Thursday, 21 November 2013

वास्तु दोष भी है विवाह में विलम्ब का कारण

     वास्तु शास्त्र का सम्बन्ध हमारे सम्पूर्ण जीवन से है। भवन और जमीन की स्थिति, शयन करने के तरीके, बेड की स्थिति आदि का प्रभाव किसी न किसी रूप में हमारे ऊपर अवश्य ही पड़ता है। वास्तु दोष होने पर कैरियर, धन, संतान, दाम्पत्य जीवन, संतान की पढ़ाई और उनके विवाह आदि में समस्याएँ आने लगती हैं। सब कुछ ठीक होने के बावजूद अगर विवाह योग्य लड़के अथवा लड़की के विवाह में अनावश्यक विलम्ब हो रहा हो तो इसका कारण जन्म कुंडली में ग्रह दोष या वास्तु दोष हो सकता है।
    वास्तु के अनुसार गलत दिशा में लगाया गया बेड विवाह में बाधक होता है। लड़के को सदैव पूर्व या उत्तर-पूर्व दिशा अर्थात ईशान कोण में तथा लड़की को उत्तर-पश्चिम दिशा अर्थात वायव्य कोण में ही अपना बेड लगाना चाहिए।  
    बेड दीवार से अलग हटकर लगाना चाहिए। दीवार से सटाकर लगाया हुआ बेड दोषपूर्ण माना जाता है। बेड पर बैठकर भोजन करने से बचना चाहिए। सोते समय करवट बायीं  तरफ ही रहे। दाहिनी ओर करवट लेकर सोने से मानसिक अस्थिरता एवं नकारात्मकता बनी रहती है।
    बेड के नीचे किसी तरह का कोई सामान, कागज, कबाड़ा आदि नहीं रखना चाहिए। अगर बेड बॉक्स वाला है तो इस बात का विशेष ध्यान रखें कि उसमें केवल ओढ़ने-बिछाने के कपडे, चादर, रजाई, गद्दे, तकिया आदि ही रखें जाएँ। अन्य सामान भरने से नकारात्मक ऊर्जा का संचार होने लगता है। जिससे विवाह में बाधा आती है। 
     जगह की कमी की वजह से यदि बॉक्स वाले बेड में अन्य सामान रखना मजबूरी हो तो इस नकारात्मक प्रभाव से बचने के लिए बेड के नीचे एक बाउल में समुद्री या सेंधा नमक रखें या फिर बेड के चारों पायों के नीचे तांबे की एक-एक स्प्रिंग लगा दें। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल,फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार

Thursday, 14 November 2013

तुलसी विवाह कराने से मिलता है परम धाम

 तुलसी विवाह कराने से मिलता है परम धाम
     कार्तिक मास में तुलसी पूजन को विशेष महत्त्व दिया गया है। तुलसी को भगवान् विष्णु की प्रिया माना जाता है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी, दशमी तथा एकादशी तिथि को तुलसी का पूजन और व्रत  करके सुयोग्य ब्राह्मण को तुलसी का पौधा दान  करना शुभ फल प्रदान करने वाला माना गया है। इस मास में एकादशी तिथि के दूसरे दिन अर्थात द्वादशी तिथि को तुलसी विवाहोत्सव मनाया जाता है। 
    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो मनुष्य कार्तिक मास में तुलसी को कन्या के रूप में स्वीकार हुए भगवान विष्णु को कन्यादान करके तुलसी विवाह संपन्न कराता है, उसे परम धाम की प्राप्ति होती है। कुछ श्रद्धालु एकादशी तिथि से कार्तिक की पूर्णिमा तक तुलसी का पूजन करते हैं और पूर्णिमा के दिन तुलसी विवाहोत्सव मनाते हैं। 
    धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से तुलसी को भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना में अनिवार्य माना जाता है। तुलसी दल के बिना शालिग्राम अथवा विष्णु शिला का पूजन अपूर्ण माना जाता है। 
    तुलसी को वृंदा भी कहा गया है। वृंदा जालंधर नाम के एक राक्षस की पतिव्रता पत्नी थी। राक्षस के अत्याचार का अंत करने के उद्देश्य से भगवान विष्णु ने छल करते हुए वृंदा का  पतिव्रत धर्म नष्ट कर दिया जिससे नाराज होकर उसने भगवान विष्णु को श्राप  दिया और स्वयं पति के शव के साथ सती हो गयी। तब विष्णु भगवान ने पश्चाताप स्वरुप वृंदा की चिता की भस्म में तुलसी, आंवला एवं मालती के वृक्ष लगाये। इसी तुलसी को भगवान विष्णु ने वृंदा के रूप में मान्यता दी और तुलसी पूजन तथा तुलसी विवाह को आवश्यक बताया। 
    ज्योतिष और वास्तु शास्त्र में तुलसी के बारे में कहा गया है कि जिस घर में तुलसी का वास होता है वहाँ गृह दोष और वास्तु दोष नहीं रहते। घर के आँगन में तुलसी का पौधा लगाकर प्रतिदिन उस पर जल अर्पित करके दीप जलाकर पूजन करने से घर में रोग, शत्रु भय, धनाभाव और बुरी आत्माओं का कोई प्रभाव नहीं होने पाता है। तुलसी आसपास के पर्यावरण को पूर्णतः कीटाणुमुक्त बनाये रखती है। इसलिए हमें अपने घर में अनिवार्य रूप से तुलसी लगानी चाहिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल

Wednesday, 13 November 2013

वैवाहिक जीवन में सुख-शांति लाता है वास्तु अनुरूप बेडरूम

     आवासीय भवन में बेडरूम या शयन कक्ष एक ऐसा महत्वपूर्ण स्थान है जहाँ पति और पत्नी अपना अधिकाँश जीवन साथ-साथ बिताते हैं। लेकिन सब कुछ अच्छा होने के बावजूद बहुत बार यह देखने में आता है  कि उनके बीच बिना किसी उचित कारण के वाद-विवाद तथा मतभेद की स्थिति बनी रहती है जिसकी वजह से उनका पारिवारिक जीवन अशांत और कलहपूर्ण हो जाता है। 
     वैवाहिक जीवन में अगर इस तरह की स्थिति आ रही हो तो वास्तु की दृष्टि से अपने बेडरूम पर एक बार नजर अवश्य डाल लेनी चाहिए, क्योंकि हो सकता है कि बेडरूम वास्तु दोष से प्रभावित हो। वैवाहिक जीवन को खुशनुमा, सुखी और शांतपूर्ण बनाने के लिए अपने बेडरूम को वास्तु अनुरूप बनाना चाहिए।
+ भवन की दक्षिण-पश्चिम दिशा को बेडरूम के लिए उपयुक्त स्थान माना गया है। लेकिन स्थानाभाव होने पर पश्चिम, उत्तर-पश्चिम अथवा दक्षिण दिशा में भी बेडरूम बनाया जा सकता है। बच्चों के लिए शयन कक्ष पश्चिम दिशा में ही बनाना शुभ रहता है। 
+ बेडरूम की छत का समतल होना आवश्यक है। ढालू छत वास्तु के अनुसार  दोषपूर्ण है। यदि बेडरूम की छत ढालू है तो बेड छत की उस दिशा की ओर रखना चाहिए जहां छत  की ऊंचाई कम हो। 
+ पति-पत्नी के बीच आपसी प्रेम सम्बन्धों की मजबूती के लिएबेडरूम में दीवारों का रंग गुलाबी अथवा हल्का पीला रखा जाए तो अच्छा रहता है। नीला, लाल, काला या बेंगनी रंग अनावश्यक टकराव और मानसिक तनाव देता है। इसलिए बेडरूम में इन रंगों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। 
 + बेडरूम में लेंटर की बीम या लोहे की गाटर हो तो बेड को भूलकर भी इनके नीचे नहीं लगाना चाहिए बल्कि अलग हटकर ही सोने का स्थान बनाना चाहिए। 
+ बेडरूम में शयन करते समय किसी भी परिस्थिति में दक्षिण दिशा में पैर नहीं होने चाहिए। इसी प्रकार बेडरूम के मुख्य प्रवेश द्वार की और सिर या पैर करके शयन करना भी दोषपूर्ण माना गया है। पूर्व दिशा में पैर करके शयन करने से सुख समृद्धि तथा पश्चिम दिशा में पैर करके शयन करने से धार्मिक व आध्यात्मिक भावनाओं में वृद्धि होती है। 
+ बेडरूम में दर्पण लगी ड्रेसिंग टेबल सिर के सामने नहीं होनी चाहिए। अगर जगह की कमी हो तो शयन करने से पूर्व दर्पण को किसी वस्त्र या चादर से ढक देना चाहिए। 
+  बेडरूम में कभी भी झाडू, अँगीठी, तेल का भरा हुआ टिन, कढाही,चिमटा, जल से भरा बड़ा बर्तन, मछली घर, सामान रखने का टोकरा, नशीले पदार्थ, सफ़ेद या पीले रंग के संगमरमर से बनी कोई मूर्ति या वस्तु, पीपल, नीम या गूलर, गूलर के पत्ते या टहनी आदि अन्य अनुपयोगी सामान नहीं रखना चाहिए। 
+ बेडरूम में दीवार पर स्वस्थ, सुन्दर और हँसते हुए बच्चे का चित्र, राधा-कृष्ण का सयुंक्त चित्र, खिले हुए गुलाब के जोड़े का चित्र लगाया जाना शुभ होता है।  परन्तु सर्प, गिद्ध, उल्लू, बाज, कबूतर, कौआ, बगुला, चीता और युद्ध व राक्षसों के चित्र अथवा मूर्ति नहीं लगानी चाहिए। 
+ बेडरूम में रात्रि के समय जलाने के लिए लगाया जाने वाला बल्व सदैव उत्तर-पूर्व दिशा यानि ईशान कोण में ही लगाना चाहिए। शयन करते समय बेडरूम में पूर्ण अन्धकार रखना दोषपूर्ण होता है। प्रमोद कुमार अग्रवाल



Sunday, 10 November 2013

अक्षय नवमी के पूजन से नष्ट होते हैं महापाप

     कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को अक्षय नवमी के रूप में जाना जाता है। इसे आंवला नवमी तथा कुष्मांड नवमी भी कहा जाता है। इस दिन व्रत, पूजन, तर्पण और दान करने से मनुष्य के महापाप नष्ट हो जाते हैं। अक्षय नवमी पर प्रातः काल में सूर्योदय से पहले गंगा, यमुना आदि पवित्र नदी में स्नान करके आंवले के वृक्ष नीचे पूर्व दिशा की ओर मुख करके आंवले के वृक्ष का पूजन करने का विधान है। पूजन के लिए जल, अक्षत, रोली, बतासे, आंवला, गुड़, पुष्प, मिष्ठान आदि का प्रयोग किया जाता है। पूजन करते समय आंवले के वृक्ष की जड़ में दुग्ध मिश्रित जल चढ़ाकर शुद्ध घी का दीपक  जलाना चाहिए और वृक्ष के चारों ओर कपास का सूत लपेटते हुए एक सौ  आठ बार परिक्रमा लगानी चाहिए।
    अक्षय नवमी पर कही जाने वाली लोक कथा के अनुसार, एक साहूकार प्रत्येक वर्ष अक्षय नवमी वाले दिन आंवले के वृक्ष की पूजा करने के बाद उसके नीचे श्रद्धा भाव से ब्राह्मणों को भोजन कराता और उन्हें स्वर्ण दान करता। साहूकार के बेटों को यह सब करना नहीं सुहाता था तथा वे इसे फिजूलखर्ची मानते हुए साहूकार का विरोध करते थे।
     बेटों के इस व्यवहार से परेशान होकर एक दिन साहूकार घर से अलग हो गया और उसने एक दुकान लेकर उसके आगे आंवले का वृक्ष लगा दिया। साहूकार पहले की तरह आंवले के वृक्ष की सेवा करता और अक्षय नवमी आने पर उसकी पूजा-अर्चना करके ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान करता। जिससे उसका व्यापार जल्दी ही फलने-फूलने लगा और वह पहले से भी अधिक समृद्धशाली हो गया।
   उधर साहूकार के बेटों का व्यापार पूरी तरह ठप हो गया। जब उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ तो वे अपने पिता के पास आकर क्षमा मांगने लगे। साहूकार ने बेटों को क्षमा करते हुए उन्हें आंवला वृक्ष का पूजन करने को कहा। साहूकार की बात मानकर बेटों ने आंवला वृक्ष का पूजन कर दान करना  आरम्भ किया। जिसके प्रभाव से वे पहले की तरह सुखी और संपन्न हो गए। 
    अक्षय नवमी पर्व पर आंवले का पूजन करने के साथ-साथ पितरों को जल से तर्पण करना भी शुभ होता है। इस दिन ब्राह्मणों को आंवला, गुड़, गाय, स्वर्ण, वस्त्र, आभूषण, अनाज, चीनी, बतासे आदि का दान करने से ब्रह्म ह्त्या जैसे महापाप भी नष्ट हो जाते हैं तथा जीवन में सुख, समृद्धि, शांति एवं समस्त प्रकार से सुख प्राप्त हो -- प्रमोद कुमार अग्रवाल,फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार

Thursday, 7 November 2013

कार्तिक मास में आवश्यक हैं पांच आचरण

   देवताओं की आराधना के लिए कार्तिक मास को धार्मिक ग्रन्थों में अत्यन्त महत्वपूर्ण माना गया है। इस मास में श्रद्धालुओं के लिए पांच आचरणों का पालन करने पर जोर दिया जाता है। यह पांच आचरण हैं- दीप दान, पवित्र नदी में स्नान, तुलसी का पूजन, भूमि पर शयन, पवित्र आचरण बनाए रखना और दालों के सेवन से परहेज। कार्तिक मास में इन सभी आचरणों का नियम पूर्वक पालन करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होकर अपना शुभाशीष प्रदान करते हैं जिससे जीवन में आरोग्य, धन-सम्पदा, स्नेह, प्रेम, खुशहाली और अन्य लाभों की प्राप्ति होती है।
    कार्तिक मास में प्रथम पन्द्रह दिनों तक रात्रि में घोर अन्धकार रहता है। अन्धकार लक्ष्मी जी की कृपा मिलने में बाधक होता है, इसलिए इन दिनों घरों में अन्धकार नहीं रहने देना चाहिए तथा प्रतिदिन अन्धकार होते ही दीपक प्रज्वलित करना चाहिये। घर में प्रकाश बने रहने से बुरी आत्मायें अपना दुष्प्रभाव नहीं दिखातीं तथा लक्ष्मी जी के आशीर्वाद से घर में धन की कमी भी नहीं रहती। घरों के अलावा देव मन्दिर, सार्वजनिक मार्ग, गली, चौराहा, पीपल, तुलसी, आंवला आदि के पास भी दीपक प्रज्वलित करना चाहिए।
    कार्तिक मास में आरोग्य प्राप्ति और उसकी रक्षा के लिए प्रतिदिन सूर्योदय से पूर्व ही पवित्र नदी जैसे गंगा, यमुना, गोदावरी, कावेरी आदि में स्नान करने का विशेष महत्व बताया गया है। स्नान के बाद विधि पूर्वक भगवान विष्णु और लक्ष्मी की आराधना करनी चाहिए।
    कार्तिक मास भगवान विष्णु की पूजा के लिए समर्पित माना गया है। वे वृन्दा अर्थात तुलसी के हृदय में शालिग्राम के रुप में रहते हैं। इन दिनों प्रातः और साँय काल में तुलसी जी के समक्ष प्रतिदिन शुद्ध घी का दीपक जलाते हुए उनकी पूजा करनी चाहिए। भगवान को भोग लगाते समय भी उसमें तुलसी दल अवश्य डालना चाहिए। आयुर्वेद में तुलसी को बहुत से रोगों के उपचार के लिए रामवाण के समान माना गया है, इसलिए तुलसी का उपयोग किसी न किसी रुप में अवश्य करना चाहिए।
    कार्तिक मास को पवित्रता और धार्मिकता का पर्याय माना जाता है। इस मास की पवित्रता को बनाए रखते हुए अपने आचरण की शुद्धता पर खास ध्यान देना चाहिए। कोई भी ऐसा काम नहीं करना चाहिए जिससे किसी भी प्राणी को कष्ट हो।
     इस मास में शराब, नशीले पदार्थ, मांसाहार, प्याज, लहसुन तथा अन्य अखाद्य व तामसिक पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। आचरण की पवित्रता बने रहने से मन और बुद्धि के समस्त विकार दूर हो जाते हैं।
    प्राचीन काल में हमारे ऋषि मुनि रात्रि में स्वच्छ भूमि पर ही शयन करते थे क्योंकि इससे उनमें विलासिता की प्रवृत्ति उत्पन्न नहीं होने पाती थी। कार्तिक मास में अपने आप को विलासितापूर्ण जीवन से मुक्त बनाए रखने के लिए भूमि पर ही शयन करना चाहिए। शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए प्राकृतिक जीवन जीने को आवश्यक बताया गया है।
    कार्तिक मास मौसम परिवर्तन से भी जुड़ा है। इस मास में गरिष्ट और अधिक मिर्च-मसालेदार भोजन करने से परहेज करना ही हितकर है। इस मास में दालों के सेवन से बचना चाहिए बल्कि घीया, तोरई, परवल, गोभी, सेम, मटर, मूली, सिंघाडा, आंवला गन्ना, शकरकन्दी आदि का सेवन करना चाहिए।
    देखा जाए तो कार्तिक मास ही एक मात्र ऐसा मास है जिसमें एक दर्जन से भी अधिक त्यौहार होते हैं जैसे करवा चौथ, अहोई अष्टमी, तुलसी एकादशी, धनतेरस, नरक चतुर्दशी, लक्ष्मी पूजन, गोवर्धन पूजा, भाई  दूज, डाला छठ, अक्षय नवमी, देवठान एकादशी, तुलसी विवाह, कार्तिक पूर्णिमा। इस मास की महत्ता को ध्यान में रखते हुए इन त्योहारों को मनाना चाहिए और भगवान विष्णु से सर्व कल्याण की कामना करनी चाहिए।--प्रमोद कुमार अग्रवाल