Monday, 9 November 2015

सुख संपदा और धन लाभ के लिये करे लक्ष्मी पूजन

    भारतीय धर्म और संस्कृति में महादेवी लक्ष्मी की आराधना को विशेष महत्व दिया गया है.  कमला, रमा, पद्मा, पदमवासा, विष्णुप्रिया आदि नामो से लोकप्रिय लक्ष्मी जी को सुख, संपदा और धन प्रदान करने वाली माना गया है. कमल पुष्प पर आसीन देवी लक्ष्मी के दो हाथो में कमल सुशोभित हैं, वही बाये हाथ से वो धन वर्षा करती हे तो दाहिने हाथ से अपने भक्तो को शुभ आशीर्वाद प्रदान करती हैं. आगम ग्रंथ में लक्ष्मी जी को दो भुजा वाली दर्शाते हुए स्वर्णिम आभा वाले कमल पुष्प पर विराजमान होना बताया गया है. देवी लक्ष्मी के दोनो नेत्र कमल के समान  हैं तथा दोनो कानो में मकर की आकृति के रत्न जडित कुंडल सुशोभित  हैं.
     कुछ प्राचीन धार्मिक ग्रन्थो के अनुसार चार भुजा वाली लक्ष्मी जी के हाथो में श्रीफल,पद्म, अमृतघट और शंख सुशोभित रहते  हैं. देवी लक्ष्मी के अलग-अलग स्वरूप होते हुये भी ज्योति पर्व दीपावली पर विधि-विधान से श्रद्धा पूर्वक उनका पूजन विशेष फलदायी माना गया है. वैसे शुक्रवार का दिन भी लक्ष्मी जी की आराधना से जुडा है क्योकि इस दिन खीर और नारियल का प्रसाद लगाकर लक्ष्मी जी की आराधना करने से जीवन मे सुख, शांति और धन लाभ मिलने लगते  हैं. 
     ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शुक्र ग्रह की अशुभता होने पर जीवन में धन की कमी, शारीरिक व मानसिक कष्ट, भोग-विलास के प्रति रुझान, तरह-तरह के रोग जैसी बहुत सी समस्याओं का सामना करना पडता है. देवी लक्ष्मी जी की पूजा-अर्चना से शुक्र ग्रह के दोषो का शमन होने लगता है. इसके अलावा जरुरतमंदो, विधवा महिलाओं, बालिकाओं की मदद करने, शुक्रवार के दिन घी, कपूर, मोती, दूध, दही, खीर, नारियल, श्वेत पुष्प, चावल, मिश्री, हीरा, चांदी, श्वेत चंदन श्वेत वस्त्र, धन  आदि के दान से भी लक्ष्मी जी की कृपा प्राप्त होती है.
     जिन राशि के स्वामी ग्रह सातोगुण प्रधान होते  हैं, उन राशि के जातको को लक्ष्मी जी की आराधना से आशातीत लाभ मिलने लगता है. कर्क, सिंह, धनु तथा मीन राशि के स्वामी ग्रह क्रमशः चन्द्रमा, सूर्य और गुरु सतोगुणी प्रवृत्ति वाले माने गये  हैं, जबकि राहु को प्राकृतिक ग्रह की संज्ञा दी गयी है. राहु की अपनी कोई राशि न होने से यह जिस राशि या भाव में होता है उसी के अनुसार फल प्रदान करता है. लग्न कुंडली के छठे भाव में राहु तथा केंद्र में गुरु स्थित होने पर अष्टलक्ष्मी योग बनता है. इस योग के प्रभाव से राहु पाप ग्रह का स्वभाव त्यागकर गुरु ग्रह के प्रभाव से जातक के जीवन में शान्ति, सम्मान, धन लाभ, सुख, धार्मिक भावना आदि की वृद्धि करता है. 
     वास्तु शास्त्र के अनुसार धन की देवी लक्ष्मी और दूसरे समस्त देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना के लिये भवन का ईशान कोण अर्थात उत्तर-पूर्व दिशा को शुभ माना गया है. इसी प्रकार धन रखने वाली तिजोरी या आलमारी को दक्षिण दिशा में रखा जाता है, परंतु इसका दरवाजा उत्तर दिशा में खुलना चाहिये. वास्तु नियम यह भी है कि धन रखने की तिजोरी को कभी भी शयन कक्ष में नही रखना चाहिये वरना लक्ष्मी जी रूठ जाती हैं. 
     महादेवी लक्ष्मी जी की उपासना के लिये दीपावली के दिन को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है. कहते  हैं कि दीपावली के दिन शुभ मुहूर्त में पूर्ण श्रद्धा और विधि-विधान के साथ घर, दुकान, कार्य स्थल, औद्योगिक प्रतिष्ठान आदि में पूजा-अर्चना करने से लक्ष्मी जी कृपा होती है तथा जीवन में किसी चीज का कोई अभाव नही रहता है. लक्ष्मी जी के पूजन के समय बुद्धि प्रदाता भगवान गणेश, ज्ञानप्रदायिनी देवी सरस्वती और अंजनी नंदन हनुमान जी की आराधना भी करनी चाहिये, इससे ज्ञान, सुबुद्धि, विवेक, धन, संपदा, सुख, शान्ति और समस्त तरह के लाभो की प्राप्ति होती है. 
     दीपावली की संपूर्ण रात्रि महादेवी लक्ष्मी जी की मानी जाती है. इस रात्रि में तन्त्र-मन्त्र की सिद्धी की जाती है. रात्रि जागरण  करते हुए लक्ष्मी जी से धन-धान्य एवं सुख की कामना भी की जाती है. ऐसा कहा जाता है कि दीपावली की मध्य रात्रि में देवी लक्ष्मी स्वयं धरती लोक में उतरकर आती  हैं और घर-घर जाकर भ्रमण करती  हैं. जिस घर में उन्हे अपने प्रति सम्मान, श्रद्धा भाव और पवित्रता दिखायी देती है, उस घर को वह अपने शुभ आशीर्वाद रूपी भंडार से भर देती हैं.  
    दीपावली के दिन पूजा-अर्चना के उपरांत पूर्व में सिद्ध किये गये मन्त्र  "श्री शुक्ले महाशुक्ले कमल दल निवासे श्रीमहालक्ष्मी नमो नमः. लक्ष्मी माई सबकी सवाई आवो चेतो करो भलाई, ना करो तो सात समुद्रो की दुहाई." का एक सौ आठ मोती की माला के साथ इक्कीस बार जप एक ही बैठक में करना चाहिये.
जीवन में आर्थिक उन्नति के लिये " ओम नमो पद्मावती लक्ष्मी दायिनीवाञ्छा भूत प्रेत विन्ध्यवासिनी सर्वशत्रु संहारिणी दुर्जन मोहिनी रिद्धी सिद्धी वृद्धी कुरु कुरु स्वाहा. ओम क्लीं श्रीं पद्मावत्ये नमः" मन्त्र का जप दीपावली की रात्रि में करना चाहिये. शीघ्र लाभ के लिये प्रतिदिन एक माला फेरना आवश्यक है. शुद्ध चित्त भाव, सात्विक जीवन शैली और पूर्ण श्रद्धा और विश्वास बनाये रखते हुए दीपावली पर महादेवी लक्ष्मी जी की आराधना जीवन में सदैव मंगलकारी होती है. -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद, आगरा  

Monday, 26 October 2015

चंद्र और लक्ष्मी की आराधना का पर्व है शरद पूर्णिमा

आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णमासी शरद पूर्णिमा के नाम से जानी जाती है। माना जाता है कि पूरे वर्ष में केवल इसी दिन चंद्रदेव अपनी सोलह कलाओं का प्रदर्शन करते हैं। शरद पूर्णिमा को कई स्थानों पर कोजागरी व्रत के नाम से भी पुकारा जाता है क्योंकि इस दिन विधि-विधान से व्रत करके माता लक्ष्मी और चंद्रदेव को प्रसन्न किया जाता है जिससे अनेक साधन और सिद्धियों की प्राप्ति होती है।
महालक्ष्मी की करें आराधना 
शरद पूर्णिमा के माहात्म्य के संबंध में पुराणों में वर्णित है कि इस रात्रि को धन व समृद्धि की अधिष्टात्री देवी महालक्ष्मी पृथ्वीलोक पर आती हैं और रात्रि जागरण कर भगवान नारायण एवं महालक्ष्मी की पूजा करने वाले भक्तों को धन और सुख-समृद्धि प्रदान करती हैं।
निशीथे वरदा लक्ष्मी कोजागर्तीति भाषिणी। 
जगती भ्रमते तस्याम लोकचेष्टावलोकिनी। . 
तस्मै वित्तं प्रयच्छामि यो जागर्ति महीतले। 
श्री कृष्ण की करें आराधना
श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार शरद पूर्णिमा की शांत एवं श्वेत रात्रि में भगवान श्री कृष्ण ने वृन्दावन में महारास का आयोजन किया था। इसलिए इस रात्रि को जागरण करते हुए भगवान श्री कृष्ण की आराधना करने से उनकी असीम कृपा प्राप्त होती है। इसलिए शरद पूर्णिमा को रास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है।
चंद्रदेव का जपें मंत्र
नव ग्रहों में चंद्र को समस्त नक्षत्रों का स्वामी माना गया है। इसलिए  शरद पूर्णिमा की रात्रि में ग्रह शान्ति के उद्देश्य से  सभी राशि के जातकों को श्वेत वस्त्र, अक्षत, चन्दन, धूप, डीप, श्वेत पुष्प, सुपारी आदि से चंद्रदेव का पूजन करते हुए गाय के दूध और चावल से बनी खीर का प्रसाद लगाना चाहिए। कहा जाता है कि चंद्रमा की धवल रोशनी में रखी गयी खीर पर चंद्रदेव अपनी शीतल रश्मियों का अमृत बरसाकर उसे औषधिमय बना देते  जिसके सेवन से शरीर व्याधिमुक्त बना रहता है। चंद्रदेव को प्रसन्न करने के लिए शरद पूर्णिमा की रात्रि में ॐ सोम सोमाय नमः मंत्र का ग्यारह हजार बार जप करना शुभ होता है।
इसके अलावा शरद पूर्णिमा की सायंकाल में शुद्ध घी के ग्यारह दीपक जलाकर उन्हें मंदिर, तुलसी के पौधे और पीपल के वृक्ष की जड़ की पास रखते हैं। शरद पूर्णिमा के दिन श्रीसूक्त, पुरुषसूक्त, लक्ष्मीस्तवं और कनकधारा स्तोत्र का पाठ भी किया जाता है तथा कमलगट्टा, सुपारी, पंचमेवा एवं बेल के फल से ॐ ह्रीं श्री दारिद्र्यनाशिन्ये नारायणप्रियवल्लभायै भगवत्यै महालक्ष्यै स्वाहः मंत्र का जप करते हुए एक सौ आठ आहुति देकर हवन भी किया जाता है।
कार्तिक स्नान और मास की शुरुआत
शरद पूर्णिमा के साथ ही आश्विन मास का अवसान होता है और अगले ही दिन से पवित्र कार्तिक मास की शुरुआत हो जाती है। इसलिए शरद पूर्णिमा के दिन से ही पवित्र नदियों में स्नान करके कार्तिक मास के लिए व्रत और स्नान का आरंभ हो जाता है। कार्तिक मास में महिलाएं अपने और परिवार के कल्याण के लिए प्रतिदिन तांबे के बर्तन में जल भरकर गाय के दाहिने सींग को सींचती हैं और उसी जल से अभिषेक करने के बाद गाय को हरा चारा एवं अनाज आदि खिलाती हैं। कार्तिक मास में तुलसी, आंवला, और कदली वृक्षों का पूजन करके भगवान विष्णु तथा विष्णुप्रिया लक्ष्मी जी को प्रसन्न किया।  विष्णु पुराण के अनुसार कार्तिक मास में किये गए पूजा, दान-धर्म और व्रत-उपवास से पुण्य लाभ मिलता है तथा मृत्यु के बाद विष्णुलोक की प्राप्ति होती है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद, आगरा 

Monday, 19 October 2015

शुभ कार्यों के लिए शुभ दशहरा

देश के प्रमुख त्यौहारों में से एक है दशहरा। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला दशहरा अन्याय और बुराई पर अच्छाई और सत्य की विजय का प्रतीक है इसलिए इसे विजयदशमी भी कहा जाता है। इस मास में प्रभु श्री राम ने लंकापति रावण के साथ युद्ध करने से पहले माता भगवती के काली स्वरुप की आराधना की थी। इस दिन दुर्गा, श्रीराम शिव परिवार की पूजा की जाती है तथा रामचरित मानस, श्री राम स्तवन, श्री राम तारक मंत्र, रामरक्षा स्त्रोत आदि का पाठ किया जाता है।
हथियारों और मशीनों का पूजन
दशहरा के दिन क्षत्रियों द्वारा हथियारों की पूजा करने का विधान है। इसका उद्देश्य हथियारों के प्रयोग से शत्रुओं पर विजय पाना है। इसके लिए दशहरा वाले दिन किसी स्वच्छ एवं पवित्र स्थान पर चौक पूरकर चौकी स्थापित करके उनपर हथियार जैसे रिवाल्वर, बन्दूक, कारतूस, तलवार, ढाल आदि रखकर रोली, अक्षत, पुष्प, फल,धूप, दीप, मिष्ठान आदि से पूजन करके प्रसाद का वितरण किया जाता है। इसके अलावा इस दिन माल व यात्रियों को ढोने वाले पशु जैसे हाथी, घोड़े, वाहन , मशीनरी, कम्प्यूटर, कलम, पेन्सिल, मिट्टी के बर्तन बनाने का चाक आदि पर कलावा बांधकर और रोली का तिलक लगाकर पूजा की जाती है। ऐसा करने से रोजी-रोजगार में बढ़ोत्तरी होती है और जीवन में सफलता मिलती है।
बही खातों का पूजन
दशहरा वाले दिन कुछ राज्यों में व्यापारियों द्वारा नए बही खाते की शुरुआत करके उनपर रोली, केसर, कुमकुम से  श्री गणेश जी की तस्वीर बनाकर उनकी पूजा की जाती है एवं नया हिसाब लिखा जाता है।  बही खातों में नवांकुर जौ के पौधे रखना भी शुभ शकुन माना जाता है।
शमी वृक्ष का पूजन
दशहरा के दिन धार्मिक अनुष्ठान के रूप में शमी वृक्ष का पूजन भी किया जाता है। इसके लिए घर से पूर्व दिशा में जाकर शमी वृक्ष का पूजन करके उसकी टहनी लाकर घर के मुख्य आँगन में प्रतिष्ठित करते हैं। माना जाता है कि ऐसा करने से शत्रुओं का नाश होता है, परिवार में खुशियाँ आती हैं और महिलाओं को अखंड सौभाग्य मिलता है।
यात्रा के लिए शुभ
ज्योतिष के अनुसार दशमी तिथि की संज्ञा पूर्ण मानी जाती है इसलिए दशहरा वाले दिन किसी भी शुभ कार्य के लिए यात्रा करना अच्छा माना जाता है। विजय यात्रा के लिए भी इस दिन, दिन के ग्यारहवे मुहूर्त में प्रस्थान किया जा सकता है। लेकिन दशहरा के दिन अगर दशमी तिथि एकादशी से युक्त हो तो यात्रा या शुभ कार्य नहीं किया जाता।
अपराजिता देवी की उपासना
दशहरा पर अपराजिता देवी की उपासना करने की परंपरा है। अपराजिता देवी सकल सिद्धियों को देने वाली मां दुर्गा का ही अवतार हैं। दोपहर बाद सूर्य देव के अस्त होने से पूर्व अपराजिता देवी की आराधना करके विजय पाने की कामना की जा सकती है।
शुभ कार्यों के लिए शुभ 
अनेक मांगलिक कार्यों के लिए दशहरा विशेष शुभ माना जाता है। इस दिन निर्विवाद रूप से बच्चे का नामकरण, अन्न प्राशन, मुंडन, कान का छेदन, यज्ञोपवीत, भूमि पूजन, नए घर में प्रवेश, नए व्यापार का आरंभ जैसे शुभ कार्य संपन्न किये जा सकते है परंतु दशहरा वाले दिन विवाह संस्कार निषिद्ध होता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद, आगरा  

Wednesday, 14 October 2015

मन का कारक हैं चंद्रदेव

खगोल विज्ञान में चंद्रमा को भले ही पृथ्वी का उपग्रह माना गया है परंतु ज्योतिष शास्त्र में पृथ्वी के निकट होने के कारण इसे नवग्रहों में शामिल किया गया है क्योंकि अन्य ग्रहों के सामान ही इसका प्रभाव मनुष्य पर पड़ता है। सूर्य देव की रश्मियों से दमकने वाले चंद्र सोलह कलाओं से युक्त हैं। सात घोड़ों वाले रथ पर कमल के आसन पर विराजमान चंद्र देव के सर पर स्वर्ण मुकुट, गले में मोशन की माला, एक हाथ में गदा और दूसरा हाथ वर मुद्रा में रहता है। समस्त देवता, यक्ष, मनुष्य, भूत, पशु-पक्षी, वृक्ष आदि के प्राणों का आप्यायन करने वाले चंद्रदेव मन के कारक हैं।  जिस तरह समुद्र के खारी जल में इनके कारण ज्वार आता है उसी प्रकार मनुष्य के शरीर में मौजूद रक्त की क्षारीय प्रकृति के कारण पूर्णिमा और अमावस्या तिथि पर चंद्रदेव अपना प्रभाव छोड़ते हैं। यही कारण है कि इन तिथियों पर अक्सर मानसिक रोगियों में पागलपन, अवसाद, उन्माद, दुराचार, चोरी आदि करने की घटनाएं नजर आती हैं।
चंद्र देव की प्रकृति
उत्तर-पश्चिम  स्वामी, जल एवं स्त्री तत्व वाले चंद्र देवमाता-पिता, शारीरिक बल, राज्यानुग्रह, संपत्ति से संबंध रखते हैं और कुंडली के चौथे भाव के कारक हैं। चंद्र देव की अपनी राशि कर्क है तथा वृष राशि में उच्च के जबकि वृश्चिक राशि में नीच के प्रभाव रखते हैं। चंद्र देव की मित्रता एवं परस्पर आकर्षण लगभग सभी ग्रहों से है। इनका कोई भी शत्रु नहीं है। कुंडली के छटे, आठवें और बारहवें भाव में चंद्र देव की उपस्थिति जातक के लिए कष्टकारी होती है। वहीं मेष, वृश्चिक और कुम्भ राशियों में चंद्र देव जीवन में नकारात्मक प्रभाव देने वाले होते हैं। विवाह मिलान में चंद्र देव की प्रधानता रहती है। कुंडली का लग्न भाव शरीर है तो चंद्रमा उसका मन है। जन्म के समय चंद्रमा जिस राशि में बैठा होता है वही उसका चंद्र लग्न कहलाता है। सूर्य देव के समान चंद्र देव को भी राजा की पदवी प्राप्त है। पलाश इनका वृक्ष है।
अंक ज्योतिष में चंद्र देव
अंक ज्योतिष के अनुसार अंक दो चंद्र देवका प्रतिनिधित्व करता है। इस अंक वाले व्यक्ति कल्पनाशील, कला प्रेमी, रोमांटिक, मृदु स्वभाव वाले होते हैं लेकिन इनमें आत्मविश्वास की बेहद कमी होने से ये लोग जल्दी ही निराश हो जाते हैं। चंद्र देव से पीड़ित जातकों में पेट के रोग, गैस की समस्या, आंत्र की सूजन, ट्यूमर, डायबिटीज़, शरीर में दर्द, बुखार, जुकाम, गठिया, वाट रोग, मूत्र रोग, पथरी आदि समस्याएं होने की संभावना रहती है।
चंद्र देव की उपासना 
स्वास्थ्य, सौंदर्य, प्रेम, सम्मान और पारिवारिक सुख व शांति के लिए चंद्र देव की उपासना की जाती है। जीवन में मानसिक कष्ट के निवारण, कार्य सिद्धि और व्यापार में लाभ के लिए कम से कम दस और अधिक से अधिक 54 सोमवार को चंद्र देव का व्रत रखते हुए नमक रहित भोजन करना चाहिए। इसके लिए श्वेत वस्त्र धारण करके  चंद्र देव को रात्रि में जल अर्पित कर दही, दूध, चीनी और घी से निर्मित भोजन का प्रसाद लगाकर ग्रहण करना चाहिए। चंद्र देव की उपासना के लिए प्रत्येक सोमवार को भगवान शिव की स्तुति करना और चांदी की धातु में शुद्ध मोती जड़वाकर शुक्ल पक्ष के सोमवार को धारण करने से भी चंद्र देव प्रसन्न होते हैं।
चंद्र देव से संबंधित वस्तुओं जैसे शंख, दूध, दही, मोती, चांदी, श्वेत वस्त्र, चीनी, श्वेत गाय या बैल, मैदा, आटा आदि का सोमवार के दिन दान करना भी शुभ प्रभाव देने वाला होता है।
रोगोपचार में चंद्र देव के मंत्र 
चंद्र देव यद्यपि शुभ, सौम्य और शांत ग्रह माने गए हैं जो पृथ्वी पर अमृत वर्षा करके सभी को दीर्घायु और आरोग्य प्रदान करते हैं परंतु अशुभ होने पर प्रतिकूल प्रभाव भी देते हैं। चंद्र देव की अशुभता के कारण होने वाले विभिन्न रोगों के उपचार के लिए इनके मंत्रों का विधान पूर्वक उच्चारण किया जाता है।
सर्दी-जुकाम के निवारण के लिए "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जप करना चाहिए। पित्ताशय की पथरी में "ॐ सोम सोमाय नमः", खांसी से निजात पाने के लिए "ॐ ऐं ह्रीं सोमाय नमः", तथा महिलाओं की मासिक धर्म सम्बन्धी समस्याओं के निराकरण के लिए "ॐ श्राम श्रीं श्रौं सः चंद्राय नमः" मंत्रों का जप करने से लाभ मिलता है।
चंद्र देव के बीजमंत्र "ॐ श्राम श्रीं श्रौं सः चंद्राय नमः" का विधि पूर्वक जप करने से चंद्र देव के अशुभ प्रभाव दूर होते हैं और चंद्र देव की कृपा मिलने लगती है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद और वास्तुविद, आगरा   

Wednesday, 16 September 2015

सौभाग्य के लिए हरतालिका तीज व्रत

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथिको हस्त नक्षत्र में हरतालिका तीज मनायी जाती है। इस तिथि को महिलायें भगवान शिव और माता पार्वती का विधि-विधान से पूजन करके सौभाग्य के लिए कामना करती हैं। भविष्योत्तर पुराण के अनुसार जो महिलायें हरतालिका तीज व्रत करती हैं उन्हें जीवन में सुख, समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। हरतालिका तीज को बूढ़ी तीज भी कहा जाता है क्योंकि इस दिन विवाहित महिलायें महिलाओं को उनकी सास सुहाग का सिंधारा देती हैं और महिलाये अपनी सास के चरण स्पर्श करके उनका आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। 
ऐसे करे पूजा 
हरतालिका तीज वाले दिन महिलाओं को चाहिए कि वे संध्या काल में स्नान करके धुले हुए वस्त्र धारण करें और पीली व पवित्र मिट्टी से पार्वती और शिव की प्रतिमा बनाकर उनका पूजन सामिग्री से श्रद्धा भाव से पूजन करें। पूजन के उपरान्त एक सुहाग की पिटारी में सुहाग की समस्त वस्तुएं रखकर माता पार्वती के समक्ष चढ़ाना चाहिए और फल, मिष्ठान और पकवान आदि का भोग लगाना चाहिए।इसके अलावा भगवान शिव को धोती और अंगोछा चढ़ाना चहिये।  तत्पश्चात सुहाग पिटारी को किसी भी ब्राह्मण स्त्री को तथा धोती और अंगोछा किसे ब्राह्मण को दान करके उनका शुभ आशीर्वाद लेना चाहिए। सौभाग्यवती महिलाओं को इस दिन व्रत खोलने से पूर्व अपनी सासु मां को अपनी श्रद्धानुसार मिष्ठान, फल और व्यंजन आदि और कुछ धनराशि देकर उनके चरण स्पर्श करना चाहिए। इस प्रकार किये गए व्रत-विधान से माता पार्वती और भगवान शिव की कृपा से सौभाग्य सुख मिलता है।  
हरतालिका तीज व्रत कथा 
हरतालिका तीज व्रत के सम्बन्ध में जो कथा प्रचलित है उसके अनुसार भगवान शिव ने पार्वती को उनके पूर्वजन्म का स्मरण कराने के उद्देश्य से इस व्रत के माहात्म्य की कथा कही थी। पूर्वजन्म में भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाने के लिए गौरी ने हिमालय पर्वत पर गंगा के तट पर बाल्यावस्था में कठोर तप किया था। जिससे उनके पिता गिरिराज को बहुत कष्ट होता था। एक दिन नारद मुनि गौरी के पिता के घर आये और उन्होंने गिरिराज से कहा कि भगवान विष्णु ने गौरी की तपस्या से प्रसन्न होकर उनके साथ विवाह करने का प्रस्ताव भिजवाया है। नारदजी की बात सुनकर गिरिराज तो प्रसन्न हुए परन्तु गौरी ने विवाह प्रस्ताव से मना करते हुए कहा कि उन्होंने तो भगवान शिव को ही अपने पति के रूप में वरण किया है इसलिय वे किसी और से विवाह करने के बारे में सोच भी नहीं सकती। 
गौरी की एक सखी के कहने पर गौरी ने अपने पिता का घर त्याग दिया और एक गुफा में भगवान शिव की उपासना में लीन हो गयी। गौरी ने गंगा की रेत से शिवलिंग का निर्माण करके व्रत किया और रात्रि में जागरण करते हुए शिव का स्तुतिगान किया। गौरी द्वारा की गयी पूजा-अर्चना से भगवान शिव प्रसन्न होकर उनके समक्स प्रकट हुए और उनसे वर मांगने को कहा। गौरी ने भगवान शिव को ही अपने पति के रूप में मांग लिया। शिव के अंतर्ध्यान होने के बाद गौरी ने समस्त पूजा सामिग्री को गंगा में अर्पित करके व्रत का पारण किया। गौरी के पिता को जब उनकी तपस्या के बारे में जानकारी हुयी तो उन्होंने गौरी का विवाह भगवान शिव के साथ करने की सहर्ष अनुमति प्रदान करदी। समय आने पर शास्त्रोक्त विधि से भगवान शिव के साथ गौरी का विवाह संपन्न हो गया। 
जिस दिन गौरी ने शिव को पति के रूप में पाने के लिए व्रत और उपवास किया था उस दिन भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि थी। तभी से ये तिथि हरतालिका तीज व्रत के रूप में मनई जाती है। 
व्रत का माहात्म्य 
पुराणों के अनुसार जो सौभाग्यवती महिलाये इस व्रत को विधि-विधान से करती हैं उनका वैवाहिक जीवन सुखमय बना रहता है। वहीं जो अविवाहित युवतियां इस व्रत को करके उपवास रखती हैं, उन्हें मनवांछित वार की प्राप्ति होती है तथा उनका विवाह भी शीघ्र होता है। इस व्रत को सभी महिलाये कर सकती हैं।  --- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद , आगरा 

Wednesday, 9 September 2015

वास्तु के अनुसार लगाएं बोनसाई पौधे

अपने पर्यावरण को हरा-भरा और प्रदूषणमुक्त बनाये रखने के लिए पेड़-पौधों का बड़ा महत्त्व है। इनके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। परंतु जगह की कमी को देखते हुए आज के समय में घर, कार्यालय, भवन, फैक्टरी, काम्प्लेक्स, पिकनिक स्पॉट, पार्क और चौराहों, मल्टी स्टोरी बिल्डिंग आदि में गमलों में पेड़-पौधे लगाने का चलन बढ़ता जा रहा है। ऐसे बड़े पेड़-पौधे जिन्हें विशेष तकनीक के द्वारा गमलों में लगाया जाता है, बोनसाई पौधे कहलाते हैं। इन पौधों की ऊंचाई और फैलाव बहुत कम होता है, परंतु इनमें फल और पुष्प आदि सामान्य पौधों के समान ही प्राप्त किये जा सकते हैं।
वास्तु दोषों के निवारण के लिए लगाएं बोनसाई पौधे 
वास्तु शास्त्र के नियमों के अनुसार अगर आवासीय भवन और कार्यालयों में बोनसाई पौधे लगाए जा रहे हों तो इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि उन्हें पर्याप्त खाद और सूरज की धूप मिलती रहे। क्योंकि इन पौधों के लिए विशेष देखरेख की आवश्यकता होती है। बोनसाई पौधों की समुचित वृद्धि के लिए इनमें सड़ने वाली रेशेदार वनस्पति, गिरे हुए कोमल पत्ते, नीम की खली, गोबर से बनी खाद का प्रयोग ही करना चाहिए। कीटनाशक दवाओं और रासायनिक खाद के प्रयोग से बचना चाहिए। सही देखरेख के साथ उचित दिशा में लगाए गए बोनसाई पौधे भवन में सकारात्मक ऊर्जा देते हैं और वास्तु दोषों का निवारण भी करते हैं।
शुभ और अशुभ पौधे 
वास्तु  नियमों के अनुसार घर एवं कार्यालयों में आम, संतरे, सेब, अंगूर, अनार, केसर, नीम, मौलश्री, चंदन, जयंती, गुड़हल, अशोक, नीम, चंपा, तुलसी, बेल, गुलाब, चमेली आदि के बोनसाई पौधे लगाए जा सकते हैं। जबकि भवन और उसके आस-पास कांटेयुक्त पेड़-पौधे, बेर, दूध निकलने वाले पौधे, कैथल, बरगद, पीपल, बांस, कैक्टस, ढाक आदि लगाना अशुभ फलदायी होता है। इस तरह के बोनसाई पौधे न सिर्फ नकारात्मक ऊर्जा देते हैं बल्कि कई तरह की समस्याओं जैसे अर्थाभाव, घरेलू विवाद, रोग आदि का कारण भी बनते हैं।
सही दिशा का रखें ध्यान 
वास्तु नियमों के अनुसार अगर घर या कार्यालय में उचित दिशा का ध्यान रखते हुए बोनसाई पौधे लगाए जाएं तो इनका शुभ प्रभाव देखने को मिलता है। पूर्व दिशा में तुलसी, पश्चिम में शाक-सब्ज़ी, उत्तर में हरी कोमल दूब या घास और दक्षिण में बड़े पत्तों वाले पौधे जैसे मनी प्लांट लगाने चाहिए। इसी प्रकार उत्तर-पूर्व दिशा (ईशान कोण) में हरी दूब घास, दक्षिण-पूर्व (आग्नेय कोण) में जलीय छायादार पौधे, दक्षिण-पश्चिम दिशा (नैऋत्य कोण) में भारी तने या पत्ते वाले पौधे तथा उत्तर-पश्चिम दिशा (वायव्य कोण) में वायु को शुद्ध करने वाले पौधे लगाना शुभ एवं श्रेष्ठ रहता है। --- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद एवं वास्तुविद






































































































































































Sunday, 2 August 2015

श्रावण मास में शिव आराधना

देवाधिदेव भगवान शिव को अत्यंत प्रिय श्रावण मास का शुभारम्भ 1 अगस्त, 2015 से हो रहा है। इस मास में आशुतोष शंकर जी की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करके नियमित रूप से अभिषेक करने से उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है।
कल्याणकारी हैं शिव
शिव का अर्थ है "कल्याण"। श्रावण मास में भगवान शिव की आराधना करके सभी के कल्याण की कामना की जाती है तथा तन और मन से शिवोपासना में रुद्राभिषेक, अर्चना, भोग, श्रृंगार आदि करते हुए प्रार्थना, स्तुति, जप, भजन, कीर्तन, मंत्रोच्चारण आदि द्वारा कल्याणकारी कार्यों में प्रवृत्त होकर "शिवमय" होने का शुभ प्रयास किया जाता है।
ऐसे करें शिव आराधना
कहते हैं कि श्रावण मास में भगवान शंकर को प्रसन्न करने से समस्त देवताओं की पूजा का फल मिलता है। पुराणों के अनुसार, श्रावण मास में शिवलिंग पर प्रतिदिन एक बिल्वपत्र अर्पित करने से मनुष्य के तीन जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। वहीँ भगवान शिव को सर्वाधिक प्रिय सोमवार के दिन शिव साधना करने एवं पूर्ण भक्ति-भाव से पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख रखते हुए शिवलिंग पर गंगाजल, कच्चा दूध, दही, शहद, बूरा, गन्ने का रस, सरसों या तिल का तेल, घी, पंचामृत, पंचमेवा, चन्दन, भांग, धतूरा, फल, पुष्प, इलायची, मोली, श्वेत वस्त्र, यज्ञोपवीत, तुलसी मंजरी, दूर्वा, रुद्राक्ष आदि सामग्री अर्पित करने से धन, धान्य, संतान, शांति, निर्मलता की प्राप्ति होती है तथा जीवन से रोग और कष्टों से मुक्ति मिलती है।
भोले हैं भोले शंकर
भगवान शिव को भक्त भोले शंकर और भोले भंडारी कहकर भी पुकारते हैं क्योंकि भगवान शंकर साधारण पूजा-पाठ से सहज ही प्रसन्न होने वाले देवता हैं। श्रावण मास में भगवान शिव की पूजा भी उन्हें प्रसन्न  करने के लिए की जाती है जिससे कि भक्तों को उनकी कृपा मिले और वे शिवमय होकर सबका कल्याण कर सकें। भगवान शिव की आराधना करते समय "ॐ नमः शिवाय", "बम-बम भोले", "नमो नीलकंठाय", "ॐ पार्वतीपतये नमः", "ॐ किरुकुल्ये हुं फट स्वाहा", "ॐ ह्रीं ह्रौं नमः शिवाय" आदि मंत्रों का उच्चारण अवश्य करना चाहिए। इसके अलावा श्रावण मास में भगवान शिव का आशीर्वाद पाने के लिए शिव चालीसा और महामृत्युंजय मंत्र का जप भी करना चाहिए।
नाग पूजन से प्रसन्न होते हैं भगवान शिव 
भगवान शिव का स्वरुप अद्भुत है। संपूर्ण शरीर पर भस्म, जटाओं में पवित्र गंगा, भाल पर अर्ध चंद्रमा, गले में रुद्राक्ष और सर्पों की माला, हाथ में डमरू एवं त्रिशूल। जो भी उन्हें देखता है , मंत्रमुग्ध रह जाता है। नाग देवता भगवान शिव के गले का श्रृंगार होते हैं, इसलिए श्रावण मास में भगवान शिव के साथ-साथ शिव परिवार और नाग देवता की पूजन किये जाने का विधान है। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि "नाग पंचमी" के रूप में जानी जाती है। इस दिन पांच फन वाले नाग देवता की पूजा करके उन्हें चंदन, दूध, खीर, पुष्प आदि अर्पित करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और भक्तों को सर्प एवं नागों द्वारा काटे जाने का ख़तरा भी नहीं रहता है।
अशुभ ग्रहों को बनाएं शुभ
जिन जातकों की जन्म कुंडली में "कालसर्प दोष" है, उन्हें श्रावण मास में भगवान शिव की विशेष पूजा-अर्चना करते हुए उन्हें प्रसन्न करना चाहिए। श्रावण मास के चारों सोमवार के दिन भगवान शिव का रुद्राभिषेक करना, उपवास रखना, बहते हुए जल में चांदी और तांबे से निर्मित नाग-नागिन के जोड़े को प्रवाहित करना तथा महामृत्यंजय मंत्र का जप करना शुभ प्रभाव देता है। जन्म कुंडली में अगर ग्रहों के अशुभ फल मिलते दिखाई दे रहे हों तो भगवान शिव की नियमित रूप से आराधना करके महामृत्युंजय मंत्र का एक माला जप श्रावण मास में प्रतिदिन करना चाहिए। इस मंत्र में अपार शक्ति है। दुर्घटना अथवा असाध्य रोग के कारण मृत्यु के मुख में जा रहे व्यक्ति के जीवन को इस मंत्र शक्ति के बल पर जीवन दान दिया जा सकता है, ऐसा धार्मिक ग्रंथ एवं पुराणों में वर्णित है।
श्रावण मास में ऐसा न करें
श्रावण मास पवित्र जीवन, सात्विक आहार एवं व्यवहार प्राप्त करने से जुड़ा है क्योंकि इस मास में भगवान शिव की आराधना करके "सत्यं शिवं सुंदरं" की भावना को अपने अंदर समाहित किया जा सकता है। श्रावण मास में भगवान शिव की अनुपम कृपा पाने के लिए अपवित्र और अनैतिक कार्य करने से बचना चाहिए। शिवलिंग पर चम्पा, केतकी, नागकेसर, केवड़ा और मालती  पुष्प अर्पित नहीं करना चाहिए।  शिव मंदिर की पूरी परिक्रमा न करके आधी परिक्रमा ही करनी चाहिए। बिल्वपत्र कटे-फटे एवं छिद्रयुक्त न हों। बिना मंत्र के शिव पूजन न करें और न ही शिव पूजन में शंख का प्रयोग करें। शिवलिंग पर शंख से जल अर्पित नहीं करना चाहिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल 
     

Thursday, 16 July 2015

बिल्ली पालें तो रहे सावधान

  वर्त्तमान समय में घरों में बिल्ली पालने का शौक बढ़ता जा रहा है। तंत्र-मंत्र की साधना में बिल्ली को काली शक्ति का प्रतीक मानते हुए उसकी पूजा की जाती है। वहीं बिल्ली का सम्बन्ध पितरों से भी माना गया है। इसलिए घरों में बिल्ली के आने पर लोग उसे अशुभ मानते हुए घर से भगाने की कोशिश करते हैं। ज्योतिष एवं वास्तु की दृष्टि से घर में बिल्ली का बार-बार आना शुभ नहीं माना गया है। नारद पुराण के अनुसार जहां भी बिल्ली के पैरों की धूल उड़ती है, वहाँ सकारात्मक ऊर्जा की हानी होती है जिससे उस स्थान पर अशुभ प्रभाव बढ़ने लगते हैं।
     जिस घर में अक्सर बिना कारण बिल्लियों का आना-जाना लगा रहता है, उस घर में रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य में उतार-चढ़ाव देखने को मिलते हैं। घर में अचानक ही बिल्लियों का आना बढ़ जाने से घर के स्वामी अथवा मुखिया को मानसिक तनाव का सामना करना पड़ता है तथा घर में कई तरह की समस्याएं आने लगती हैं। बिल्लियों के सम्बन्ध में यह भी माना जाता है कि अगर भोजन करते समय बिल्ली आकर देखने लगे तो कष्ट होता है। इसी प्रकार बिल्ली द्वारा घर में मल-मूत्र का त्याग करने से आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
     कहा जाता है कि दूसरे प्राणियों की तुलना में बिल्ली की छठी इन्द्रीअधिक सक्रिय होती है। इस वजह से बिल्ली को भविष्य में होने वाली किसी भी अशुभ घटना का पूर्वाभास हो जाता है, ऐसी स्थिति में बिल्ली स्थान परिवर्तन करके दूसरी जगह पलायन कर जाती है। जो लोग अपने घरों में बिल्ली पालते हैं उन्हें इस  बात का विशेष  चाहिए कि अगर उनकी पालतू बिल्ली घर छोड़ कर अचानक चली गयी है तो यह भविष्य में घटने  किसी अशुभ घटना का संकेत हो सकता है।
     बिल्ली पालने अथवा बिल्ली के आने-जाने से अगर  घर-परिवार में किसी तरह के अशुभ संकेत या परिणाम नज़र आ रहे हों तो उससे बचाव के लिए भगवान सत्यनारायणजी की पूजा या हवन अनुष्ठान कराना चाहिए। पितरों की शान्ति और तृप्ति के लिए प्रत्येक शनिवार को दक्षिण दिशा में मुख करके काले तिल मिश्रित जल से तर्पण करना चाहिए। पीपल के वृक्ष पर जल चढाने और दीपक प्रज्वलित करने से भी बिल्ली के कारण होने वाले अशुभ परिणामों से छुटकारा मिल सकता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल

Friday, 3 April 2015

चन्द्र ग्रहण और उसका प्रभाव

 चैत्र शुक्ल पूर्णिमा शनिवार विक्रम संवत 2072 अर्थात 04 अप्रैल 2015 को चन्द्र ग्रहण पड़ रहा है। यह ग्रहण एशिया के अधिकाँश भागों के साथ-साथ ऑस्ट्रेलिया, उत्तर दक्षिण अमेरिका, भारतीय और पेसिफिक समुद्री क्षेत्रों में दिखाई देगा। भारत में यह चन्द्र ग्रहण आंशिक रूप से पूरे देश में नज़र आएगा।
धार्मिक मान्यता के अनुसार जब राहु देव चन्द्रमा को ग्रसित करते हैं तो चन्द्र ग्रहण लगता है। इस वर्ष चन्द्र ग्रहण कन्या राशि में हस्त नक्षत्र में पड़ रहा है। यह संयोग पंद्रह वर्षों बाद पड़ने के कारण इस ग्रहण की विशेष चर्चा है। चन्द्र ग्रहण का असर राजनीति और प्रचार-प्रसार के कार्य से जुड़े लोगों पर प्रतिकूल असर रखने वाला है।ग्रहण के प्रभाव से प्राकृतिक आपदाएं, महगाई और कहीं-कहीं वाद-विवाद की स्थिति दिखाई दे सकती है। इसके साथ-साथ ही जिन जातकों पर शनि की साढ़े साती अथवा ढैया का असर है, जिन जातकों का चन्द्रमा नीच का या सुप्त अवस्था में है तथा जन्म कुंडली में चन्द्र ग्रह पहले, छठे, आठवें और बारहवें भाव में विराजमान है, उनके लिए भी चन्द्र ग्रहण की शुभ प्रभाव देने वाला नहीं माना जा सकता है। चन्द्र ग्रहण के प्रभाव से जातकों के मन की चंचलता पर भी विपरीत असर पड़ता है।
ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार चन्द्र ग्रहण का प्रारंभ दोपहर में 03:45 बजे से होगा, ग्रहण का मध्य काल सायं 05:30 बजे तथा ग्रहण का मोक्ष काल रात्रि 07:15 बजे पर होगा। चन्द्र ग्रहण से पूर्व सूर्योदय से पहले अर्थात प्रातः 03:46 बजे से सूतक लग जायेंगे। ग्रहण के सूतक काल में तथा ग्रहण के दौरान मंदिर में प्रवेश, मूर्ति स्पर्श, मूर्ति पूजा, भोजन, मैथुन, तेल मर्दन, उबटन, झूठ बोलना आदि कार्य निषिद्ध माने गए हैं। लेकिन वृद्ध, बच्चे और बीमार लोगों के लिए भोजन करना निषिद्ध नहीं माना गया है।  ग्रहण के सूतक और ग्रहण काल में स्नान, ध्यान, जप, तप, भजन, कीर्तन, मन्त्र अनुष्ठान, दान जैसे कार्य करना शुभ माना गया है। ऐसा करने से राहु देव प्रसन्न होते हैं और चंद्र ग्रह से संबंधित कष्टों का निवारण होता है।
चन्द्र ग्रहण के अशुभ प्रभाव को काम करने के लिए चंद्र ग्रह से संबंधित वस्तुओं जैसे मोती, चावल, चीनी, मिश्री श्वेत वस्त्र आदि का दान करना चाहिए।  चन्द्र देव से संबंधित मंत्र  "ॐ ऐं क्लीं सोम सोमाय नमः" का निरंतर जप करना चाहिए और भगवान शिव तथा श्री हनुमान जी की आराधना भक्ति भाव से करनी चाहिए। सुन्दरकाण्ड का नियमित पाठ करने से चंद्र ग्रह के साथ-साथ शनि ग्रह के अशुभ प्रभाव भी काम होने लगते हैं।