Tuesday, 30 September 2014

शक्ति पीठ : मां विंध्यवासिनी
आदि शक्ति मां भगवती दुर्गा की उपासना के लिए देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी मंदिर बने हुए हैं। मां दुर्गा के विशेष पूजा स्थल भी हैं जिन्हें शक्ति पीठ कहा जाता है। धार्मिक ग्रंथो के अनुसार देवी सती के द्वारा अपने अपमान के प्रतिरोधस्वरूप स्वयं को पिता के अग्निहोम में भस्म किया गया था। उनके शरीर के अलग-अलग अंग जिन-जिन स्थानों पर गिरे, वे शक्ति पीठ के रूप में पूज्य हैं। मां दुर्गा के इक्यावन शक्ति पीठों का उल्लेख पुराणों में मिलता है। लेकिन देवी दुर्गा का एक शक्ति पीठ ऐसा भी है जहां माता सती का कोई अंग नहीं गिरा बल्कि इस स्थान को देवी भगवती ने अपने आवास के लिए चुना और जन्म के बाद यहां विराजमान हो गयीं।
उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर जिले से आठ किलोमीटर दूर गंगा नदी के किनारे विंध्याचल पर्वत पर मां विंध्यवासिनी देवी का मंदिर स्थित है।
धार्मिक ग्रंथो के अनुसार वासुदेव और देवकी के आठवीं संतान के रूप में श्री कृष्ण ने अपने मामा कंस के कारागार में जन्म लिया तो वहीँ नन्द और यशोदा के यहां महायोगिनी  योगमाया ने जन्म लिया। भगवान विष्णु के आदेश से कृष्ण को कंस के कारागार से निकालकर उनकी जगह योगमाया को पहुंचा दिया गया। अगले दिन जब कंस ने उस कन्या रूपी योगमाया को मारने का प्रयास किया तो वह कंस के हाथों से छूटकर कंस को यह चेतावनी दे गयी कि उसको मारने वाला जन्म ले चुका है और सुरक्षित है। योगमाया ने इसके बाद अपने लिए उस स्थान को रहने के लिया चुना, जहां आज विंध्यवासिनी मंदिर है। महायोगिनी महामाया के विंध्याचल पर्वत पर रहने के कारण उनका नाम विंध्यवासिनी देवी कहलाया।
विंध्याचल पर्वत पर देवी भगवती अपनी तीन शक्तियों महाकाली, महालक्ष्मी तथा महासरस्वती के रूप में त्रिकोण के तीन बिन्दुओं पर विराजमान हैं। महालक्ष्मी विंध्यवासिनी के रूप में पूर्व भाग में, महाकाली चामुण्डा देवी के नाम से दक्षिण भाग में और महासरस्वती अष्टभुजा देवी के रूप में पश्चिम दिशा में स्थित गुफा में विराजमान हैं। इस प्रकार विंध्यवासिनी सम्पूर्ण भारत में एक ऐसा शक्ति पीठ है जहां तीन देविओं का त्रिकोण है। इसलिए तीन देवियों का यह त्रिकोण तंत्र-मंत्र और देवी की विशेष उपासना के रूप में तीन महा शक्तियों का प्रतिनिधित्व करता है।
विंध्यवासिनी देवी का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्त्व है। यहां चैत्र और आश्विन नवरात्रों में पूर्ण विधि-विधान से देवी भगवती की उपासना की जाती है जिसमें देश-विदेशों से देवी भक्त शामिल होते हैं। कहते हैं देवी भगवती के यहां विराजमान होने के बाद शबर, बर्बर और पुलिंद नामक भक्त उनकी आराधना करते थे। विंध्यवासिनी मंदिर के बगल में स्थित सप्तशती भवन में श्रद्धालु दुर्गासप्तशती का पाठ करते हैं।
विंध्यवासिनी के अष्टभुजी रूप महासरस्वती भी यहां एक गुफा में विराजमान हैं। इस अवतार में उन्होंने शुम्भ तथा निशुम्भ नामक दैत्यों का मर्दन किया था। इसके अलावा विंध्यवासिनी में काली खोह के रूप में महाकाली भी विराजमान हैं। कहते हैं इस  रूप में देवी ने चामुण्डा का रूप धारण किया और रक्तबीज नामक दैत्य का समस्त रक्त पान करके देवताओं को  अत्याचार से मुक्ति दिलाई। रक्तबीज को यह वरदान प्राप्त था कि उसका रक्त बिन्दुओं के रूप में जितना पृथ्वी पर गिरेगा, उतनी संख्या में नए रक्तबीज पैदा हो जायेंगें। काली खोह के पृष्ठ भाग में स्थित भूत भैरव के मंदिर में प्रेत बाधा से पीड़ित लोग आते हैं और भूत भैरव के दर्शन करके प्रेत बाधा से मुक्ति पाते हैं।
आदि शक्ति मां भगवती के त्रिकोण स्वरुप के दर्शन और आराधना भक्तों के लिए विशेष फलदायी होती है।  जो भक्त विंध्यवासिनी की श्रद्धा और विश्वास के साथ आराधना करते हैं उन्हें  भगवती की कृपा से समस्त शुभ-लाभ प्राप्त होते हैं। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद , आगरा 

Friday, 28 March 2014

स्वास्थ्य और शक्ति के पोषण का पर्व है नवरात्र एवं रामनवमी

  चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा 31 मार्च, 2014से नवरात्र का शुभारम्भ हो रहा है। यह तिथि नवसंवत्सर के आरम्भ की तिथि भी है, जिसमें प्लवंग संवत्सर वर्ष भर रहेगा। इस संवत्सर के स्वामी सृष्टि के निर्माणकर्ता ब्रह्माजी हैं। नवरात्र नौ दिनों तक शक्ति की आराध्या माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना से जुड़ा एक धार्मिक और आध्यात्मिक महत्त्व रखने वाला पर्व है , जिसे चैत्र नवरात्र के रूप में भी जाना जाता है। नवरात्र के अंतिम  और नौवें दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम की भी आराधना की जाती है। भगवान श्री राम ने लंका पर विजय प्राप्त करने से पूर्व भगवान् शिव और माँ भगवती की आराधना करके उनसे आंतरिक शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना की थी।
   नवरात्र पर्व धार्मिक आस्था एवं विश्वास से जुड़ा पर्व तो है ही, साथ ही इस पर्व का हमारे स्वास्थ्य और पवित्रता से भी विशेष सम्बन्ध है। क्योंकि इस पर्व को मनाने वाले श्रद्धालु अपनी शारीरिक और मानसिक शक्ति के अनुरूप नवरात्र में व्रत उपवास करते हुए पूर्ण श्रद्धा, विश्वास और पवित्र भावना के साथ मन की चंचलता को नियंत्रित करते हैं तथा संयमित जीवन व्यतीत करते हैं। नवरात्र में माँ भगवती के समक्ष अग्नि प्रज्वलित करके शुद्ध घी, समिधा, कपूर, लौंग, गूगल आदि पवित्र वस्तुओं को उसमें समर्पित करने से हमारे आस-पास का वातावरण शुद्ध और पवित्र होता है। जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से हमारे स्वास्थ्य को बनाये रखने में सहायक सिद्ध होता है।
   नवरात्र पर्व में देवी जी की पूजा के दौरान पूर्ण श्रद्धा और विधि-विधान से जिन मंत्रों का पाठ किया जाता है वे भी हमारे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के पोषक होते हैं। इन मन्त्रों के प्रभाव से मन के समस्त विकार दूर होने लगते हैं जिससे हमारे शरीर में  आश्चर्यजनक सकारात्मक परिणाम देखने को मिलते हैं। होली पर्व के समापन के बाद और चैत्र मास के आरम्भ के साथ ही मौसम में बदलाव आने लगता है जो हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करता है।  परन्तु नवरात्र में पूजा-अर्चना, व्रत-उपवास, सयंमित जीवनचर्या और शुद्ध आचरण के प्रभाव से बदलते मौसम का प्रतिकूल असर शरीर पर नहीं होने पाता। वर्ष भर अच्छे स्वास्थ्य के लिए चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को सात नीम की कोपलें, सात तुलसी दल और सात नग कालीमिर्च का सेवन करना शुभ प्रभावकारी माना गया है।
    नवरात्र में माँ भगवती और भगवान श्री राम की उपासना हेतु श्री दुर्गा सप्तशती, राम चरित मानस और नवान्ह पारायण के पाठ का विधान है।  दुर्गा शप्तशती में दिए गए मन्त्रों का ध्यानपूर्वक तथा पूर्ण श्रद्धा और विश्वास से पाठ करने से तन और मन दोनों ही स्वस्थ बने रहते हैं। इसी प्रकार श्री राम चरित मानस में भी बहुत सी ऐसी चौपाईयाँ हैं जिनके नियमित पाठ से समस्त मनोरथ पूर्ण होते हैं तथा विद्या, धन, संपत्ति, सफलता और आरोग्य सुख प्राप्त होते हैं। दुर्गा सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय के 29 वें श्लोक में कहा गया है -      " रोगानशेषानपहंसी तुष्टा रुष्टा तु कामान सकलानमिष्टान्।
 त्वामाश्रीतानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयांति।।"
अर्थात देवी तुम प्रसन्न होने पर सभी रोगों को नष्ट कर देती हो तथा कुपित होने पर मनोवांछित सभी कामनाओं का नाश कर देती हो। जो लोग तुम्हारी शरण में जा चुके हैं, उनपर विपत्ति  नहीं आती।  तुम्हारी शरण में जाए हुए मनुष्य दूसरों की शरण देने वाले हो जाते हैं।
    परम गोपनीय पवित्र तथा सम्पूर्ण प्राणियों का उपकार करने वाले देवी के कवच का पाठ करने से मनुष्य समस्त ऐश्वर्य, विजय, धन सम्पदा और चेचक, कुष्ठ एवं विष जनित रोगों के प्रभाव से मुक्त हो जाता है। दुर्गा शप्तशती में कीलकम् के पाठ से आरोग्य सुख मिलता है। वहीँ दुर्गा शप्तशती का सम्पूर्ण पाठ करने से भयंकर से भयंकर रोग, ग्रह बाधाएं, बुरे स्वप्न से होने वाली पीड़ाएं, धनाभाव, कष्ट, शत्रु बाधा आदि नष्ट हो जाते हैं और बुद्धि का कल्याण होने के साथ ही अंतःकरण की शुद्धि होती है।--- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद् 
  
 

Friday, 28 February 2014

तुलसी लगाने से मिलती है समृद्धि

    भारतीय धर्म एवं संस्कृति में बहुत से पेड़-पौधों को पूजनीय मानते हुए उन्हें लगाकर उनका संरक्षण करना अनिवार्य बताया गया है। इनमें तुलसी, पीपल, आंवला, बरगद, अशोक, आम, बेल, आदि प्रमुख हैं। यद्यपि इन पौधों का सीधा संबंध हमारे पर्यावरण के संरक्षण से है फिर भी अनेक धार्मिक और मांगलिक कार्यों में इनका उपयोग किया जाता है। तुलसी एकमात्र ऐसा पौधा है जो आसानी से कहीं भी लगाया जा सकता है। इसके लिए ज्यादा जगह की भी आवश्यकता नहीं होती है। भगवान विष्णु को तुलसी बहुत प्रिय हैं। प्रसाद के साथ तुलसी दल का प्रयोग अधिक शुभ फलदायी माना गया है। कहते हैं कि जिस घर में तुलसी का पौधा बिना किसी विशेष श्रम के वृद्धि करता है, वहाँ सुख, समृद्धि, शांति और संपन्नता बनी रहती है तथा अगर भवन में किसी प्रकार का वास्तु दोष है तो वह भी दूर हो जाता है।
    तुलसी में त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश के साथ-साथ  त्रिदेवी महालक्ष्मी, महाकाली तथा सरस्वती का वास होता है। नारद पुराण में कहा गया है कि तुलसी के पौधे पर जल अर्पित करने वाला, तुलसी के पौधे के मूल भाग की मिट्टी का तिलक लगाने वाला, तुलसी के चारों ओर कांटों का आवरण या चहारदीवारी बनवाने वाला और तुलसी के कोमल दलों से भगवान विष्णु के चरण कमलों की पूजा करने वाला मनुष्य जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त होकर विष्णु लोक को प्राप्त होता है। ब्राह्मणों को कोमल तुलसी दल अर्पित करने वाले मनुष्य को तीन पीढ़ियों के साथ ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है इसलिए तुलसी लगाते समय पवित्रता का ध्यान अवश्य रखा जाना चाहिए। अपवित्र अथवा दूषित स्थान पर तुलसी लगाने से दोष होता है। तुलसी के पौधे को कभी भी झूठे एवं गंदे हाथों से स्पर्श नहीं करना चाहिए।
    घर में तुलसी का पौधा सदैव पूर्व अथवा उत्तर दिशा में ही लगाना चाहिए। वास्तु शास्त्र के अनुसार दक्षिण दिशा में तुलसी लगाना दोषपूर्ण है। तुलसी में जो भी खाद और पानी दिया जाए वह शुद्ध एवं पवित्र हो। तुलसी के पौधे से तुलसी दल लेते समय जूते या चप्पल न पहनें तथा मन में शुद्ध भाव रखते हुए तुलसी को हाथ जोड़कर प्रणाम करके ही तुलसी दल तोड़ें। परंतु सूर्य देवता के अस्त होने के बाद, घर में किसी का जन्म या मृत्यु होने पर सूतक के दौरान, संक्रांति, अमावस्या, द्वादशी और रविवार के दिन तुलसी दल नहीं लेना चाहिए।
    घर में लगी हुई तुलसी पर नियमित रूप से जल अर्पित करने तथा    प्रातः एवं सायं शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करने से सभी कष्ट एवं समस्याओं का निवारण होता है तथा घर-परिवार में सुख, समृद्धि और स्नेह-प्रेम में वृद्धि होती है। --प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद्

Monday, 3 February 2014

सौंदर्य और मादकता का प्रतीक है वसंत उत्सव

   माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि का दिन ऋतुराज वसंत के आगमन के प्रथम दिवस के रूप में जाना जाता है। वसंत समस्त ऋतुओं का राजा है क्योंकि इन दिनों प्रकृति का अनुपम सौंदर्य देखते ही बनता है। बाग-बग़ीचों में पक्षिओं का कलरव, महकते-इठलाते रंग-बिरंगे पुष्पों पर भौंरों का गुंजन और वायुमंडल में अजीब सी मादकता का अनोखा अहसास- समस्त प्राणियों को प्रफुल्लित और मंत्रमुग्ध कर देता है।  वसंत ऋतु की यही मादकता जीव-जंतुओं में प्रेमालाप के रूप में नजर आने लगती है। इन दिनों कामदेव और रति की पूजा-अर्चना की जाती है जिससे कि दाम्पत्य जीवन में सुख और प्रेम का प्रादुर्भाव जीवन भर बना रहे। परन्तु "काम" को जीवन की अनिवार्यता मानने वालों के लिए यह पर्व चेतावनी भी देता है कि सौन्दर्यता के बाद पतझड़ भी आता है।  इसलिए जीवन में काम का उद्देश्य संतानोत्पत्ति तक ही सीमित रहे तो ही श्रेष्ट है। अन्यथा काम की अति जीवन के शीघ्र अंत की वजह बन सकती है।
    कहा जाता है कि वसंत ऋतू में भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण जी प्रत्यक्ष रूप से धरती पर प्रकट होते हैं और ब्रज में राधा और सखियों के साथ लीलाएं करते हैं।  इसीलिये सम्पूर्ण ब्रज में वसंत को एक उत्सव के रूप में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। वसंत पंचमी के दिन भगवान विष्णु के साथ-साथ ज्ञान की देवी सरस्वती, विघ्नहर्ता गणेश, महादेव और सूर्यदेव आदि की आराधना की जाती है।  इस दिन पीले रंग के वस्त्र पहने जाते हैं तथा भगवान की पूजा में भी पीले रंग के पुष्प, पीले रंग का चंदन और पीले रंग का प्रसाद चढ़ाया जाता है।
   सिख धर्म के पवित्र गुरुग्रंथ साहब की वाणी में 31 शास्त्रीय रागों का प्रयोग हुआ है। इन्हीं रागों में से एक राग है राग वसंत। इन दिनों गुरुद्वारों में राग वसंत का मनोहारी कीर्तन श्रद्धालुओं के दिलों में भक्ति, स्नेह, प्रेम और श्रद्धा भाव जागृत कर देता है। वसंत पंचमी एक उत्सव मात्र ही नहीं है बल्कि शुरुआत है रंगों के पर्व होली की। ब्रज क्षेत्र में इस दिन चौराहों पर होलिका दहन हेतु लकड़ियों का एकत्रीकरण करते हुए फाग उड़ाना आरंभ हो जाता है जो पूरे एक माह फाल्गुन मास की पूर्णिमा तक चलता है।
   वसंत पंचमी का पर्व कृषक जगत से भी जुड़ा है।  इस दिन किसान भाई खेतों से उत्पन्न नए अनाज को गुड और शुद्ध घी के साथ मिश्रित करके अग्नि देव और पितृ देवों  को अर्पित करते हैं तथा आने वाले वर्षों में अधिक से अधिक फसल उत्पादन होने की कामना करते हैं।
   आनंद, प्रसन्नता, सुख, समृद्धि और अध्यात्म भावनाओं से जुड़ा वसंत पंचमी का पावन पर्व हमारे जीवन में त्याग और नवसृजन का समावेश करता है। वसंतोत्सव को सौंदर्य और कामोन्माद का पर्याय न मानते हुए आत्म जागृति एवं आत्म प्रेरणा प्रदान करने वाला पर्व माना चाहिए।  यह पर्व प्रकृति के करीब रहकर प्रकृति से समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए सीख लेकर समर्पित रहने की प्रेरणा देता है। -- ज्योतिषविद् प्रमोद कुमार अग्रवाल,

Thursday, 30 January 2014

शुद्ध आहार का सेवन भी उपासना है

  शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए आहार का सेवन किया जाता है। धार्मिक दृष्टि से आहार शुद्ध और पवित्र होना आवश्यक है। उपनिषदों में कहा गया है कि "जैसा अन्न वैसा मन" अर्थात हम जैसा भोजन करते हैं, उसी के अनुसार हमारा मानसिक विकास होता है। मन की शुद्धता के लिए भोजन का शुद्ध और पवित्र होना अनिवार्य माना गया है।
    शुद्ध एवं उचित आहार भगवान की उपासना का एक अंग है। भोजन करते समय किसी भी अपवित्र खाद्य पदार्थ का ग्रहण करना निषिद्ध है। यही कारण है कि भोजन करने से पूर्व भगवान को भोग लगाने का विधान है जिससे कि हम केवल शुद्ध और उचित आहार ही ग्रहण करें।
    श्रीमद्भगवद् गीता के सत्रहवें अध्याय में भोजन के तीन प्रकारों, सात्विक, राजसिक एवं तामसिक का उल्लेख मिलता है। सात्विक आहार शरीर के लिए लाभकारी होते हैं और आयु, गुण, बल, आरोग्य तथा सुख की वृद्धि करते हैं। इस प्रकार के आहार में गौ घृत, गौ दुग्ध, मक्खन, बादाम, काजू, किशमिश आदि मुख्य हैं। राजसिक भोजन कड़वे, खट्टे, नमकीन, गरम, तीखे व रूखे होते हैं। इनके सेवन से शरीर में दुःख, शोक, रोग आदि उत्पन्न होने लगते हैं। इमली, अमचूर, नीबू, छाछ, लाल मिर्च, राई जैसे आहार राजसिक प्रकृति के माने गए हैं।
    तामसिक भोजन किसी भी दृष्टि से शरीर के लिए लाभकारी नहीं होते। बासी, सड़े-गले, दुर्गंधयुक्त, झूठे, अपवित्र और त्याज्य आहार तामस भोजन के अंतर्गत माने जाते हैं। मांस, अंडा, मछली, मदिरा, प्याज, लहसुन आदि आहार तामसिक होते हैं। इनके सेवन से मनुष्य की बुद्धि पर नकारात्मक असर पड़ता है। श्रीमद्भगवद् गीता के अनुसार सात्विक भोजन करने वाला दैवी संपत्ति का स्वामी होता है जबकि राजसिक और तामसिक भोजन करने वाला आसुरी संपत्ति का मालिक होता है।
     वास्तु शास्त्र के अनुसार भोजन सदैव पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करते हुए ही करना चाहिए।  चूँकि दक्षिण दिशा यम की दिशा होती है इसलिए इस दिशा की ओर मुख करके भोजन करना दोषपूर्ण है, इससे किया गया भोजन तन और मन दोनों को दूषित करता है तथा शक्ति का क्षय करता है।
     अथर्ववेद के अनुसार भोजन हमेशा भगवान को अर्पित करने के बाद ही करना चाहिए। भोजन करने से पूर्व हाथ व पैरों को स्वच्छ जल से अवश्य धो लेना चाहिए। भोजन करते समय मन को प्रसन्न और शांत रखना उचित माना जाता है। भोजन करने के दौरान क्रोध, लोभ, मोह तथा काम का चिंतन करने से किया गया भोजन शरीर को लाभ के बजाय नुक्सान ही पहुंचाता है।
    भोजन करने से पूर्व गौ ग्रास निकालने, भूखे व्यक्ति के आ जाने पर उसे भोजन कराने, अन्न का दान करने, जीव-जंतुओं को दाना-पानी देने और भोजन के समय भगवान का चिंतन करने एवं उनका नाम जपते हुए संतुष्ट भाव से भोजन करने से भगवान प्रसन्न होते हैं तथा ग्रह दोषों का शमन होता है।  --- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद्, आगरा 

Tuesday, 14 January 2014

प्रमोद अग्रवाल वास्तु विज्ञानविद् एवं मानव अधिकार समाज भूषण से सम्मानित

    भारतीय वैदिक ज्योतिष संस्थानम्, वाराणसी के सचिव डॉक्टर पुरुषोत्तम दास गुप्ता द्वारा वास्तु विज्ञान प्रशिक्षण शिविर में सहभागिता एवं प्रशिक्षण प्राप्त करने पर कमला नगर आगरा निवासी ज्योतिषविद् प्रमोद  अग्रवाल को "वास्तु विज्ञानविद्" की उपाधि प्रदान कर सम्मानित किया गया है।  
     वहीं अंतर्राष्ट्रीय अकाडमी फॉर एस्ट्रोलॉजी, वास्तु, तंत्र-मन्त्र-यंत्र, अध्यात्म तथा गूढ़ शास्त्र रिसर्च सेंटर, पुणे के उपाध्यक्ष डॉक्टर विजय कुमार दाणी ने भी गत दिवस जबलपुर मध्य प्रदेश में संपन्न हुए एक समारोह में रचनात्मक कार्य और बहुमुखी प्रतिभा के लिए प्रमोद अग्रवाल को "मानव अधिकार भूषण" से सम्मानित किया है। 
     ज्योतिष विद्या विशारद में वाराणसी से  उपाधि प्राप्त प्रमोद अग्रवाल को इससे पूर्व भी "ज्योतिष दिग्विजयी" और "ज्योतिष कौमुदी" सम्मान से नवाजा जा चुका है। ज्योतिषविद् प्रमोद अग्रवाल धर्म, अध्यात्म, ज्योतिष और वास्तु से जुड़े विभिन्न विषयों पर नियमित रूप से लेखन कर रहे हैं। 

पतंग और तिल गुड़ का त्यौहार है मकर संक्रांति

  जिस प्रकार हिंदू धर्म एवं संस्कृति में एक मास को शुक्ल पक्ष तथा कृष्ण पक्ष में विभाजित किया गया है, उसी प्रकार एक वर्ष को भी दो अयनों - उत्तरायण और दक्षिणायन में विभाजित किया गया है। उत्तरायण काल में सौर मंडल का सबसे सशक्त ग्रह सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा करने की दिशा में परिवर्तन करते हुए थोड़ा उत्तर दिशा की और ढलता जाता है। जबकि दक्षिणायन में सूर्य पूर्व से थोड़ा दक्षिण को गमन करता है। सूर्य का उत्तरायण होना शुभ माना गया है। मकर संक्रांति का त्यौहार सूर्य की गति पर आधारित है। पौष मास में जब सूर्य धनु राशि को छोड़ कर मकर राशि पर आता है तब इस संक्रांति को मनाते हैं।
     पौराणिक मान्यता के अनुसार इस दिन सूर्य देवता अपने पुत्र शनि से मिलने उनके घर स्वयं जाते हैं। शनि को मकर राशि का स्वामी ग्रह माना जाता है, इसलिए यह दिन मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। इसी दिन महाभारत काल के वीर प्रतापी योद्धा भीष्म पितामह ने अपने शरीर का त्याग किया और इसी दिन पवित्र गंगा नदी का धरती पर अवतरण होना माना जाता है।
    धार्मिक दृष्टि से मकर संक्रांति अत्यंत महत्वपूर्ण त्यौहार है। चूंकि मकर संक्रांति खगोलीय घटना से जुड़ा है इसलिए इस त्यौहार से जड़ तथा चेतन वस्तुओं की दशा एवं दिशा का निर्धारण होता है। यह त्यौहार तन और मन में प्रसन्नता, उमंग और शांति का संचार करके मनुष्य को पुनर्जन्म के चक्र से अवमुक्त कर देता है। श्रीमद्भगवद्गीता में स्वयं भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि उत्तरायण काल में जब सूर्य देव की कृपा से पृथ्वी विशेष प्रकाशमयी रहती है, तब मनुष्य शरीर का परित्याग होने से उसको पुनर्जन्म नहीं लेना पड़ता।
    मकर संक्रांति का त्यौहार पूरे देश में मनाया जाता है, परन्तु इसके नाम और स्वरुप अलग-अलग हैं। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल राज्यों में यह त्यौहार संक्रांति के नाम से तो तमिलनाडु राज्य में पोंगल के नाम से प्रसिद्ध है। पतंग और तिल गुड़ से जुड़े मकर संक्रांति के त्यौहार पर आसमान तरह-तरह की रंग-बिरंगी पतंगों से आच्छादित हो जाता है।
    मकर संक्रांति पर गंगा जैसी पवित्र नदियों में अथवा घर पर ही तिल मिश्रित जल से स्नान करना, शरीर पर तिल के तेल की मालिश करना, तिल युक्त हवन सामग्री से हवन करना, दाल-चावल की खिचड़ी, तिल और गुड़ या चीनी से बनी गजक अथवा मिष्ठान, गर्म वस्त्र, कंबल, रजाई एवं घरेलू उपयोग की वस्तुओं आदि का दान और सेवन करना शुभ माना जाता है।
    महाराष्ट्र में इस दिन विवाहित महिलाओं के हल्दी या रोली का तिलक लगाकर तिल व गुड़ से बने व्यंजन तथा श्रद्धानुसार उपहार देकर त्यौहार का आनंद लिया जाता है। कहते हैं कि मकर संक्रांति पर किये जाने वाले दान के शुभ प्रभाव से सूर्य, शनि और दूसरे दोषपूर्ण ग्रहों का कोई दुष्प्रभाव मनुष्य पर नहीं पड़ता और जीवन में सुख, समृद्धि, शान्ति एवं संतान सुख प्राप्त होते हैं।-ज्योतिषविद् प्रमोद कुमार अग्रवाल

Wednesday, 1 January 2014

ग्रह बाधा में करें उपाय

++ अगर बनते हुए कार्यों में बिना वजह बाधा आ रही हो तो शुक्ल पक्ष के किसी भी मंगलवार से सुन्दर काण्ड का पाठ प्रारम्भ करके प्रतिदिन एक बार लगातार एक सौ आठ दिन तक पाठ करने से बाधा दूर होकर कार्य बनने लगते हैं। 
++ शनि की साढ़े साती परेशान कर रही हो तो कष्ट शमन के लिए शनि ग्रह से सम्बंधित मन्त्रों का जप करने के साथ-साथ शनि की वस्तुओं का दान करना चाहिए। 
++  सूर्य ग्रह के दोषपूर्ण होने से ह्रदय रोग की सम्भावना रहती है। इससे बचाव के लिए श्री आदित्य ह्रदय स्त्रोत का पाठ प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक करना चाहिए। इस पाठ के करने से धन लाभ, प्रसन्नता, पदोन्नति तथा अन्य शुभ फल भी मिलते हैं। 
++ जीवन यापन के लिए पर्याप्त आय के साधन होने के बावजूद अगर लिया गया ऋण चुकता नहीं हो पा रहा है तो शुक्ल पक्ष के मंगलवार से व्रत रखते हुए ऋण मोचक मंगल स्त्रोत का पाठ करना चाहिए। व्रत में नमक का सेवन न करें। 
++ यदि जीवन में लगातार दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ रहा हो तो प्रतिदिन महामृत्यंजय मन्त्र, विष्णुसहस्त्रनाम, राम रक्षा कवच और शक्ति कवच का जप करते हुए पशु-पक्षियों व मछली को दाना डालना चाहिए।
++ संतान प्राप्ति में बाधा आ रही हो तो अन्य उपायों के अलावा गौ पालन अथवा गौ सेवा करना शुभ होता है। गौ सेवा करने से जहां शुक्र ग्रह के अशुभ प्रभाव दूर होते हैं वहीं प्रत्येक बुधवार को गौ माता को हरा चारा खिलाने से बुध ग्रह के दोषों का शमन होता है।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिष विद्या विशारद (फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार)