व्रत रखकर प्रतिदिन माँ भगवती के समक्ष हवन व आरती कर सकते हैं 

    दुर्गा सप्तशती का पाठ करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए कि दुर्गा सप्तशती की पुस्तक अपने हाथ में या जमीन पर न रखी जाए बल्कि किसी आधार पर रखने के बाद ही दुर्गा सप्तशती का पाठ आरम्भ किया जाए पाठ करते समय न तो पाठ को मन ही मन में पढ़ा जाये और न ही पाठ का उच्चारण स्वर बहुत तेज हो बल्कि दुर्गा सप्तशती  का पाठ करते समय वाचक का स्वर संतुलित एवं मध्यम रहे पाठ करते समय मन को एकाग्रचित्त बनाये रखना भी बहुत आवश्यक है, वरना पाठ करने का कोई लाभ प्राप्त नहीं होगा। दुर्गा सप्तशती के पाठ के बाद माँ भगवती दुर्गा की जय-जयकार भी करनी चाहिए। 
     नवरात्र के दिनों में देवी पूजन की पूर्णता के लिए कन्या-लांगुरों की पूजा करके उन्हें प्रसाद देकर प्रसन्न करना भी जरुरी है इससे माँ भगवती की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है नवरात्र में विधि-विधान से देवी जी की आराधना करने से भक्तों के समस्त मानसिक और शारीरिक विकार दूर हो जाते हैं, जीवन में सुख, समृद्धि, सुख-शान्ति, सुरक्षा और विश्वास आने लगते हैं
    वर्तमान समय में जबकि आजकल चहुँ और अनीति, अनैतिकता, अन्याय, अशांति, अधर्म, असत्य और अनाचार का बोलबाला है, आदिशक्ति देवी की पूजा अर्चना और दुर्गा सप्तशती का पाठ सम्पूर्ण जगत के लिए कल्याकारी सिद्ध हो सकता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल,फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार

शारदीय नवरात्र में श्री राम और हनुमान उपासना से होता है कल्याण

     आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथिसे शारदीय नवरात्र का शुभारम्भ  है. इस तिथि से नौ दिनों तक दुर्गाजी की पूजा-अर्चना होती है और दशमी तिथि को विजय पर्व दशहरा का त्यौहार मनाया जाता है. नवरात्र और दशहरा एक-दूसरे के पर्याय हैं क्योकि जहाँ एक ओर इन दिनों जगत जननी माँ दुर्गा की आराधना होती है, वहीँ दूसरी ओर भगवान् विष्णु के अवतार भगवान् श्री राम के जन्म से लेकर कौशल राज्य के राजा के रूप में राजगद्दी सम्हालने और आगे तक की लीलाओं का मंचन किया जाता है.
  नवरात्र में माँ दुर्गा और प्रभु श्री राम की उपासना किये जाने के सम्बन्ध में यह  माना जाता है कि रावण पर विजय प्राप्त करने के लिए श्री राम ने आश्विन मास में माँ शक्ति की आराध्य दुर्गाजी के काली स्वरुप की श्रद्धा भाव से पूजा-अर्चना करके उनका आशीर्वाद प्राप्त किया था. 
  मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्री राम ने दुर्गाजी की कृपा से अपने सहयोगियों सुग्रीव, विभीषण, जामवंत, हनुमान, अंगद आदि के नेतृत्व में लंकापति रावन के साथ युद्ध किया और उस पर विजय प्राप्त करके अन्याय और अत्याचार के युग का अंत किया। उसी समय से नवरात्र पूजन का चलन हुआ माना जाता है. नवरात्र पूजन के दौरान दुर्गाजी की भक्ति के साथ-साथ श्री  रामजी  की विशेष कृपा प्राप्त करने के लिए रामायण का अखंड पाठ और श्री राम के अनन्य भक्त मारुती नन्दन अंजनी पुत्र पवनसुत हनुमान जी की भी आराधना की जाती है. हनुमान जी के दिव्य एवं संकटमोचक चरित्र को जानने के लिए श्रीरामचरित मानस का सुन्दरकाण्ड और हनुमान चालीसा अद्भुत ग्रन्थ हैं. रुद्रावतार श्री हनुमान की श्री राम के प्रति अनन्य भक्ति, समर्पण भाव, निःस्वार्थ  प्रेम, मित्रता, वफादारी, परोपकार की भावना अपने आप में एक  मिसाल है. सदैव अमरता का वरदान प्राप्त हनुमान जी की उपासना और श्रद्धा भाव से उनके नाम का स्मरण मंगलकारी, विघ्ननाशक तथा संकटमोचक है.
   कहते हैं कि प्रभु श्री राम की कृपा से हनुमान जी को सदैव अमरता का वरदान मिला हुआ है. जहाँ कहीं भी रामायण का पाठ होता है, श्री राम जी की महिमा का बखान होता है अथवा दुर्गाजी की आराधना होती है, वहां हनुमान जी अवश्य ही उपस्थित रहते हैं. हनुमानजी के ह्रदय में दुर्गा जी के प्रति इतना अधिक प्रेम और श्रद्धा है कि वे स्वयं उनके आगे-आगे विजय पताका यानि ध्वज लेकर चलते हैं. जिस प्रकार दुर्गाजी लाल वस्त्र एवं चुनरी धारण करतीहैं, उसी प्रकार हनुमानजी भी अपने शरीर पर लाल सिन्दूर और लाल वस्त्र धारण करना पसंद करते हैं. दुर्गाजी के समान ही हनुमानजी पर लाल रंग के पुष्प जैसे लाल  कनेर,कुमुद, केतकी, मालती, मल्लिका, नागकेसर, कमल आदि अर्पित किये जाते हैं. 
    नवरात्र में दुर्गाजी और श्री रामजी की अद्भुत कृपा पाने के लिए तुलसी दास द्वारा रचित श्री हनुमान चालीसा का पाठ किया जाता है. वहीँ सुन्दरकाण्ड का पाठ करके हनुमान जी को प्रसन्न किया जा सकता है. वैसे तो सम्पूर्ण हनुमान चालीसा की प्रत्येक चौपाई तथा दोहे चमत्कारी  प्रभाव रखते हैं, फिर भी इसकी कुछ चौपाइयाँ ऐसी हैं जिनके पढ़ने और स्मरण करते रहने से बहुत से कष्ट, रोग एवं समस्याओं का त्वरित समाधान हो जाता है. 
     मन की शुद्धता और बुरे विचारों को दूर करने के लिए "महावीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी।।"का पाठ करना चाहिए। भूत-प्रेत जैसी बाधा से मुक्ति पाने के लिए "भूत पिसाच निकट नहीं आवैं। महाबीर जब नाम सुनावै।।" का जप करना चाहिए। शारीरिक एवं मानसिक बीमारियों में लाभ प्राप्त करने के लिए "नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा।। का पाठ बार-बार करना चाहिए।
     जीवन में आने वाले तरह-तरह के संकटों से बचने के लिए हनुमान चालीसा की ये दो चौपाई सहायता करती हैं:-"संकट ते हनुमान छुडावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।"तथा  "संकट कटे मिटे सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।" मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए "और मनोरथ  जो कोई लावै। सोई अमित जीवन फल पावै।।" का जप करना लाभकारी होता है.
    जीवन की विभिन्न समस्याओं से मुक्ति पाने के लिए सुन्दरकाण्ड का पाठ भी श्रद्धापूर्वक किया जा सकता है. वैसे तो सुन्दरकाण्ड के नियमित पाठ से शीघ्र लाभ मिलता है, लेकिन अगर समय का अभाव हो तो सप्ताह में दो बार अर्थात मंगलवार और शनिवार को यह पाठ अवश्य करना चाहिए। कहते हैं कि हनुमान उपासना एवं सुन्दरकाण्ड का पाठ करने से दोषपूर्ण मंगल और शनि ग्रह के दुष्प्रभाव भी दूर होने लगते हैं.                 सुन्दरकाण्ड का पाठ करने से संतान बाधा, व्यापार बाधा, असाध्य रोग, शत्रु पीड़ा, परिश्रम के बावजूद असफलता, वास्तु दोष आदि दूर होने लगते हैं और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सकारात्मकता एवं शुभता आने लगती है.
सुन्दरकाण्ड में दी गयी चौपाई "प्रबिसि नगर कीजे सब काजा, ह्रदय राखि कौसलपुर राजा।" ; " गरल सुधा रिपु करहिं मिताई, गोपद सिंधु अनल सितलाई।" ; "दीन दयाल बिरदु संभारी, हरहूँ नाथ मम संकट भारी।" ;  "अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता।।" ; "आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना।।" ; " तुम्ह कृपाल  अनुकूला। ताहि  न ब्याप त्रिबिध भव सूला" ; "करहुं कृपा प्रभु अस  । निर्भर प्रेम मगन हनुमाना।।" ; "कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटी बिलोकत सकल सभीता।।" ; "देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महूँ गरुड़ असंका।।" ; "सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा।।" का पाठ करने से आशातीत लाभ होते हैं.  
     जीवन में रोग, कष्ट और समस्याओं निजात पाने के लिए हनुमान जी की उपासना और उपरोक्त पाठ करना विशेष फलदायी होता है तथा भक्तों पर हनुमान जी एवं प्रभु श्री राम तथा जानकी जी की कृपा  बनी रहती है.-- प्रमोद कुमार अग्रवाल,फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार

जन-जन के प्रणेता हैं महाराजा अग्रसेन

     एक ईंट और एक रूपया देकर समाज के कमजोर वर्ग के लोगों का आर्थिक विकास करके समतावाद स्थापित करने का स्वप्न साकार करने वाले अग्रवाल शिरोमणि महाराजा अग्रसेन का नाम जन-जन के प्रणेता के रूप में सम्मान के साथ लिया जाता है प्रताप नगर के सूर्यवंशी क्षत्रिय राजा वल्लभ तथा महारानी भगवती के पुत्र अग्रसेन बचपन से ही अत्यंत तेजस्वी एवं मेधावी थे 
     अग्रसेन की योग्यता, शास्त्रों में निपुणता, सहिष्णुता, करुणा, सौम्यता, सौहार्दता और दयाभाव से प्रभावित होकर नागराज कुमुट की सुपुत्री माधवी ने अपने स्वयंवर में पधारे वीर योद्धा, महाराजा, देवता और राजाओं को छोड़कर अग्रसेन के गले में वरमाला डाल कर उनका पति के रूप में वरण कर लिया जिससे देवराज इंद्र ने नाराज होकर उनके राज्य में वर्षा नहीं की. परिणामस्वरूप राज्य में सूखा पड़ने से प्रजा में त्राहि-त्राहि मच गयी, परन्तु अग्रसेन जी ने विचलित हुए बिना अपने इष्ट देव भगवान् शिव की आराधना की भगवान् शिव की अनुकम्पा से अग्रसेन जी के राज्य में न केवल प्रचुर वर्षा हुई बल्कि वहां सुख-समृद्धि और खुशहाली आ गयी
     महाराजा अग्रसेन ने समता और समाजवाद पर आधारित एक ऐसे समाज की स्थापना की जहाँ न तो कोई छोटा था और न कोई बड़ा उन्होनें अपने राज्य में समस्त निवासियों के लिए धन-संपदा एवं वैभव हेतु महालक्ष्मी जी की कठोर तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया और उनसे समस्त सिद्धि और धन-वैभव प्राप्त होने का आशीर्वाद लिया।
     महाराजा अग्रसेन ने अपने राज्य में यज्ञ के समय दी जाने वाली पशु-बलि का न सिर्फ विरोध किया बल्कि यह आदेश भी लागू कर दिया कि राज्य का कोई भी मनुष्य पशुओं की बलि नहीं चढ़ाएगा और न ही पशुओं का वध करके उनका मांस भक्षण करेगा। अग्रसेन जी का कहना था कि मनुष्यों के समान समस्त जीव-जंतुओं में भी प्राण होते हैं उनका वध करने का अर्थ है जीवों के प्रति हिंसा।
     समस्त वेद, वेदों के छः अंग, निरुक्त ज्ञान, ज्योतिष, व्याकरण, कल्प शिक्षा, अस्त्र-शस्त्र संचालन आदि में प्रवीण महाराजा अग्रसेन ने अग्रोहा गणराज्य की स्थापना की उनके राज्य के निवासियों को योध्या तथा अगेया के नाम से जाना जाता था उनके राज्य में कहीं कोई दुखी व दरिद्र नहीं था कहते हैं कि उनके राज्य में करीब एक लाख परिवार निवास करते थे। जब भी कोई नया व्यक्ति बाहर से आकर परिवार सहित उनके राज्य में बसना चाहता, एक ईंट-एक रूपया नीति के तहत उसे बसने के लिए एक लाख ईंट और व्यवसाय के लिए एक लाख रुपये मिल जाते। 
    समाज के निर्धन वर्ग के उत्थान की दिशा में महाराजा अग्रसेन की यह नीति अपने आप में अनोखी थी क्योंकि इसमें समाज के पारस्परिक सहयोग से राज्य के समस्त नागरिकों को समानता का अधिकार देने की निःस्वार्थ भावना थी जिसमें किसी तरह का कोई भेद-भाव, दाता अथवा याचक का भाव नहीं होता था
    गुरुसेवी, सत्यवादी, कूटनीतिज्ञ, प्रजापालक, कुशल शासक, दूरदर्शी एवं वीर योद्धा के रूप में महाराजा अग्रसेन ने अपने राज्य पर आक्रमण करने वाले राजाओं को पराजित किया और अनेक युद्धों में विजय पताका फहराई। अग्रसेन जी ने एक सौ आठ वर्षों तक कुशलतापूर्वक शासन करके दुनिया को यह सन्देश दिया कि स्व हित का त्याग करके राज्य की जनता की भलाई के लिए पूर्ण समर्पण भाव से राजा के कर्तव्यों का निर्वहन करना ही सबसे बड़ी सेवा है
    महाराजा अग्रसेन जी ने अपने राज्य में जनहित में स्कूल, अस्पताल, धर्मशालाएं, बावडी आदि का निर्माण कराया।  महाराजा अग्रसेन जी ने काम, क्रोध, लोभ और मद को अपने वश में रखने तथा सदैव धर्मपूर्ण आचरण पर चलने की शिक्षा समाज को दी उन्होनें अपने राज्य में आत्मनिर्भरता, समानता, जीवन मूल्य, धार्मिक सहिष्णुता, समाजवाद, निष्काम कर्म, दयालुता, सत्यवादिता, कृतज्ञता जैसे दिव्य आदर्श गुणों को आत्मसात करने की प्रेरणा दी
    जन-जन के प्रणेता महाराज अग्रसेन जी का सम्पूर्ण जीवन दर्शन सभी के लिए न सिर्फ अनुकरणीय है बल्कि वर्तमान समय के लिए सामयिक भी है।अग्रसेन जी के बताये गए सिद्धांत और नीतियों को अपनाकर एक सुखी, समृद्ध और सामाजिक समरसता पर आधारित समाज की स्थापना की जा सकती है, इसमें कोई सन्देह नहीं है--- प्रमोद कुमार अग्रवाल, फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार